क्या आपने कभी महसूस किया है कि जैसे ही दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं, अचानक मन उदास-सा हो जाता है, शरीर थकने लगता है और नींद जरूरत से ज्यादा आने लगती है? कई बार हम सोचते हैं कि यह सिर्फ आलस या मौसम की थकान है, लेकिन दरअसल यह सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर यानी SAD का संकेत हो सकता है। इसे साधारण भाषा में सीजनल डिप्रेशन भी कहा जाता है।
seasonal affective depression
SAD आखिर क्यों होता है
SAD डिप्रेशन का एक प्रकार है, जो आमतौर पर ठंड के मौसम में या दिन के उजाले में कमी आने पर ज्यादा दिखाई देता है। इस दौरान धूप की कमी से दिमाग में सेरोटोनिन नाम का हार्मोन घट जाता है, जो मूड को नियंत्रित करता है। वहीं ठंड और अंधेरे में शरीर ज्यादा मेलाटोनिन बनाता है, जिससे नींद बढ़ जाती है और ऊर्जा घट जाती है। इसी वजह से शरीर की प्राकृतिक बॉडी क्लॉक यानी सर्केडियन रिद्म बिगड़ जाती है और नींद-जागने का पैटर्न असामान्य हो जाता है।
किन लोगों पर ज्यादा असर होता है
शोध बताते हैं कि पहाड़ी और उत्तरी इलाकों में रहने वाले लोगों को SAD का खतरा ज्यादा होता है, क्योंकि वहां धूप का समय सीमित होता है। महिलाओं और 18 से 30 वर्ष की उम्र के युवाओं पर इसका असर और भी ज्यादा देखा गया है। 2022 में जर्नल ऑफ अफेक्टिव डिसऑर्डर्स में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि अर्बन इंडिया में लगभग 12 से 15 प्रतिशत लोग हल्के या गंभीर सीजनल डिप्रेशन का अनुभव करते हैं।
लक्षण कैसे पहचानें
अगर किसी को लगातार थकान महसूस हो, नींद जरूरत से ज्यादा आए, मूड बार-बार खराब रहे और छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन दिखे तो यह SAD का संकेत हो सकता है। ऐसे लोगों में काम के प्रति रुचि कम हो जाती है और अक्सर ज्यादा मीठा या कार्बोहाइड्रेट खाने की इच्छा बढ़ जाती है। धीरे-धीरे वे लोगों से कटकर अकेलापन भी महसूस करने लगते हैं।
इससे बचाव के आसान उपाय
SAD से निपटने के लिए दवाइयों की जरूरत हर बार नहीं होती, बल्कि कुछ छोटे-छोटे बदलाव काफी मदद कर सकते हैं। सबसे पहले रोजाना कम से कम 20 से 30 मिनट धूप में समय बिताएं। विदेशों में लाइट थेरेपी का भी इस्तेमाल होता है, जिसमें खास लाइट बॉक्स प्राकृतिक धूप जैसा असर देता है। इसके अलावा संतुलित आहार और नियमित व्यायाम बेहद जरूरी है। ताजे फल-सब्जियां, ओमेगा-3 युक्त भोजन और रोजाना शारीरिक गतिविधियां मूड को बेहतर बनाती हैं। अगर इसके बावजूद लक्षण बने रहें तो मनोचिकित्सक से सलाह जरूर लेनी चाहिए।
नजरअंदाज न करें
बदलते मौसम का असर सिर्फ बाहर के माहौल पर नहीं, बल्कि हमारे दिमाग और भावनाओं पर भी पड़ता है। इसलिए अगर आप या आपके आसपास कोई इन लक्षणों से गुजर रहा हो तो इसे हल्के में न लें। समय रहते कदम उठाना ही इस समस्या से बचाव का सबसे आसान तरीका है।
Source: IANS
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत लेख में सुझाए गए टिप्स और सलाह केवल आम जानकारी के लिए हैं और इसे पेशेवर चिकित्सा सलाह के रूप में नहीं लिया जा सकता। किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी तरह का बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श जरूर लें।
