कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सांसदों को ‘व्हिप के झंझट' से मुक्ति दिलाने के लिए लोकसभा में एक विधेयक पेश किया है। इसमें उन्होंने प्रस्ताव दिया है कि अच्छे कानून बनाने के लिए सांसदों को व्हिप से मुक्त किया जाए, ताकि वे पार्टी लाइन से हटकर भी वोट कर सकें। शुक्रवार को 'दलबदल रोधी कानून' में संशोधन के लिए गैर सरकार विधेयक प्रस्तुत करने वाले तिवारी कहा कि इस विधेयक का मकसद यह पता लगाना है कि लोकतंत्र में असली प्राथमिकता उस आम मतदाता की होनी चाहिए,जो अपने प्रतिनिधि को चुनने के लिए घंटों धूप में खड़ा रहता है न कि उस राजनीतिक दबाव की,जो सांसदों को व्हिप मानने के लिए मजबूर करता है।
कांग्रेस नेता मनीष तिवारी (संसद टीवी)
क्या है विधेयक का उद्देश्य?
कांग्रंस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि उनके प्रस्ताव का उद्देश्य है कि सांसदों को ऐसे सभी विधेयकों और प्रस्तावों पर स्वतंत्र रूप से वोट देने की आजादी मिले,जो सरकार की स्थिरता से सीधे तौर पर जुड़े नहीं हैं। वोटिंग में पार्टी लाइन से हटने पर सदस्यता तभी समाप्त होनी चाहिए,जब मामला अविश्वास प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, वित्त विधेयक या किसी महत्वपूर्ण वित्तीय मामलों से संबंधित मुद्दे हों। उन्होंने जोर दिया कि बाकी सभी विषयों पर सांसदों को अपने विवेक,निर्वाचन क्षेत्र की अपेक्षाओं और जनहित को ध्यान में रखते हुए फैसला करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। तिवारी ने कहा कि इस विधेयक का दोहरा उद्देश्य है पहला यह कि सरकार की स्थिरता सुनिश्चित रहे, और दूसरी कि सांसदों को वैधानिक स्वतंत्रता भी मिले, ताकि वे पार्टी नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ के अनुरूप वोट कर सकें। उन्होंने माना कि व्हिप की अनिवार्यता कम करने से संसद में वास्तविक बहस और गुणवत्ता वाली कानून-निर्माण प्रक्रिया मजबूत होगी।
पहले भी पेश कर चुके हैं यह बिल
गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है जब मनीष तिवारी ने यह मांग उठाई है। वह 2010 और 2021 में भी इसी तरह का विधेयक सदन के पटल पर रख चुके हैं। उनका तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था में सांसद अपनी पार्टी के व्हिप के कारण अक्सर महज आंकड़े बनकर रह जाते हैं, और उनकी व्यक्तिगत भूमिका व तर्कशीलता दब जाती है।
व्हिप सिस्टम पर पूछा सवाल
व्हिप सिस्टम पर सवाल करते हुए कांग्रेस सांसद ने कहा कि किसी मंत्रालय का संयुक्त सचिव कानून तैयार करता है, मंत्री एक तैयार बयान पढ़ते हैं, फिर उस पर औपचारिक चर्चा होती है और अंत में व्हिप के दबाव में सत्तापक्ष पक्ष में और विपक्ष विरोध में वोट कर देता है। ऐसे में अच्छे कानून बनाने का मूल उद्देश्य ही कमजोर हो जाता है।
विधेयक में यह सुझाव भी दिए गए
विधेयक के उद्देश्य और कारणों की व्याख्या में कहा गया है कि अगर किसी सांसद का राजनीतिक दल उक्त प्रस्तावों, विधेयक या वित्तीय मामलों पर सभापति या लोकसभा अध्यक्ष के पास कोई निर्देश भेजता है तो उन्हें जितना जल्दी संभव हो सके, सदन में इसकी जानकारी देनी चाहिए। ऐसी जानकारी साझा करते समय सदन के सभापति या अध्यक्ष को यह भी विशेष रूप से सूचित करना चाहिए कि यदि किसी सांसद की सदस्यता व्हिप उल्लंघन के आधार पर समाप्त होती है, तो उसे 15 दिन के भीतर अपील का अधिकार मिले। सभापति या लोकसभा अध्यक्ष को 60 दिनों में उस अपील पर फैसला करना होगा। 10वीं अनुसूची (दलबदल कानून) से जुड़े मामलों को सुनने के लिए उच्चतम न्यायालय की खंडपीठ वाला एक न्यायिक अधिकरण बनाया जाए। इसके निर्णय को पांच न्यायाधीशों की पीठ में चुनौती दी जा सके, और उसके बाद ओपन कोर्ट में वैधानिक पुनरीक्षण की प्रक्रिया उपलब्ध रहे।
