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स्पाई सैटेलाइट की दुनिया: कौन-सा देश कितना ताकतवर और भारत कहां खड़ा है? कैसे करता है काम

Spy Satellite: जासूसी उपग्रह यानि कि स्पाई सैटेलाइट की दुनिया में अमेरिका बेताज बादशाह है लेकिन इस शक्तिशाली ग्रुप में भारत भी अहम स्थान रखता है । आइए जानते हैं स्पाई सैटेलाइट की दुनिया को

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दुनिया की सबसे ताकतवर जासूसी सैटेलाइट
Curated by: Shishupal Kumar
Updated Jul 6, 2026, 13:39 IST
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Spy Satellite: आज की दुनिया में जंग सिर्फ युद्ध के मैदानों तक सीमित नहीं है, वो व्यापार से लेकर अंतरिक्ष तक हर जगह घुसा है। कहने को युद्ध तो धरती पर लड़े जा रहे हैं, लेकिन इसका असल खेल आज की तारीख में अंतरिक्ष से खेला जा रहा है। चाहे वो ईरान-अमेरिका जंग हो, रूस-यूक्रेन जंग हो या फिर भारत का पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर हो, हर लड़ाई में निर्णायक फैसले, अंतरिक्ष से आए डेटा पर ही लिए गए हैं। युद्ध में जो काम पहले जासूस और गद्दार करते थे आज वही काम जासूसी उपग्रह यानि कि स्पाई सैटेलाइट कर रहे हैं। जंग भले ही जमीन पर हो लेकिन फैसले इन्हीं सैटेलाइट के आधार पर लिए जा रहे हैं। ईरान ने हाल के दिनों में रूसी-चीनी सैटेलाइट के जरिए होर्मुज पर पकड़ बनाए रखी, जिससे पूरी दुनिया का न सिर्फ व्यापार प्रभावित हुआ, बल्कि कई देशों की तो अर्थव्यवस्था ही तबाही के कगार पर पहुंच गई। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत इन्हीं सैटेलाइटों की मदद से एक दम स्टीक लक्ष्य साधते रहा। आइए आज जानते हैं स्पाई सैटेलाइट की दुनिया के बारे में...

जासूसी सैटेलाइट की दुनिया का बेताज बादशाह कौन?

जासूसी सैटेलाइट की दुनिया कोई नई नहीं है, लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि आज भी यह सीमित देशों के पास ही है। अमेरिका, रूस, चीन, इजराइल इस मामले में काफी आगे हैं, जबकि भारत, फ्रांस, इंग्लैंड, पाकिस्तान समेत इस लिस्ट में शामिल तमाम देश पीछे, लेकिन बाकी दुनिया से काफी आगे हैं। भले ही रूस ने सबसे पहले सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा था, लेकिन जब बात जासूसी उपग्रहों की आती है तो अमेरिका ने बाजी मार ली। अमेरिका का नेशनल रिकॉनिसेंस ऑफिस (NRO) की कई खुफिया सैटेलाइट्स इतनी ताकतवर है कि धरती पर मौजूद किसी कार का नंबर प्लेट भी पढ़ सकती है, किसी घड़ी का टाइम भी बता सकती है। भारत के न्यूक्लियर वेपन के टेस्ट को रोकने के लिए अमेरिका कुछ ऐसी ही जासूसी सैटेलाइट का प्रयोग कर चुका है।

ओसामा बिन लादेन के ठिकाने की सैटेलाइट इमेज (फोटो- CIA)

ओसामा बिन लादेन के ठिकाने की सैटेलाइट इमेज (फोटो- CIA)

सात सबसे ताकतवर जासूसी सैटेलाइट

  1. US KH-11 KENNEN (Keyhole) Series: दुनिया की सबसे ताकतवर जासूसी सैटेलाइट्स में अमेरिका की KH-11 KENNEN (Keyhole) Series का नाम सबसे ऊपर आता है, जिसे अंतरिक्ष का 'हबल टेलीस्कोप' भी कहा जाता है और यह इतनी शक्तिशाली है कि बेहद कम ऊंचाई से पृथ्वी पर मौजूद किसी कार के मॉडल या छोटी से छोटी वस्तु की भी साफ तस्वीर ले सकती है।
  2. US Orion / Mentor (NROL) Constellation: अमेरिका की ही Orion / Mentor (NROL) Constellation पृथ्वी से करीब 36,000 किमी ऊपर जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में तैनात है और अपने विशालकाय 100 मीटर चौड़े मेश एंटीना की मदद से दुश्मनों के सैन्य कम्युनिकेशंस, रेडियो सिग्नल्स और इलेक्ट्रॉनिक डेटा को अंतरिक्ष में ही इंटरसेप्ट करने में माहिर है।
  3. China Yaogan Series: चीन का सबसे बड़ा जासूसी नेटवर्क Yaogan (याओगान) Series अक्सर तीन के समूहों में लॉन्च किया जाता है, जो समुद्र में चलते अमेरिकी युद्धपोतों को ट्रैक करने और रियल-टाइम मिलिट्री इंटेलिजेंस जुटाने के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।
  4. Russia Yantar / Bars-M Series: रूस की Yantar / Bars-M Series सोवियत संघ के जमाने से चली आ रही 'जेनित' श्रृंखला का आधुनिक डिजिटल रूप है, जो रूसी सेना को हाई-रिज़ॉल्यूशन वाली थ्री-डी इमेजेस और सटीक भौगोलिक नक्शे प्रदान करती है, जो मिसाइल टारगेटिंग और जमीनी सेना के ऑपरेशन्स के लिए बेहद जरूरी हैं।
  5. US Lacrosse / Onyx Series: अमेरिका की Lacrosse / Onyx Series एक बेहद आधुनिक 'सिंथेटिक अपर्चर राडार' (SAR) प्रणाली है, जो ऑप्टिकल कैमरों के विपरीत रात के घने अंधेरे, बादलों, धुंध, तूफान और घने जंगलों को चीरते हुए जमीन के नीचे छिपे बंकरों या सैन्य वाहनों की सटीक तस्वीर ले सकती है।
  6. Israel Ofek Series: इजरायल की Ofek (ओफेक) Series में 'ओफेक-13' जैसे बेहद एडवांस और हल्के वजन वाले सैटेलाइट्स शामिल हैं, जो पृथ्वी की विपरीत दिशा में घूमते हुए मध्य पूर्व के संदिग्ध इलाकों पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखते हैं और पल-पल की हाई-डेफिनिशन तस्वीरें कंट्रोल रूम को भेजते हैं।
  7. India RISAT / Cartosat Series: भारत की ताकतवर RISAT / Cartosat Series को "आसमान में देश की आंखें" कहा जाता है, जिसमें रिसैट और कार्टोसैट जैसे अत्याधुनिक सैटेलाइट्स शामिल हैं, जो दिन-रात और मानसून के घने बादलों के पार भी सीमा पार की संदिग्ध गतिविधियों की सटीक इमेजरी प्रदान करते हैं, जिसका बेहतरीन उदाहरण सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान देखा गया था।
प्रयागराज कुंभ 2025 की सैटेलाइट इमेज (फोटो- ISRO)

प्रयागराज कुंभ 2025 की सैटेलाइट इमेज (फोटो- ISRO)

जासूसी सैटेलाइट कैसे करता है काम?

जासूसी सैटेलाइट मुख्य रूप से पृथ्वी से 200 से 1,000 किलोमीटर ऊपर लो-अर्थ ऑर्बिट में रहकर काम करते हैं। एक जासूसी सैटेलाइट केवल फोटो ही नहीं खींचता, बल्कि कई अलग-अलग तरीकों से खुफिया जानकारी जुटाता है। इसमें बेहद शक्तिशाली और बड़े टेलीस्कोपिक लेंस लगे होते हैं। ये सैकड़ों किलोमीटर ऊपर से जमीन पर खड़ी किसी गाड़ी का मॉडल या सैनिक की वर्दी तक साफ देख सकते हैं। जब सैटेलाइट अंतरिक्ष से कोई तस्वीर या सिग्नल लेता है, तो वह उसे डिजिटल डेटा में बदल देता है। इसके बाद, जब वह सैटेलाइट अपने देश के ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के ऊपर से गुजरता है, तो वह रेडियो तरंगों के जरिए उस डेटा को एन्क्रिप्टेड रूप में नीचे भेज देता है। कंट्रोल रूम में बैठे एक्सपर्ट्स के पास जब यह डेटा पहुंचता है, तो सुपरकंप्यूटर्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इन तस्वीरों को साफ किया जाता है।

ईरान के लॉन्चिंग साइट की इमेज (फोटो- Donald Trump tweet)

ईरान के लॉन्चिंग साइट की इमेज (फोटो- Donald Trump tweet)

जासूसी सैटेलाइट का सफर

जासूसी उपग्रहों का इतिहास अंतरिक्ष युग की शुरुआत से भी पुराना है, क्योंकि जब पहली बार कृत्रिम उपग्रहों की परिक्रमा का विचार आया, तभी से इनका इस्तेमाल दूसरे देशों की निगरानी के लिए योजना बनने लगी थी। इसकी औपचारिक शुरुआत 1940 के दशक के उत्तरार्ध में हुई। 1946 में रैंड कॉर्पोरेशन ने फोटोग्राफिक टोही प्रणाली का प्रस्ताव रखा। आगे चलकर 1955 में अमेरिकी वायु सेना ने दुश्मन की सैन्य क्षमता का पता लगाने के लिए सैटेलाइट विकसित करने पर शोध शुरू किया। इसी कड़ी में सीआईए, अमेरिकी वायु सेना और निजी कंपनियों ने मिलकर अमेरिका के पहले सफल 'कोरोना कार्यक्रम' की शुरुआत की, जिसने शीत युद्ध के दौरान साल 1959 से 1972 तक सोवियत संघ की जासूसी की और अगस्त 1960 में 'डिस्कवरर 14' मिशन के जरिए पहली बार अंतरिक्ष से उपयोगी तस्वीरें हासिल कीं। शुरुआत में इन कोरोना उपग्रहों का जीवनकाल महज 10 से 20 दिनों का ही होता था। इस समस्या को दूर करने के लिए साल 1976 में आधुनिक इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल इमेजिंग तकनीक से लैस 'कीहोल-11' उपग्रह को लॉन्च किया गया, जिसने जासूसी की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया; हालांकि आज के आधुनिक सैन्य जासूसी उपग्रहों की सटीक और असली क्षमता को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है।

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