Brij Bhushan Sharan Singh Acquittal: भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों की ओर से लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों का मामला 2023 में देश की राजनीति और खेल जगत के केंद्र में आ गया था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहलवानों का धरना हुआ, मामला अदालत पहुंचा और दिल्ली पुलिस की जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल हुआ।
बृजभूषण मामले में अदालत ने कैसे पकड़ी 'राजनीतिक साजिश'? शिकायतों का पैटर्न, बदलते बयान और वे कड़ियां जिन पर उठे सवाल
अब इस मामले में निचली अदालत के फैसले ने विवाद का एक दूसरा पक्ष सामने रखा है। अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह को आरोपों से बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। लेकिन फैसला यहीं नहीं रुका। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का सामूहिक रूप से आकलन करते हुए आरोपों को “झूठा और मनगढ़ंत” बताया और उनके पीछे “राजनीतिक रूप से प्रेरित” गहरी साजिश होने की बात कही।
सवाल है कि अदालत इस निष्कर्ष तक पहुंची कैसे? फैसले के विश्लेषण को करीब से देखने पर कई कड़ियां सामने आती हैं।
छह शिकायतों से शुरू हुआ था मामला
पुलिस के पास छह अलग-अलग शिकायतें पहुंचीं। इन्हीं शिकायतों के आधार पर बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई। बाद में पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया और अदालत ने बृजभूषण के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 354, 354ए और 506(भाग-1) के तहत आरोप तय किए। विनोद तोमर के खिलाफ धारा 506(भाग-1) के तहत आरोप तय हुआ।
मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ी तो अभियोजन के सामने सबसे बड़ी चुनौती गवाहों के बयानों की विश्वसनीयता को लेकर खड़ी हुई।
खास तौर पर पीड़िता संख्या पांच यानी पीडब्ल्यू-5 के मामले में अदालत ने कई कथित घटनाओं को अलग-अलग परखा और पाया कि शुरुआती बयानों और बाद की गवाही में महत्वपूर्ण अंतर था।
तुर्की या मंगोलिया? पहली घटना पर ही सवाल
पीडब्ल्यू-5 ने बृजभूषण पर कई घटनाओं में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इनमें एक कथित घटना को लेकर अदालत ने विशेष ध्यान दिया।
एक बयान में घटना को 2015 में तुर्की में होना बताया गया, जबकि बाद के बयान में वही घटना 2016 में मंगोलिया में होने की बात कही गई।
अदालत ने इसे केवल तारीख या स्थान भूल जाने जैसी मामूली गलती नहीं माना। यहां घटना का देश और वर्ष दोनों बदल गए थे।
मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह थी कि बाद वाले बयान में कथित घटना को ऐसे स्थान पर हुआ बताया गया था जहां कई खिलाड़ी, प्रशिक्षक और अन्य लोग मौजूद थे। दो गवाहों को भी कथित घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था।
लेकिन अदालत के सामने यह तथ्य आया कि इन कथित प्रत्यक्षदर्शियों ने उस समय या उसके तुरंत बाद कोई शिकायत नहीं की। अदालत ने इस चुप्पी को भी गवाह की विश्वसनीयता परखने वाली परिस्थितियों में शामिल किया।
WFI ऑफिस की घटना और बदली हुई तारीख
दूसरा महत्वपूर्ण मामला डब्ल्यूएफआई कार्यालय से जुड़ा था। पीडब्ल्यू-5 ने निगरानी समिति के सामने दिए गए हलफनामे में कथित घटना की तारीख 15 अक्टूबर 2017 बताई थी। बाद में अदालत के सामने दिए बयान में तारीख 16 अक्टूबर कर दी गई और कथित घटनाओं को 16 और 17 अक्टूबर की दो अलग घटनाओं के रूप में पेश किया गया। अदालत ने इस बदलाव को महत्वपूर्ण माना।
वजह यह थी कि 15 अक्टूबर 2017 रविवार था और पीडब्ल्यू-5 ने खुद माना था कि रविवार को डब्ल्यूएफआई कार्यालय बंद रहता था। यानी बाद के बयान में तारीख बदलने से कथित घटना उस दिन पहुंच गई जब कार्यालय खुला था।
अदालत ने इसे सामान्य भूल नहीं बल्कि महत्वपूर्ण सुधार माना। बाद में एक ही कथित घटना को दो अलग तारीखों में बांटने को भी अदालत ने गवाही की विश्वसनीयता कमजोर करने वाला तथ्य माना।
भीड़ के बीच कथित घटना, लेकिन स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं
पीडब्ल्यू-5 ने जनवरी 2018 में दिल्ली के सिरी फोर्ट स्टेडियम में भी एक कथित घटना का आरोप लगाया। आरोप था कि बृजभूषण ने उन्हें जबरन गले लगाया और उन्होंने उन्हें धक्का देकर अलग किया।
कथित घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई थी। वहां खिलाड़ी, प्रशिक्षक, परिवार के सदस्य, पत्रकार और दूसरे लोग मौजूद थे। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि घटना इतने लोगों के सामने हुई तो स्वतंत्र गवाही कहां है?
पीडब्ल्यू-10 और पीडब्ल्यू-15 को इस घटना से जुड़ा गवाह बताया गया था। लेकिन अदालत के अनुसार उनकी गवाही से जबरन गले लगाने या पीडब्ल्यू-5 के आरोपी को धक्का देने की बात की पर्याप्त पुष्टि नहीं हुई।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि कथित घटना की निश्चित तारीख नहीं बताई गई और घटनास्थल की पहचान कराने के लिए पुलिस के साथ जाने से भी पीडब्ल्यू-5 ने इनकार किया था।
जकार्ता और कजाकिस्तान की घटनाएं बाद में क्यों सामने आईं?
अदालत ने पीडब्ल्यू-5 के बयानों में एक और पैटर्न देखा। 2018 के एशियाई खेलों के दौरान जकार्ता में हुई कथित घटना का उल्लेख निगरानी समिति के सामने दिए गए पहले हलफनामे में नहीं था। यह आरोप बाद की शिकायत में सामने आया।
इसी तरह टोक्यो ओलंपिक की पात्रता प्रतियोगिता से जुड़ी कजाकिस्तान की कथित घटना भी शुरुआती बयान में नहीं थी। इसे बाद में जोड़ा गया।
अदालत ने इन दोनों को महत्वपूर्ण सुधार माना। उसके सामने सवाल था कि जब शुरुआती हलफनामे विस्तृत थे, तब बाद में सामने आए इन स्वतंत्र आरोपों का पहले उल्लेख क्यों नहीं किया गया।
घटना के बाद का व्यवहार भी अदालत ने देखा
फैसले में कथित घटनाओं के बाद शिकायतकर्ताओं और आरोपी के बीच संबंधों को भी एक परिस्थिति के रूप में देखा गया। पीडब्ल्यू-5 के पति को जकार्ता की कथित घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था। लेकिन दस्तावेज के मुताबिक बाद में पीडब्ल्यू-5 और उनके पति ने बृजभूषण से सामान्य संबंध बनाए रखे। दिसंबर 2018 में शादी के बाद दोनों उनके घर आशीर्वाद लेने भी गए थे। इस मुलाकात की तस्वीर बचाव पक्ष ने अदालत में पेश की।
अदालत ने इस व्यवहार को अकेले निर्णायक नहीं माना। लेकिन इसे कथित घटनाओं के बाद तत्काल शिकायत के अभाव और गवाहों के दूसरे विरोधाभासी बयानों के साथ पढ़ा।
यानी अदालत की दृष्टि में सवाल सिर्फ यह नहीं था कि कोई व्यक्ति घटना के बाद आरोपी से मिला या नहीं। सवाल यह था कि कथित गंभीर घटनाओं के बाद संबंधित लोगों का पूरा आचरण अभियोजन की कहानी से कितना मेल खाता है।
पीडब्ल्यू-12 के मामले में आधिकारिक कार्यक्रम बना अहम सबूत
एक अन्य शिकायतकर्ता पीडब्ल्यू-12 ने फरवरी 2018 में किर्गिस्तान के बिश्केक में कथित घटना का आरोप लगाया था।बचाव पक्ष ने प्रतियोगिता का आधिकारिक कार्यक्रम अदालत के सामने रखा। उसके मुताबिक पीडब्ल्यू-12 जिस 59 किलोग्राम वर्ग में हिस्सा ले रही थीं, उसकी मुकाबले की तारीख 1 मार्च 2018 थी। जबकि कथित घटना 28 फरवरी को बताई गई थी और उसे मुकाबले शुरू होने से पहले का समय बताया गया था।
जिरह के दौरान पीडब्ल्यू-12 ने आधिकारिक कार्यक्रम की स्थिति स्वीकार की। अदालत ने इस दस्तावेजी साक्ष्य को कथित घटना की संभावना के खिलाफ महत्वपूर्ण परिस्थिति माना।
दो कथित पीड़ित अदालत में अभियोजन के साथ नहीं रहीं
मामले में पीडब्ल्यू-7 और पीडब्ल्यू-8 की गवाही ने भी अदालत की सोच को प्रभावित किया। दोनों को कथित पीड़ित के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन सुनवाई के दौरान उन्होंने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। दोनों को विरोधी गवाह घोषित किया गया।
दस्तावेज के मुताबिक पीडब्ल्यू-7 ने अदालत में कहा कि बृजभूषण ने उसके साथ ऐसा कुछ नहीं किया। उसने यह भी कहा कि उसका पहले का दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत बयान दबाव में लिया गया था।
दोनों गवाहों ने कथित तौर पर पीडब्ल्यू-5 और पीडब्ल्यू-10 पर उन्हें आरोपी के खिलाफ शिकायत करने के लिए तैयार करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें बताया गया था कि बृजभूषण के डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष बने रहने से हरियाणा के पहलवानों के भविष्य पर असर पड़ेगा।
अदालत ने इन बयानों को महत्वपूर्ण माना, खासकर इसलिए कि दोनों गवाहों ने अदालत में यौन उत्पीड़न की घटना से साफ इनकार किया।
अदालत ने कहा पूरे आरोप 'झूठे और मनगढ़ंत' थे
शिकायतों की समानता ने बढ़ाया संदेह
यहीं से फैसले में पूर्व नियोजन और कथित रूप से गवाहों को तैयार किए जाने का पहलू सामने आता है। अदालत ने दोनों विरोधी गवाहों की शिकायतों और बयानों में समानताएं देखीं। उनके मामलों में पीडब्ल्यू-10 का पता भी जुड़ा हुआ था।
अदालत ने माना कि आरोपों की समानता, उनके लगभग एक ही समय पर सामने आने और एक ही स्थान से जुड़े होने की परिस्थितियां पहले से योजना बनाए जाने और गवाहों को तैयार किए जाने की ओर संकेत करती हैं।
फैसले में यह भी दर्ज है कि अदालत के सामने दोनों कथित पीड़ितों ने अपने पुराने आरोपों का समर्थन नहीं किया और यौन उत्पीड़न से इनकार किया।
‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ टिप्पणी का आधार क्या था?
फैसले का सबसे चर्चित हिस्सा इसी बिंदु से जुड़ा है। अदालत ने आरोपों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय उनके पूरे पैटर्न को एक साथ देखा। शिकायतों की समानता, उनके सामने आने का समय, गवाहों के बयानों में बदलाव, कथित घटनाओं के बाद का व्यवहार और दो कथित पीड़ितों का मुकदमे के दौरान अभियोजन से अलग हो जाना—इन सबको अदालत ने एक साथ परखा।
फैसले के विश्लेषण के मुताबिक अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से आरोपों के पीछे पहले से योजना बनाए जाने की बात सामने आती है। इसके बाद अदालत ने आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को “झूठा और मनगढ़ंत” बताते हुए कहा कि वे पीडब्ल्यू-5, पीडब्ल्यू-10 और महादेव अकादमी से जुड़े प्रशिक्षकों की ओर से एक गहरी और राजनीतिक रूप से प्रेरित साजिश में लगाए गए प्रतीत होते हैं। यही टिप्पणी इस फैसले को महज बरी किए जाने के फैसले से अलग बनाती है। अदालत ने केवल ‘राजनीतिक साजिश’ के आधार पर बरी नहीं किया।
बृजभूषण शरण सिंह को बरी करने का आधार केवल अदालत की राजनीतिक साजिश वाली टिप्पणी नहीं थी। अदालत ने अभियोजन के पूरे साक्ष्य को परखा और पाया कि आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए जरूरी विश्वसनीयता नहीं बन पाई।
अदालत ने गवाहों के अलग-अलग बयानों में विरोधाभास, बाद में जोड़े गए आरोप, दस्तावेजों से टकराती तारीखें और परिस्थितियां, स्वतंत्र पुष्टि की कमी, कथित प्रत्यक्षदर्शियों की भूमिका, घटना के बाद का व्यवहार और विरोधी गवाहों की गवाही इन सबका सामूहिक आकलन किया।
अंत में अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। इसके बाद बृजभूषण शरण सिंह को भारतीय दंड संहिता की धाराओं (IPC) 354, 354ए और 506(1) के आरोपों से बरी कर दिया गया। विनोद तोमर को भी धारा 506(1) के आरोप से बरी किया गया।
फैसले की सबसे अहम पंक्ति क्या बताती है?
इस पूरे फैसले को सिर्फ एक पंक्ति में समेटना हो तो मामला यह है कि अदालत ने एक-दो विरोधाभासों के आधार पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों के पूरे ढांचे को देखकर अभियोजन की कहानी पर भरोसा करने से इनकार किया।
अदालत ने देखा कि कुछ कथित घटनाओं की तारीख और जगह बदलती है, कुछ आरोप बाद में सामने आते हैं, कुछ दस्तावेज कथित घटनाओं की परिस्थितियों से मेल नहीं खाते, कथित प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पूरी तरह पुष्टि नहीं करती और दो कथित पीड़ित अदालत में अभियोजन की कहानी से अलग हो जाती हैं।
इसके साथ शिकायतों की समानता और उनके सामने आने की परिस्थितियों को जोड़ते हुए अदालत ने पूर्व नियोजन और राजनीतिक मकसद की संभावना का निष्कर्ष निकाला।
इसलिए इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सिर्फ यह नहीं कि बृजभूषण शरण सिंह बरी हो गए। महत्वपूर्ण यह भी है कि अदालत ने अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए उसके पीछे 'झूठे और मनगढ़ंत आरोप' तथा 'राजनीतिक रूप से प्रेरित गहरी साजिश' जैसी बेहद कड़ी टिप्पणियां कीं।
आदेश में अदालत कि अहम टिप्पणी
अदालत की सबसे कड़ी टिप्पणी फैसले के पैरा 72 में आती है। अदालत ने कहा कि पीड़ित के तौर पर पेश की गईं 'P.' और 'I.P.' की अदालत में दी गई गवाही ने अभियोजन के मामले को पूरी तरह अविश्वसनीय कर दिया। अदालत ने आगे कहा कि इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पूरे आरोप 'झूठे और मनगढ़ंत' थे, जिन्हें 'V.P.', 'B.P.' और महादेव अकादमी के प्रशिक्षकों के कहने पर आरोपियों के खिलाफ सामूहिक रूप से एक 'गहरी साजिश' के तहत गढ़ा गया। अदालत ने इस साजिश को 'राजनीतिक रूप से प्रेरित' बताया। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि 'P.' और 'I.P.' को शुरुआत से ही पीड़ित के रूप में पेश किया गया था, लेकिन जब वे अदालत के सामने आईं तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न का कोई कृत्य नहीं हुआ था।
