Childhood Obesity: आज के समय में भारत में बच्चों के बीच मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही है। पहले जहां मोटापा ज्यादातर बड़ों की परेशानी माना जाता था, वहीं अब बड़ी संख्या में बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पोषण संस्थान (ICMR-NIN) ने भी बच्चों में बढ़ते वजन और खराब खान-पान की आदतों को लेकर चिंता जताई है। इसी समस्या (Overweight Children) को देखते हुए-लेट्स फिक्स आवर फूड (LFOF) पहल के तहत एक नीति दस्तावेज जारी किया गया है, जिसमें बच्चों और किशोरों के लिए बेहतर खान-पान और स्वस्थ माहौल बनाने से जुड़े सुझाव दिए गए हैं।
भारत में बच्चों का बढ़ता मोटापा
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में भारत में 5 से 19 साल की उम्र के करीब 4.1 करोड़ बच्चे अधिक वजन या मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं। अगर बच्चों के खाने-पीने की मौजूदा आदतों में बदलाव नहीं किया गया और जंक फूड, ज्यादा चीनी वाले पेय और अस्वास्थ्यकर भोजन का चलन इसी तरह बढ़ता रहा, तो साल 2030 तक दुनिया में बचपन के मोटापे के कुल मामलों में भारत की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से ज्यादा हो सकती है। यह स्थिति बताती है कि बच्चों की डाइट और लाइफस्टाइल में समय रहते सुधार करना बेहद जरूरी है।
बच्चों में क्यों बढ़ रहा है मोटापा
बच्चों की लाइफस्टाइल से खेलकूद और शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। मोबाइल, टीवी और इंटरनेट पर बच्चे ज्यादा समय बिता रहे हैं। इसके अलावा बाजार में मिलने वाले पिज्जा, बर्गर, चिप्स, पैकेट वाले स्नैक्स और मीठे पेय पदार्थ बच्चों की पसंद बनते जा रहे हैं।
इन चीजों में ज्यादा मात्रा में चीनी, नमक और खराब फैट पाया जाता है, जो धीरे-धीरे बच्चों का वजन बढ़ाने के साथ कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बचपन का मोटापा आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी बीमारियों का कारण बन सकता है।
जंक फूड विज्ञापनों पर लगाम लगाने की जरूरत
ICMR-NIN की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि बच्चों को ध्यान में रखकर बनाए जाने वाले जंक फूड के विज्ञापनों पर सख्त नियम होने चाहिए। अक्सर टीवी, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ऐसे विज्ञापन दिखाए जाते हैं, जो बच्चों को ज्यादा चीनी और नमक वाले खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित करते हैं। अगर ऐसे विज्ञापनों को नियंत्रित किया जाए, तो बच्चों में इन चीजों की मांग को कम किया जा सकता है।
खाने की चीजों पर साफ-साफ जानकारी जरूरी
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पैकेट वाले खाद्य पदार्थों पर साफ लेबल होना चाहिए। इससे माता-पिता आसानी से समझ सकेंगे कि किसी चीज में कितनी मात्रा में चीनी, नमक या फैट मौजूद है। जब लोगों को खाने की चीजों की सही जानकारी मिलेगी, तो वे बच्चों के लिए बेहतर विकल्प चुन पाएंगे।
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स्कूलों में भी बदलना होगा खाने का माहौल
बच्चों की खाने की आदतें सुधारने में स्कूलों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। स्कूल कैंटीन में ज्यादा तेल, चीनी और नमक वाली चीजों की बिक्री को कम किया जाना चाहिए। इसके बजाय बच्चों को फल, पौष्टिक भोजन, साबुत अनाज और हेल्दी स्नैक्स उपलब्ध कराने पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही स्कूलों में खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों को भी बढ़ावा देना जरूरी है।
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समय रहते उठाने होंगे कदम
इस पहल को UNICEF, WHO, FSSAI जैसे कई संगठनों का समर्थन मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अभी से बच्चों के खाने और जीवनशैली में सुधार किया जाए, तो भविष्य में उन्हें कई गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है। बच्चों का स्वास्थ्य देश के भविष्य से जुड़ा हुआ है। इसलिए माता-पिता, स्कूल, सरकार और खाद्य कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। अगर आज सही कदम उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ी को ज्यादा स्वस्थ और बेहतर जीवन दिया जा सकता है।
