SC News: उच्चतम न्यायालय ने हत्या से जुड़े एक मामले में 'लापरवाही भरी जांच' को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस के प्रति नाखुशी जाहिर करते हुए राज्य सरकार को विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल जेल में बिताने वाले व्यक्ति को छह लाख रुपये का "मुआवजा" देने का सोमवार को निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने संबंधित व्यक्ति को 'व्यवस्था का शिकार' बताते हुए कहा कि केवल अटकलों और कयासों के आधार पर गढ़ी गई एक 'मनगढ़ंत कहानी' की वजह से उसके जीवन के छह साल बर्बाद हो गए।
सुप्रीम कोर्ट।
अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता राज्य-कोर्ट
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, 'राज्य नागरिकों की सुरक्षा करने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता, खासकर तब जब किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए।’ उसने कहा कि जांच और अभियोजन एजेंसियों का काम केवल किसी भी तरह से दोषसिद्धि करना नहीं है। पीठ ने कहा, 'इन एजेंसियों को खुद को न्याय प्रणाली का एक अहम हिस्सा मानना चाहिए, जिसका काम न केवल पीड़ित, शिकायतकर्ता और घायल व्यक्ति को न्याय दिलाना है, बल्कि आरोपी के साथ भी न्याय सुनिश्चित करना है।’
हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी
उसने कहा, 'हम कई मामलों में न्याय का उपहास होते देखते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह इतना स्पष्ट और चौंकाने वाला होता है (जैसा कि इस मामले में है) कि उनमें आरोपी को मुआवजा दिया जाना चाहिए, क्योंकि वह खुद व्यवस्था का शिकार है।’ शीर्ष अदालत का यह फैसला एक आरोपी की याचिका पर आया, जिसमें उसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जनवरी के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे 2019 में आगरा में दर्ज मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। न्यायालय ने कहा कि 23 मार्च को उसने निचली अदालत को इस मामले में तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था।
2019 से जेल में बंद था आरोपी
शीर्ष अदालत ने कहा कि उसके निर्देश के अनुसार, सुनवाई पूरी हो गई और याचिकाकर्ता को बरी कर दिया गया। उसने कहा, 'यह इस बात का एक सटीक उदाहरण है कि किसी मामले में जांच इस तरह नहीं की जानी चाहिए, (क्योंकि) ऐसी जांच के परिणामस्वरूप अभियोजन पक्ष ने एक व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता को खतरे में डाल दिया।’ पीठ ने इस बात पर गौर किया कि याचिकाकर्ता 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद है। उसने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत न होने के बावजूद उसे छह साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रखा गया।
'एक महीने के भीतर छह लाख रुपये का भुगतान करें'
पीठ ने कहा, 'एक बेहद लापरवाही भरी जांच के आधार पर अव्यवस्थित तरीके से मुकदमा चलाया गया। अच्छी बात यह रही कि इसके परिणामस्वरूप आरोपी बरी हो गया। जिस तरह से जांच की गई और मुकदमा चलाया गया, हम उस पर गहरी नाखुशी जाहिर करते हैं।’उसने याचिका का निपटारा करते हुए कहा, 'हम राज्य सरकार को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर छह लाख रुपये का भुगतान करे; हालांकि, हिरासत में बिताए गए वर्षों की तुलना में यह राशि बहुत कम है।’
(एजेंसी इनपुट)
