भारत-म्यांमार सीमा पर सक्रिय ड्रग्स तस्करी और उससे जुड़े वित्तीय नेटवर्क के खिलाफ ED और NCB ने संयुक्त रूप से ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत बड़ी कार्रवाई की थी। इस ऑपरेशन में 38 ठिकानों पर छापेमारी के दौरान अंतरराष्ट्रीय नार्को-कार्टेल से जुड़े कथित नेटवर्क, करीब 100 करोड़ रुपये के हवाला लेनदेन और ड्रग्स की कमाई को ठिकाने लगाने के तरीकों की पड़ताल की गई। अब इसी नेटवर्क की जांच में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक नया मॉड्यूल उजागर किया है। जांच में सामने आया है कि ड्रग्स की कीमत चुकाने के लिए कथित तौर पर सीधे पैसे सीमा पार भेजने के बजाय बार्टर सिस्टम यानी पेट्रोल-डीजल, आटा, खाद्य तेल, किराना सामान, दवाइयां, जूते और कपड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा था।
ईडी की जांच में खुलासा
ED की जांच में इस तरीके को 'Drugs for Goods' के रूप में सामने लाया गया है। एजेंसी के मुताबिक, ड्रग्स की बिक्री से जुटाई गई रकम भारतीय बैंक खातों के जरिए पेट्रोल पंपों, आटा मिलों, किराना कारोबारियों, दवा विक्रेताओं और कपड़े-जूतों के व्यापारियों तक पहुंचाई जाती थी। इसके बाद सामान मिजोरम के सीमावर्ती इलाकों से म्यांमार भेजकर ड्रग्स सप्लायरों का बकाया चुकाने का कथित तरीका अपनाया गया।
ऑपरेशन ट्राइडेंट के बाद जांच में सामने आईं नेटवर्क की नई परतें
23 अक्टूबर 2026 को ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत असम, मिजोरम और मणिपुर में 38 चिह्नित ठिकानों पर कार्रवाई की गई थी। इस कार्रवाई का फोकस सीमा पार सक्रिय कथित नार्को-हवाला नेटवर्क के लॉजिस्टिक्स और अवैध वित्तीय लेनदेन से जुड़े ठिकानों पर था। ऑपरेशन के दौरान करीब 100 करोड़ रुपये के हवाला लेनदेन, 1,424 बैंक खातों को फ्रीज किए जाने और नेटवर्क से जुड़ी संपत्तियों पर कार्रवाई की जानकारी सामने आई थी।
अब ED की जांच में दो मामलों, मिजोरम के जाबरुल हक केस और मणिपुर के जेंगनाइह्नियांग उर्फ तानियांग केस से जुड़े लेनदेन की पड़ताल के दौरान ड्रग्स की कमाई के निपटारे का एक और कथित तरीका सामने आया है। एजेंसी ने बयानों, बैंक रिकॉर्ड, Go Alpha Trip के लेजर और अन्य दस्तावेजों के आधार पर बताया है कि ड्रग्स के पैसे का निपटारा केवल हवाला या पैसे के जरिए ही नहीं, बल्कि सामान की सप्लाई के जरिए भी किया जा रहा था। यानी ऑपरेशन ट्राइडेंट के बाद ED की जांच अब केवल ड्रग्स की कमाई और संदिग्ध बैंक खातों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस कथित सप्लाई चेन पर भी केंद्रित है, जिसके जरिए सामान को सीमा पार भेजकर ड्रग्स की कीमत का हिसाब बराबर किया जाता था।
पैसा एक का, बिल दूसरे के नाम और डिलीवरी कहीं और
ED की जांच के मुताबिक, इस मॉड्यूल में सबसे अहम बात भुगतान करने वाले, बिल पर खरीदार के रूप में दर्ज व्यक्ति और सामान की डिलीवरी लेने वाले के बीच कथित अंतर था। ड्रग्स की बिक्री से जुटाई गई नकदी को मणिपुर और मिजोरम के अलग-अलग इलाकों में इकट्ठा किया जाता था। फिर इसे मिनी-ATM और कस्टमर सर्विस प्वाइंट (CSP) के जरिए बैंकिंग सिस्टम में डाला जाता था या संदिग्ध खातों में जमा कराया जाता था। इसके बाद RTGS, NEFT और IMPS के जरिए रकम भारतीय सप्लायरों के खातों में भेजी जाती थी।
सप्लायर सामान का बिल और ई-वे बिल जारी करते थे, लेकिन कई मामलों में बिल पर दर्ज खरीदार भुगतान करने वाले से अलग था। सामान की डिलीवरी भी किसी तीसरे व्यक्ति या सीमावर्ती स्थान पर होती थी। इसके बाद सामान म्यांमार भेजे जाने का आरोप है। इस तरीके में भारतीय हिस्से का लेनदेन सामान्य कारोबारी भुगतान जैसा दिखाई देता था, जबकि सीमा पार ड्रग्स की कीमत का निपटारा सामान के जरिए किया जाता था। इस तरह कथित नेटवर्क को सीधे सीमा पार रकम भेजने या रुपये को म्यांमार की मुद्रा 'क्यात' में बदलने पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था।
आटे की खेप, तेल और डीजल के लेनदेन ने खोली परतें
ED की जांच में ऐसे कई लेनदेन का उल्लेख है, जिनमें भुगतान करने वाले और सामान पाने वाले के बीच सीधा कारोबारी संबंध नहीं था। कुछ मामले देखिए...
14 दिसंबर 2024 को चुराचांदपुर स्थित Go Alpha Trip के खाते से पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी की एक आटा मिल को 13.19 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया गया। चार दिन बाद 723 बोरियों में करीब 32,535 किलोग्राम मैदा का बिल बना और खेप मिजोरम की राजधानी आइजोल भेजी गई। 27 अप्रैल 2026 को चुराचांदपुर के उसी काउंटर से गुवाहाटी के एक खाद्य तेल कारोबारी को 5-5 लाख रुपये के दो भुगतान किए गए। अगले दिन चाम्फाई के एक वैरायटी स्टोर के नाम पर करीब 10 लाख रुपये के 631 कार्टन रिफाइंड सोयाबीन तेल का इनवॉइस और ई-वे बिल जारी हुआ।
मिजोरम के त्लाबुंग स्थित एक फिलिंग स्टेशन को चुराचांदपुर के मिनी-ATM काउंटर से 10 लाख रुपये मिले। इसके बदले 14 किलोलीटर डीजल का बिल आइजोल के एक कारोबारी के नाम पर बनाया गया, जबकि डिलीवरी भारत-म्यांमार सीमा के पास जोरिनपुई में एक कैंप कार्यालय पर होनी थी।
6 मार्च 2026 को Go Alpha Trip ने दिल्ली के एक कपड़ा कारोबारी को 85,983 रुपये का भुगतान किया। ED की जांच के अनुसार, खरीदे गए कपड़े आगे म्यांमार भेजे गए।
जांच एजेंसी के मुताबिक, इन लेनदेन को अलग-अलग देखने पर सामान्य व्यापार का हिस्सा समझा जा सकता है। लेकिन जब भुगतान करने वाले खाते, इनवॉइस पर दर्ज खरीदार और सामान पहुंचने की जगह को एक साथ देखा गया, तो कथित नेटवर्क का पैटर्न सामने आया।
म्यांमार में बैठे मनी एक्सचेंजर्स की भूमिका भी जांच के दायरे में
ED के मुताबिक, कुछ भारतीय बैंक खाते म्यांमार में रहने वाले मनी एक्सचेंजर्स के निर्देश पर संचालित किए जा रहे थे। इन खातों में रकम आने के बाद पेट्रोल पंपों और दूसरे कारोबारी प्रतिष्ठानों को भुगतान किया जाता था। कुछ मामलों में तीसरे पक्ष से बैंक खातों में रकम आने और बदले में अन्य लोगों को नकदी देने की बात भी सामने आई है। मिजोरम के जाबरुल हक मामले में म्यांमार स्थित सप्लायर चिंटुआंग और उससे जुड़े बैंक खातों की जांच की गई। ED की रिपोर्ट के अनुसार, ड्रग्स की कीमत भारतीय खातों में जमा कराए जाने और उसके बराबर रकम म्यांमार में क्यात में सेटल किए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, नए ‘Drugs for Goods’ मॉड्यूल में जांच का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कथित नेटवर्क ने सामान की सप्लाई को ही भुगतान के साधन के रूप में इस्तेमाल किया। इससे भारतीय हिस्से में वैध कारोबार जैसा दिखने वाले लेनदेन और सीमा पार ड्रग्स के भुगतान के बीच संबंध की जांच करना अहम हो गया है।
अब किन कड़ियों को जोड़ रही है ED?
ED अब सीमावर्ती शहरों में सामान लेने वालों, खेप को म्यांमार तक पहुंचाने वालों, वहां सामान हासिल करने वाले लोगों और बैंक खातों को निर्देश देने वाले मनी एक्सचेंजर्स की पहचान करने में जुटी है। एजेंसी उन दूसरे पेट्रोल पंपों, दुकानों और सप्लायरों के लेनदेन की भी जांच कर रही है, जिनका इस्तेमाल इसी तरह किए जाने की आशंका है।
ऑपरेशन ट्राइडेंट के बाद सामने आया यह अपडेट ड्रग्स नेटवर्क के वित्तीय तौर-तरीकों की एक नई परत की ओर इशारा करता है, जहां कथित तौर पर ड्रग्स की कमाई को बैंकिंग लेनदेन और कारोबारी दस्तावेजों के जरिए सामान में बदला जाता था और उसी सामान से म्यांमार में भुगतान का हिसाब चुकाया जाता था।
