आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार को मजबूत करने की दिशा में नई रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी अब दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच संवाद और साझेदारी बढ़ाने के प्रयास में जुटी है। इसी कड़ी में कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग और अल्पसंख्यक विभाग ने संयुक्त रूप से एक व्यापक अभियान की रूपरेखा तैयार की है।
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी (फाइल फोटो- PTI)
दिल्ली से होगी अभियान की शुरुआत
इस पहल की शुरुआत 6 जून को दिल्ली में आयोजित होने वाले एक संयुक्त सम्मेलन से की जाएगी। कार्यक्रम में पार्टी पदाधिकारियों के अलावा सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है। उद्देश्य दोनों समुदायों से जुड़े सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक मुद्दों पर चर्चा कर आगे की रणनीति तय करना है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक सम्मेलन में तैयार होने वाले सुझावों और प्रस्तावों पर शीर्ष नेतृत्व के साथ विचार-विमर्श किया जाएगा। इसके बाद चुनावी राज्यों में इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
चुनावी राज्यों पर विशेष नजर
कांग्रेस की योजना उन राज्यों पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की है जहां निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। पार्टी का मानना है कि दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच बेहतर समन्वय राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आगे चलकर अति पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण समुदायों को भी इस व्यापक सामाजिक गठजोड़ से जोड़ने पर विचार किया जा रहा है।
राहुल गांधी के संदेश को आगे बढ़ाने की कोशिश
पार्टी नेतृत्व का मानना है कि सामाजिक न्याय, संविधान और समान अवसरों के मुद्दों पर जनता के बीच लगातार संवाद बनाए रखने की जरूरत है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और सामाजिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को जनता का सकारात्मक समर्थन मिला था, जिसे आगे भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाए रखा जाएगा।
आर्थिक मुद्दों को केंद्र में लाने की तैयारी
कांग्रेस का आकलन है कि आने वाले समय में महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक चुनौतियां राजनीतिक बहस के प्रमुख मुद्दे बन सकती हैं। पार्टी इन्हीं विषयों को केंद्र में रखकर अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार कर रही है और खुद को राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, कांग्रेस की यह कवायद केवल चुनावी समीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के मुद्दों के जरिए अपने पारंपरिक जनाधार को फिर से संगठित करने का प्रयास भी है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि दिल्ली से शुरू होने वाला यह अभियान राज्यों की चुनावी राजनीति में कितना असर छोड़ पाता है।
