Harivansh Narayan Singh: राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर उच्च सदन के सदस्य बन गए हैं। पत्रकार हरिवंश को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यसभा सांसद मनोनीत किया है। उनकी राज्यसभा सांसद का कार्यकाल 9 अप्रैल को खत्म हो गया था। अब उनका नया कार्यकाल शुरू होगा।
पीएम मोदी और हरिवंश नारायण सिंह की फाइल फोटो।
हरिवंश का पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल को खत्म हो गया था। उनकी पार्टी JDU ने इस बार नाम नहीं दिया था। इसके बाद राष्ट्रपति ने उनका मनोनयन किया।
रंजन गोगोई की सीट पर मनोनीत हुए हरिवंश
पूर्व CJI रंजन गोगोई के रिटायर होने के बाद सीट खाली हुई थी। इसे भरने के लिए JD(U) के हरिवंश को चुना गया। 69 साल के हरिवंश 2032 तक राज्यसभा में रहेंगे। राज्यसभा में 12 सदस्य मनोनीत होते हैं, जिन्हें राष्ट्रपति तय करते हैं। इन्हें कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा में विशेष योगदान के आधार पर चुना जाता है। संविधान और राज्यसभा के नियमों के अनुसार, मनोनीत सांसद भी उपसभापति बन सकता है।
तो क्या वो फिर से राज्यसभा के उपसभापति बनेंगे या नहीं? इस सवाल का जवाब तो जल्द ही मिल जाएगा, लेकिन सवाल कुछ और है। सवाल ये है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से ये उन्हें ये 'रिटर्न गिफ्ट' मिला है?
हरिवंश नारायण सिंह की फाइल फोटो। Sansad TV
सिलसिलेवार ढंग से पूरे मामले को समझते हैं। कुछ दिनों पहले बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान राज्यसभा में रिटायर हो रहे सांसदों का विदाई समारोह 18 मार्च को हुआ था। इस दौरान पीएम मोदी ने हरिवंश के लिए कहा था, "हमारे उपसभापति हरिवंश विदा ले रहे हैं। हरिवंश को इस सदन में लंबे समय तक अपनी जिम्मेदारियों को निभाने का अवसर मिला।"
पीएम मोदी ने कहा था कि हरिवंश नारायण सिंह की राजनैतिक पारी अभी खत्म नहीं हुई है, वे आगे भी जनहित में काम करते रहेंगे। इसके आधार पर ही यह माना जा रहा है हरिवंश नारायण को मनोनीत सांसद बनाकर दोबारा लाया गया है।
हरिवंश नारायण से क्यों खफा है जदयू?
बता दें कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान उप उपसभापति रहते हरिवंश नारायण तकनीकी रूप से ही जदयू के सदस्य रह गए थे। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि वर्तमान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने कही थी। ललन सिंह ने हरिवंश नारायण पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि 'ये पिछले एक वर्ष 10 दिन से पार्टी की किसी भी बैठक में शामिल नहीं हुए। ये जदयू के किसी भी संसदीय बैठक में नहीं गए।' उन्होंने आरोप भी लगाया कि वो पार्टी से ज्यादा पीएम की सुनते हैं। ये बुलाने पर भी पार्टी की बैठक में नहीं आते।सवाल खड़े हो रहे थे कि हरिवंश नारायण अब जदयू से ज्यादा बीजेपी के करीब आ रहे हैं। वहीं, कई मौकों पर तो उन्हें जदयू के खिलाफ जाते हुए बीजेपी का स्टैंड लिया। इसके पीछे कुछ तर्क भी दिए गए।
नए संसद भवन
जदयू जदयू ने नए संसद भवन के उद्घाटन का भी विरोध किया था। JDU के रणनीतिकार चाहते भी थे कि वे पार्टी लाइन पर अडिग होते देखें, ताकि एक स्ट्रांग मैसेज जा सके। हालांकि, हरिवंश नारायण ने उप सभापति के संवैधानिक पद को अहमियत दी, न कि पार्टी के व्हिप की। उन्होंने नए संसद भवन के उद्घाटन में भी हिस्सा लिया था।
दिल्ली सेवा बिल
दिल्ली सेवा बिल पर वोटिंग के दौरान, जनता दल यूनाइटेड के राज्यसभा सांसद और उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने पार्टी के व्हिप का पालन नहीं किया। उन्होंने पार्टी लाइन से हटकर बिल के खिलाफ वोट देने के बजाय, संवैधानिक पद की मर्यादा की चिंता की और वोटिंग प्रक्रिया से दूरी बना ली। पार्टी लाइन पर यह जदयू के खिलाफ स्टैंड था और बीजेपी के करीब होने का एहसास भी। और यह तब हुआ जब जदयू ने अपने सभी सदस्यों को दिल्ली सेवा बिल के विरोध में वोट करने के लिए व्हिप जारी किया था। यह उस व्हिप का उल्लंघन था।
वहीं, दूसरी ओर इसे 'वोटबैंक पॉलिटिक्स' पॉलीटिक्स'से भी जोड़ा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि बीजेपी ने राजपूत समुदाय को मनाने के लिए यह कदम उठाया है। बता दें कि अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होना है। यूपी में ठाकुर या राजपूतों की संख्या लगभग 10-13% है। हालांकि, मामला जो भी हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि पत्रकार से राजनेता बने हरिवंश नारायण सिंह हमेशा विवादों से दूर रहकर सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों को निभाने पर फोकस करते हैं।
दरअसल, हरिवंश नारायण सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान सदन में संतुलित और शांतिपूर्ण संचालन के लिए पहचान बनाई है। कई बार विपक्ष के विरोध के बीच भी उन्होंने कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने में अहम भूमिका निभाई। यही वजह है कि उन्हें दोबारा मौका दिए जाने को उनके काम का इनाम माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार ने एक ऐसे चेहरे पर भरोसा जताया है, जो संसदीय परंपराओं और मर्यादाओं को बनाए रखने में सक्षम रहा है। उनके अनुभव और संतुलित रवैये को देखते हुए यह फैसला रणनीतिक भी माना जा रहा है।
वहीं, इसे ‘रिटर्न गिफ्ट’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि हरिवंश ने कई अहम मौकों पर सरकार के लिए सदन का संचालन आसान बनाया। इससे सत्तापक्ष को विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
हालांकि, विपक्ष इस फैसले पर सवाल भी उठा रहा है और इसे राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देख रहा है। लेकिन इतना तय है कि हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार राज्यसभा पहुंचना उनकी राजनीतिक और संसदीय पकड़ को और मजबूत करता है।
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