बाकी कानूनों की तरह संसद से क्यों नहीं आ रहा UCC कानून, अमित शाह ने राज्यों का रास्ता ही क्यों चुना?

भारत में विभिन्न धर्मों के साथ-साथ अलग-अलग राज्यों और जनजातियों के अपने पारंपरिक और सामाजिक रीति-रिवाज हैं। पूरे देश के लिए एक ही केंद्रीय संहिता तैयार करना सामाजिक रूप से अत्यधिक जटिल है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सितंबर 2026 में मुंबई में समान नागरिक संहिता पर जो ऐलान किया उससे पूरे देश में सियासी हलचल मच गई। शाह ने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले देश के सभी 21 भाजपा-एनडीए (BJP-NDA) शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर दी जाएगी। उनके बयान के बाद देश में सियासी हंगामा मच गया और विपक्षी पार्टियों ने सरकार व बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया। खुद बीजेपी की सहयोगी जेडीयू ने भी इसके खिलाफ राय रख दी। बता दें कि राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद यूसीसी भाजपा के वैचारिक एजेंडे की मुख्य प्राथमिकताओं में से एक है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस कानून को भाजपा पूरे देश के लिए एक फ्लैगशिप मुद्दा मानती है, उसे संसद के जरिए एक केंद्रीय कानून बनाने के बजाय राज्यों की विधानसभाओं से क्यों पास कराया जा रहा है? आइए इसके पीछे के कानूनी, राजनीतिक, सामाजिक और रणनीतिक कारणों को विस्तार से समझते हैं:

UCC

UCC पर शाह की क्या रणनीति?

समवर्ती सूची के कारण राज्यों के पास कानून बनाने की शक्ति

भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और संपत्ति वितरण जैसे विषय 'समवर्ती सूची' (Concurrent List) में आते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि संसद के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं को भी इन मामलों पर कानून बनाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की विधानसभाओं ने यूसीसी बिल पास करके इसी संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल किया है। राज्य द्वारा बनाए गए इस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद वह संबंधित राज्य में पूरी तरह लागू हो जाता है।

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