Jantar Mantar Protest News: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और इंटरनेट सेवाओं के निलंबन को लेकर दायर अवमानना याचिका के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। आज होने वाली सुनवाई से पहले केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी भी निर्देश का जानबूझकर या सोच-समझकर उल्लंघन नहीं किया गया। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से उसके खिलाफ जारी अवमानना नोटिस वापस लेने की अपील की है। हलफनामा सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर 2026 के आदेश के कथित उल्लंघन से जुड़े मामले में दाखिल किया गया है।
जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में हलफनामा दाखिल
केंद्रीय गृह सचिव ने अपनी सफाई में क्या कहा?
गृह सचिव गोविंद मोहन ने अपने हलफनामे में कहा, “मैं इस माननीय अदालत से बिना शर्त और बगैर किसी योग्यता के माफी मांगता हूं।” उन्होंने अदालत को बताया कि हलफनामे में रखे गए तथ्यों का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी भी निर्देश का जानबूझकर या सोच-समझकर पालन नहीं करने जैसी कोई स्थिति नहीं थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और देश की सभी अदालतों के प्रति सर्वोच्च सम्मान व्यक्त किया है।
केंद्र ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने का दिया हवाला
केंद्र ने हलफनामे में कहा है कि सार्वजनिक शांति बनाए रखने और कानून-व्यवस्था बिगड़ने से रोकने के लिए कदम उठाए गए थे। सरकार के मुताबिक, एक संगठन ने जरूरी अनुमति प्राप्त किए बिना और अनुमति देने से इनकार किए जाने के बावजूद प्रदर्शन बुलाया था। हलफनामे में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में 2018 में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया है। इसके अलावा, दिल्ली पुलिस के 20 जुलाई 2026 के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि हालात को देखते हुए सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए संबंधित कदम जरूरी थे।
4 किलोमीटर के दायरे में बंद किया गया था मोबाइल इंटरनेट
केंद्र ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि 9 अक्टूबर 2026 की रात 10 बजे से 10 अक्टूबर की रात 10 बजे तक केवल मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को निलंबित किया गया था। यह रोक रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे तक सीमित थी और केवल एक दिन के लिए लागू रही। हलफनामे के मुताबिक, दिल्ली पुलिस की ओर से मोबाइल इंटरनेट सेवाएं एक दिन के लिए निलंबित करने का अनुरोध मिला था। इस अनुरोध पर कानून के अनुसार विचार किया गया और स्थिति की गंभीरता तथा राष्ट्रीय राजधानी में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत को देखते हुए इसे आनुपातिक कदम माना गया। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट निलंबन का आदेश गैर-मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर लागू नहीं था। वाई-फाई और ब्रॉडबैंड सेवाओं को निलंबित नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में संशोधन की मांग
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 11 अक्टूबर 2026 के आदेश में जरूरी संशोधन करने की अपील की है। हलफनामे में कहा गया है कि आवश्यकता की परिस्थितियों में इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करने की अनुमति दी जानी चाहिए, लेकिन ऐसा केवल कानून के सख्त अनुपालन और लागू वैधानिक सुरक्षा उपायों के अधीन होना चाहिए। केंद्र का कहना है कि सीमित अवधि और निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र में इंटरनेट सेवाओं का निलंबन, उचित परिस्थितियों में, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का एक उपाय हो सकता है।
अवमानना नोटिस वापस लेने की अपील
गृह सचिव ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि हलफनामे में दिए गए तथ्यों पर विचार करते हुए मौजूदा कार्यवाही में जारी नोटिस वापस लिया जाए। केंद्र ने अपने रुख के समर्थन में कहा है कि इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करने का फैसला कानून के तहत और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया था। मामले में अवमानना याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर की गई है। इसमें गोविंद मोहन समेत अन्य अधिकारियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के कथित उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
