Iran-Israel War: जब पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर हुआ, तो एक बात इंटरनेशनल कवरेज पर हावी होने लगी: वो ये कि इस युद्ध में कोई साफ तौर पर जीतने वाला नहीं था। हालांकि, अब एक और ज्यादा साफ नतीजा जो लोग निकाल रहे हैं, वो ये बेंजामिन नेतन्याहू (इजरायली पीएम) लड़ाई से पहले की तुलना में शायद राजनीतिक रूप से कमजोर हो गए हैं। हम यहां बात कर रहे हैं कि कैसे US-ईरान युद्ध, जिसमें कोई जीता नहीं, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान इसमें नेतन्याहू को पहुंच रहा?
ईरान से हुए सीजफायर पर क्यों सबसे ज्यादा परेशान हैं नेतन्याहू? साफ हुई इजरायली पीएम को पहुंचे नुकसान की तस्वीर
बिना किसी रणनीतिक लाभ के युद्ध
'द गार्डियन' ने इस संघर्ष को 'बिना किसी विजेता वाला युद्ध' बताया, और यह तर्क दिया कि इजरायल कोई भी निर्णायक या स्थायी रणनीतिक लाभ हासिल करने में विफल रहा। लगातार सैन्य कार्रवाई के बावजूद, ईरान की क्षेत्रीय स्थिति और क्षमताएं काफी हद तक जस की तस बनी हुई हैं।
BBC ने भी यह टिप्पणी की कि युद्धविराम ने शक्ति संतुलन में कोई बुनियादी बदलाव नहीं किया है। ईरान कई मोर्चों पर अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है, जबकि इजरायल की सुरक्षा से जुड़ी मुख्य चिंताएं, विशेष रूप से ईरान के प्रभाव को लेकर अभी भी अनसुलझी बनी हुई हैं।
ईरान अभी भी कई मोर्चों पर मजबूत
'द कन्वर्सेशन' द्वारा क्वोट विश्लेषकों का भी यही मानना है कि नेतन्याहू की व्यापक 'अंतिम रणनीति' (endgame) शुरू से ही अस्पष्ट थी; सैन्य टकराव को एक स्थायी राजनीतिक परिणाम तक ले जाने का कोई सुसंगत मार्ग मौजूद नहीं था।
'जीत के मुंह से हार'?
इजरायल के भीतर, तीखी प्रतिक्रिया तुरंत और असामान्य रूप से निकल कर आ रही है और बड़े पैमाने पर। अल जजीरा के अनुसार, आलोचकों ने इस परिणाम को 'जीत के मुंह से हार' करार दिया है और यह सुझाव दिया है कि इजरायल ने कोई सार्थक उद्देश्य हासिल करने से पहले ही अपने अभियान रोक दिए। राजनीतिक हलकों में हर तरफ इसी भावना की गूंज सुनाई दे रही है।
'द टाइम्स ऑफ इजरायल' ने बताया कि विपक्षी नेताओं ने नेतन्याहू पर सीधे तौर पर उस घटना के लिए आरोप लगाया है, जिसे वे राजनयिक आपदा कह रहे हैं। संघर्ष-विराम को एक स्थिरता लाने वाले कदम के तौर पर देखने के बजाय, इसे दबाव में खास तौर पर अमेरिका के दबाव में पीछे हटने के तौर पर दिखाया जा रहा है।
'यूरोज न्यूज' ने बताया कि इजरायल के राजनीतिक हलकों में भी संघर्ष-विराम की शर्तों को लेकर असंतोष है; इससे इस धारणा को और बल मिलता है कि नेतन्याहू ने जितना हासिल किया, उससे कहीं ज्यादा रियायतें दे दीं।
नेतन्याहू की आलोचना करते हुए, इजरायली विपक्ष के नेता यायर लैपिड ने उन पर युद्धविराम के हिस्से के तौर पर इजरायल की मांगें पूरी करवाने में नाकाम रहने का आरोप लगाया। उन्होंने X पर एक पोस्ट में कहा, 'हमारे पूरे इतिहास में ऐसी कूटनीतिक विफलता कभी नहीं हुई,' और यह भी कहा कि 'जब हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के मूल से जुड़े फैसले लिए जा रहे थे, तब इजरायल तो बातचीत की मेज पर भी मौजूद नहीं था।'
'सेना ने वह सब कुछ किया जो उससे करने को कहा गया था, जनता ने भी जबरदस्त धैर्य दिखाया, लेकिन नेतन्याहू राजनीतिक तौर पर नाकाम रहे, रणनीतिक तौर पर नाकाम रहे, और उन्होंने खुद जो लक्ष्य तय किए थे, उनमें से एक भी पूरा नहीं कर पाए।'
मध्य-वामपंथी पार्टी 'द डेमोक्रेट्स' के प्रमुख यायर गोलान ने X पर नेतन्याहू पर झूठ बोलने का आरोप लगाया। गोलान ने कहा, 'नेतन्याहू ने झूठ बोला। उन्होंने 'ऐतिहासिक जीत' और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षा का वादा किया था, लेकिन असल में हमें इजरायल के इतिहास की सबसे बड़ी रणनीतिक विफलताओं में से एक का सामना करना पड़ा।'
गोलान ने कहा कि 'खून बहा... बहादुर नागरिक मारे गए (और) सैनिक शहीद हुए... लेकिन इसके बावजूद कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया।' उन्होंने आगे कहा, 'परमाणु कार्यक्रम को नष्ट नहीं किया जा सका; बैलिस्टिक मिसाइलों का खतरा अब भी बना हुआ है; वहां की सत्ता अब भी कायम है, और इस युद्ध के बाद तो वह और भी ज्यादा मजबूत हो गई है।'
अमेरिका का दबाव और छवि की समस्या
न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इस बात का जिक्र किया कि युद्धविराम लागू करवाने में अमेरिका ने, खासकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में, कितनी अहम भूमिका निभाई। हालांकि अमेरिका के दखल से तनाव को और बढ़ने से रोकने में मदद मिली, लेकिन इससे नेतन्याहू के लिए एक छवि संबंधी समस्या खड़ी हो गई है। आलोचकों का तर्क है कि ऐसा लगा मानो इजरायल अपनी खुद की रणनीतिक दिशा तय करने के बजाय वॉशिंगटन के इशारों पर चल रहा हो।
ट्रंप के आगे नेतन्याहू चुप
यह धारणा उस नेता के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह है, जिसने लंबे समय से खुद को एक मजबूत और सुरक्षा को सबसे पहले रखने वाले फैसला लेने वाले नेता के तौर पर पेश किया है।
हारेत्ज़ [(Haaretz) इजरायल का सबसे पुराना और प्रमुख दैनिक समाचार पत्र] के सैन्य मामलों के संवाददाता आमोस हरेल ने द गार्डियन से बात करते हुए कहा कि नेतन्याहू की युद्ध योजनाओं में नाकामी हमेशा से ही एक अंतर्निहित हिस्सा रही है। हरेल ने कहा, 'मौजूदा अमेरिकी प्रशासन और नेतन्याहू के नेतृत्व वाले इजरायल के तंत्र में जो कई कमजोरियां एक जैसी हैं, वे अब खुलकर सामने आ गई हैं: बेबुनियाद मनगढ़ंत सोच के आधार पर जुआ खेलने की प्रवृत्ति, सतही और अधूरी योजनाएं, विशेषज्ञों की अनदेखी, या राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाओं के अनुरूप विशेषज्ञों के विचारों को ढालने के लिए उन पर जबरदस्त दबाव डालना।'
नेतृत्व खतरे में
इसके राजनीतिक नतीजे गंभीर हो सकते हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध में मिली असफलताओं ने नेतन्याहू के नेतृत्व को और संभवतः उनके कार्यकाल के अंतिम दौर को भी खतरे में डाल दिया है। विपक्षी नेता इस संघर्ष-विराम का इस्तेमाल करके उनके निर्णय लेने की क्षमता और देश को सुरक्षा प्रदान करने की उनकी योग्यता, दोनों पर ही सवाल उठा रहे हैं।
इसके साथ ही, नेतन्याहू ने इस तरह की बातों का खंडन करने की भी कोशिश की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि यह संघर्ष-विराम 'युद्ध का अंत नहीं है।' बढ़ती आलोचनाओं के बीच अपनी मजबूती दिखाने के प्रयास में, उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि यदि ज़रूरत पड़ी, तो इजरायल फिर से युद्ध के मैदान में उतरने के लिए तैयार है।
'द गार्डियन' के अनुसार, दक्षिणी लेबनान में लगातार हमले जारी रखने की नेतन्याहू की जिद अब अति-आत्मविश्वास का संकेत देने लगी है। इजरायल का घोषित लक्ष्य यानी एक नया 'बफर जोन' (सुरक्षा-घेरा) बनाना, उसके सैनिकों को हिज्बुल्लाह के साथ सीधे जमीनी संघर्ष में उलझाने का जोखिम पैदा करता है। हिज्बुल्लाह एक ऐसा विरोधी है जिसने लंबे समय से यह साबित किया है कि वह अपने जाने-पहचाने इलाके में बेहद प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकता है।
जीत साफ नहीं, लेकिन साफ नुकसान जरूर
नेतान्याहू की स्थिति को जो बात खास तौर पर नाज़ुक बनाती है, वह है उम्मीदों और नतीजों के बीच का फर्क। जिस सैन्य कार्रवाई का प्रस्ताव उन्होंने व्हाइट हाउस में एक गुप्त बैठक के दौरान ट्रंप के सामने रखा था, उससे कोई निर्णायक नतीजा नहीं निकला। कूटनीतिक समाधान भी बाहरी ताकतों से प्रेरित लगता है और घरेलू समर्थन भी साफ तौर पर कमजोर पड़ रहा है।
इसके विपरीत, ईरान अपने क्षेत्रीय रुतबे को बनाए रखते हुए भी बड़ी रियायतें देने से बचने में कामयाब रहा है; जिसके चलते कुछ विश्लेषकों का मानना है कि तेहरान ने कम से कम हारने से तो खुद को बचा ही लिया है।
अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्ष-विराम ने भले ही एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को टाल दिया हो, लेकिन बेंजामिन नेतान्याहू को इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी है। अब एक बात पर साफ सहमति बनती दिख रही है: एक ऐसे संघर्ष में जो अनिश्चितता और गतिरोध से भरा रहा, नेतान्याहू उन गिने-चुने नेताओं में से एक हैं जिन्हें इसके साफ और तत्काल दुष्परिणामों का सामना करना पड़ रहा है।
क्या वे राजनीतिक रूप से इस स्थिति से उबर पाएंगे, या फिर यह उनके नेतृत्व के अंत की शुरुआत साबित होगी, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे क्या होता है।
