Sugar Cravings in Evening: ऑफिस से लौटे। बैग रखा। जूते भी ठीक से नहीं उतारे और मन में आया कि कुछ मीठा मिल जाए तो अच्छा लगेगा। डिनर बनने में अभी वक्त है। ऐसे में कभी मिठाई का डिब्बा खुलता है, कभी बिस्कुट का पैकेट। खाने के बाद थोड़ी राहत मिलती है। फिर खयाल आता है कि आज भी जरूरत से ज्यादा खा लिया।
शाम को मीठा खाने का मन क्यों करता है (AI Image)
इस अनुभव को हम अक्सर अपनी कमजोर इच्छाशक्ति से जोड़ लेते हैं। लेकिन शाम की भूख को समझने के लिए सुबह की प्लेट देखना भी जरूरी है। क्या नाश्ता सिर्फ चाय था? लंच मीटिंग के बीच जल्दबाजी में हुआ? दोपहर के बाद कुछ खाया ही नहीं? मीठे की इच्छा की एक ही वजह नहीं होती। कभी पेट खाली होता है। कभी मन थका होता है। कई बार दोनों बातें एक साथ हो रही होती हैं।
सुबह की चाय को नाश्ता तो नहीं मान लिया
सुबह घर से निकलने की जल्दी में अपना खाना इग्नोर हो जाता है। बच्चों का टिफिन तैयार है। अपना लंच भी पैक है। लेकिन खुद के लिए बस चाय और दो बिस्कुट।
इससे कुछ देर राहत मिल सकती है, मगर यह बैलेंस्ड नाश्ता नहीं है। अगर इसके बाद दोपहर तक कुछ नहीं खाते, तो अगली बार खाने बैठते समय भूख काफी तेज हो सकती है। भोजन टालने या छोड़ने से बाद में ज्यादा खाने की संभावना बढ़ सकती है।
अपने नाश्ते में देखें कि पेट भरने वाला खाना है या सिर्फ जल्दी में कुछ पिया ही है। पोहे के साथ दही, मूंग दाल का चीला, सब्जियों वाला बेसन चीला या दूध के साथ ओट्स जैसे विकल्प अपनी पसंद और जरूरत के हिसाब से शामिल किए जा सकते हैं।
लंच हुआ, लेकिन क्या थाली पूरी थी
टिफिन खोलकर दो रोटी और थोड़ी सब्जी खा ली। खाना हुआ जरूर, लेकिन क्या उसमें दाल, चना, राजमा, दही, पनीर या कोई दूसरा प्रोटीन वाला विकल्प भी था?
संतुलित खाने में अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थों की जगह होती है। रोटी या चावल के साथ प्रोटीन के स्रोत, सब्जियां और दिनभर में फल शामिल करना भोजन को बेहतर संतुलन देता है। केवल एक चीज कम कर देने से थाली अपने आप पूरी नहीं हो जाती।
मसलन, वजन घटाने के लिए चावल छोड़ दिए, लेकिन उनकी जगह कुछ और पर्याप्त नहीं खाया। या लंच में केवल सलाद लिया और शाम तक उसी के सहारे रहे। ऐसे में घर लौटते समय तेज भूख लगना असामान्य नहीं है। मीठा सामने हो, आसानी से मिल रहा हो और पसंद भी हो, तो हाथ उसी की तरफ बढ़ सकता है।
दोपहर से डिनर तक कितना लंबा गैप है
दोपहर एक बजे लंच और रात नौ बजे डिनर। बीच में दो कप चाय। ऑफिस में यह रूटीन आम है। लेकिन चाय हर बार खाने की जरूरत पूरी नहीं करती। अगर शाम को भूख लगती है और डिनर देर से होता है, तो ऑफिस से निकलने से पहले एक छोटा स्नैक मीठे से बचने में मददगार हो सकता है।
विकल्प बहुत महंगे या खास होने की जरूरत नहीं है। फल के साथ भुना चना, सादा दही, थोड़ा मेवा या छोटा पनीर सैंडविच रख सकते हैं। मात्रा अपनी भूख के हिसाब से चुनें। भूख नहीं है, तो केवल घड़ी देखकर स्नैक खाना जरूरी नहीं।
कभी पेट से ज्यादा मन को राहत चाहिए होती है
दिनभर की मीटिंग, ट्रैफिक, काम की डेडलाइन और घर पहुंचकर बाकी जिम्मेदारियां। इस सबके बीच पसंद की मिठाई कुछ पल का सुकून दे सकती है। तनाव या मुश्किल भावनाओं के जवाब में खाना खाने को इमोशनल ईटिंग कहा जाता है। इसमें मीठे और ज्यादा कैलोरी वाले खाने की तरफ झुकाव हो सकता है।
ऐसे समय खुद से पूछें- अभी भूख लगी है, कुछ खास खाने का मन है या थोड़ी देर आराम चाहिए? इस सवाल का मकसद खुद को खाने से रोकना नहीं है। अपनी जरूरत पहचानना है। भूख है तो खाना खाएं। दिन भारी रहा है तो कपड़े बदलकर कुछ देर बैठना, किसी अपने से बात करना या शांत माहौल में चाय पीना भी राहत दे सकता है।
क्या नींद पूरी हुई थी
कुछ दिनों में वही ऑफिस और वही टिफिन होने के बावजूद स्नैकिंग ज्यादा होती है। ऐसे में पिछली रात की नींद देखिए। कम नींद भूख और ज्यादा कैलोरी वाले खाने की इच्छा बढ़ा सकती है। इसलिए शाम की क्रेविंग समझते समय सिर्फ खाने का हिसाब रखना काफी नहीं, नींद का पैटर्न भी देखना चाहिए।
देर रात तक फोन देखना और सुबह जल्दी उठना रोज की आदत है, तो इसे बदलने की कोशिश करें। ये भी मीठे की क्रेविंग कम करता है।
मीठा खा लिया तो अगला खाना मत छोड़िए
कभी पसंद की मिठाई खाना सामान्य है। उसे खा लेने के बाद अपराधबोध में डिनर छोड़ देना अगले लंबे गैप की शुरुआत बन सकता है। बेहतर है कि मिठाई प्लेट में निकालकर आराम से खाएं और अगला भोजन अपनी भूख के हिसाब से लें। सिर्फ मीठा खाने का मन होने से डायबिटीज, लो ब्लड शुगर या किसी पोषक तत्व की कमी का निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता। लगातार परेशानी हो या दूसरे लक्षण साथ हों, तो डॉक्टर से बात करें।
