इजरायल में हुए संसदीय चुनाव वैश्विक कूटनीति के केंद्र में हैं। भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण से भी यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली की नजर इस बात पर टिकी है कि इजरायल की सत्ता में कौन आता है और इसका भारत-इजरायल के द्विपक्षीय संबंधों पर क्या असर पड़ेगा। इन चुनावों पर भारत की पैनी नजर रहने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं—रक्षा सहयोग, आर्थिक-व्यापारिक रिश्ते और पश्चिम एशिया विशेषकर ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक समीकरण। क्यों भारत के लिए इजरायल चुनाव अहम है और यहां के सियासी हालात पर भारत की क्यों है पैनी नजर, विस्तार से जानते हैं।
रक्षा और रणनीतिक साझेदारी
भारत और इजरायल के बीच रक्षा संबंध पिछले कुछ वर्षों में बेहद मजबूत हुए हैं। इजरायल भारत के लिए हथियारों, अत्याधुनिक सैन्य तकनीक, ड्रोन, मिसाइल प्रणालियों और आतंकवाद-रोधी साजो-सामान के सबसे बड़े और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। दोनों देशों ने फरवरी 2026 में अपनी रणनीतिक साझेदारी को और उन्नत करते हुए 'शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए एक विशेष रणनीतिक साझेदारी' के तहत रक्षा सहयोग को नई ऊंचाइयां दी हैं। भारत और इजरायल के बीच रक्षा संबंध केवल खरीदने और बेचने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सह-विकास और संयुक्त अनुसंधान में बदल चुके हैं। भारत इजरायल से हेरॉन (Heron) और बराक-8 (Barak-8) मिसाइल डिफेंस सिस्टम, अवाक्स (AWACS) रडार तथा सटीक हमला करने वाले ड्रोन खरीदता है। नवंबर 2025 में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को लेकर एमओयू (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे। फरवरी 2026 में दोनों देशों ने अपने संबंधों को बढ़ाकर 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' का दर्जा दिया।
चुनावों पर नजर क्यों?
चूंकि बेंजामिन नेतन्याहू या इजरायल का कोई भी अन्य नेतृत्व भारत के साथ इस घनिष्ठ रक्षा और सुरक्षा तंत्र को कायम रखने में अहम भूमिका निभाता है, इसलिए नई दिल्ली यह सुनिश्चित करना चाहती है कि राजनीतिक बदलाव के बाद भी रक्षा समझौतों और तकनीकी हस्तांतरण की गति में कोई रुकावट न आए। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इजरायल में सत्ता परिवर्तन चाहे नेतन्याहू रहें या नया नेतृत्व आए--के बावजूद रक्षा सौदों और तकनीक हस्तांतरण की प्रक्रिया बिना किसी राजनीतिक अड़चन के चलती रहे।
व्यापार, प्रौद्योगिकी और 'आत्मनिर्भर भारत'
रक्षा के अलावा, व्यापार और उभरती हुई तकनीकों के मोर्चे पर भी इजरायल भारत का एक प्रमुख साझेदार है। दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, कृषि और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। भारत के 'आत्मनिर्भर और विकसित भारत 2047' के विजन में इजरायली तकनीकी का बड़ा योगदान है। ऐसे में, इजरायल में नई सरकार के गठन या सत्ता के समीकरणों का असर व्यापार समझौतों और तकनीकी साझेदारियों पर पड़ सकता है, जिस पर भारतीय नीति-निर्माताओं की बारीक नजर है।
पश्चिम एशिया के समीकरण और 'ईरान' का फैक्टर
पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और विशेष रूप से ईरान के साथ इजरायल के चल रहे टकराव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और भारत के सामरिक हितों पर पड़ता है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता या ईरान के साथ इजरायल का खुला संघर्ष भारत की तेल आपूर्ति और खाड़ी देशों में रह रहे करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। भारत के संबंध जहां एक ओर इजरायल के साथ बेहद गहरे हैं, वहीं ईरान के साथ भी उसके पारंपरिक और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं जैसे चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा आयात। इजरायल की नई सरकार ईरान के प्रति क्या रुख अपनाती है, इससे इस पूरे क्षेत्र का शक्ति संतुलन तय होगा, जो भारत की पश्चिम एशिया नीति के लिए बेहद अहम है। अगर इजरायल में अधिक आक्रामक रुख वाली सरकार बनती है और ईरान के साथ सीधा संघर्ष बढ़ता है, तो इससे हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे समुद्री मार्गों पर असर पड़ सकता है। भारत ईरान में रणनीतिक चाबहार बंदरगाह का संचालन करता है, जो उसे मध्य एशिया तक पहुंच देता है। इजरायल की ईरान नीति भारत के इस प्रोजेक्ट की कूटनीतिक राह तय करती है।
क्या नेतन्याहू के हारने/जीतने से फर्क पड़ेगा?
अगर नेतन्याहू जीतते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेतन्याहू के बीच लंबे समय से व्यक्तिगत और घनिष्ठ संबंध रहे हैं, जिससे फैसलों में निरंतरता बनी रहेगी। अगर नया नेतृत्व आता है तो क्या असर पड़ेगा। इस मुद्दे पर विश्लेषकों का मानना है कि भारत-इजरायल संबंध अब किसी एक नेता के भरोसे नहीं हैं, बल्कि यह एक संस्थागत ढांचा बन चुके हैं। इसके बावजूद, नई सरकार की प्राथमिकताएं और पश्चिम एशिया में उसकी नीतियां भारत के आर्थिक व रक्षा हितों को सीधे प्रभावित करेंगी। इजरायल के चुनाव सिर्फ उसकी घरेलू राजनीति या नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य का फैसला नहीं कर रहे हैं, बल्कि यह तय करेंगे कि आने वाले समय में पश्चिम एशिया की भू-राजनीति किस करवट बैठेगी। भारत के लिए इजरायल एक ऐसा अचूक सामरिक साझेदार है, जिसके साथ रक्षा, तकनीक और क्षेत्रीय स्थिरता के मोर्चे पर गहरे हित जुड़े हैं। यही वजह है कि नई दिल्ली इस चुनाव के परिणामों और उसके बाद बनने वाले राजनीतिक समीकरणों का बारीकी से अध्ययन कर रही है।