द ग्रेट इंडियन स्लीप क्राइसिस: 1947 से 2026 तक, इतनी बदतर कैसे हो गई हम भारतीयों की नींद?

फिटबिट समेत दूसरी ग्लोबल स्लीप ट्रैकिंग स्टडीज के आंकड़ों की मानें तो भारतीय औसतन 6 से 6.5 घंटे ही सो पाते हैं। यह एशिया में जापान के बाद सबसे कम है।

याद कीजिए सन 1947 का भारत। देश नया-नया आजाद हुआ था। तब भारत कृषि प्रधान देश था। देश की करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गांवों में रहती थी। तब लोगों की दिनचर्या सूरज से तय होती थी। सूरज उगा, तो लोग जागे। सूरज ढला, तो काम बंद। बिजली की रोशनी बहुत कम घरों तक पहुंची थी। रात का मतलब सिर्फ अंधेरा और आराम था। लोग औसतन 8 से 9 घंटे की गहरी नींद सोते थे।

Sleep depriviation of Indians

पिछले 80 सालों में कितनी खराब हो चुकी है हम भारतीयों की नींद

अब साल 2026 में आ जाइए। भारत की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। हमारे शहर 24 घंटे जगमगा रहे हैं। काम की शिफ्ट्स रात-दिन चल रही हैं। हाथ में स्मार्टफोन है। कमरे में ट्यूबलाइट और एलईडी हैं। इस विकास की एक बड़ी कीमत हमने चुकाई है। वह कीमत है- हमारी नींद।

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