बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (Baba Bageshwar) अक्सर अपने बयानों से सुर्खियों में रहते हैं। बद्रीनाथ की साधना के बाद बाबा बागेश्वर ने कहा कि भारत को अब एक नया मंत्र अपनाना चाहिए एक देश, एक चुनाव।”
बद्रीनाथ धाम में एक देश-एक चुनाव पर बोले बागेश्वर सरकार।
उन्होंने कहा कि देश में पंच, सरपंच, मेयर, पार्षद, विधायक और सांसद तक के सभी चुनाव एक साथ होने चाहिए, ताकि बार-बार होने वाले हजारों करोड़ रुपये के खर्च, भारी पुलिस बल की तैनाती और प्रशासनिक व्यस्तताओं से देश को राहत मिल सके।
'देश का समय, धन और संसाधन तीनों बचेंगे'
उन्होंने कहा कि इससे नेताओं को भी लाभ होगा, क्योंकि उन्हें बार-बार चुनाव प्रचार के लिए नहीं जाना पड़ेगा एक ही सभा और एक ही प्रचार अभियान में गांव के पंच से लेकर सांसद तक सभी उम्मीदवारों का प्रचार हो जाएगा बाबा बागेश्वर ने कहा कि यदि भारत इस व्यवस्था को अपनाता है, तो देश का समय, धन और संसाधन तीनों बचेंगे।
उन्होंने इस विषय पर पूरे देश में व्यापक चर्चा की आवश्यकता बताई। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है, ऐसे समय में भारत को आर्थिक रूप से और अधिक संगठित एवं मजबूत निर्णय लेने की आवश्यकता है।
देश की अर्थव्यवस्था पर क्या बोले धीरेंद्र शास्त्री?
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने देश की आर्थिक स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है और ऐसे समय में भारत को संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग करना चाहिए। उनके अनुसार चुनावी खर्च में कमी लाकर विकास और बुनियादी ढांचे पर ज्यादा निवेश किया जा सकता है।
क्या है एक देश, एक चुनाव?
एक देश, एक चुनाव (One Nation, One Election) का मतलब है कि देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाएं, ताकि मतदाता एक ही समय पर सांसद और विधायक दोनों का चुनाव कर सकें। वर्तमान में भारत में अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, जबकि लोकसभा चुनाव हर पांच साल में आयोजित किए जाते हैं।
इस व्यवस्था को बदलकर पूरे देश में एक तय समय पर चुनाव कराने का प्रस्ताव है। सरकार का मानना है कि इससे चुनावी खर्च में कमी आएगी, बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता से राहत मिलेगी और प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा। हालांकि, विपक्षी दलों और कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि इससे संघीय ढांचे और क्षेत्रीय मुद्दों पर असर पड़ सकता है। उल्लेखनीय है कि आजादी के बाद शुरुआती चार आम चुनावों (1952 से 1967 तक) में लोकसभा और अधिकांश विधानसभा चुनाव एक साथ ही कराए जाते थे।
