Starlink Row: स्टारलिंक भारत में कब शुरू होगा, यह सवाल कई साल से लटका है। 8 अक्टूबर 2026 को यह विवाद खुलकर सामने आ गया। एलन मस्क ने X पर लिखा कि स्टारलिंक को 'कुछ ओलिगार्क' रोक रहे हैं ताकि भारतीय लोगों पर उनका एकाधिकार बना रहे। सरकार ने उसी दिन जवाब दिया। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पहले यह देखना होगा कि मस्क भारत में क्या चाहते हैं।
मस्क को भारत क्यों चाहिए?
पहला, बाज़ार का आकार। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और सबसे सस्ते डेटा वाला बाज़ार है। स्टारलिंक जैसी सैटेलाइट सेवा के लिए यहाँ ग्राहक जोड़ने की गुंजाइश बहुत बड़ी है। दूसरा, ग्रामीण और दुर्गम इलाके। हिमालय, पूर्वोत्तर, द्वीप समूह और रेगिस्तानी क्षेत्रों में फाइबर बिछाना महंगा है। सैटेलाइट इंटरनेट की असली ताक़त यहीं है। तीसरा, निवेश की वसूली। कंपनी ने भारत में तैयारी पर बड़ा खर्च किया है। स्टारलिंक की अधिकारी लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 में बताया कि भारत में 20 गेटवे साइट बन चुकी हैं, जिन पर सैकड़ों एंटीना लगे हैं। यानी कंपनी की ओर से ढांचा तैयार है, इंतज़ार सिर्फ़ सरकारी मंज़ूरी का है।
मस्क के आरोप क्या हैं?
मस्क ने अगले दिन अपना हमला और तीखा किया। उन्होंने कहा कि स्टारलिंक 165 से ज़्यादा देशों में लाइसेंस प्राप्त है और पाच साल से भारत के हर नियम का पालन कर रही है, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं। एक अन्य पोस्ट में उन्होंने इसे भारत के लोगों के साथ अपराध बताया। इस तरह निशाना सीधे रिलायंस जियो और उसके प्रमुख की ओर मुड़ गया।
सरकार का जवाब
भारत सरकार ने आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया। दूरसंचार मंत्रालय ने कहा कि सैटेलाइट संचार का नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और भेदभाव-रहित है, और इसे अनुचित बताना "निराधार और ग़लतफ़हमी भरा" है। सरकार के तर्क मोटे तौर पर ये रहे-तीन कंपनियों को सैटेलाइट आधारित GMPCS सेवाओं के लिए लाइसेंस दिए जा चुके हैं। स्टारलिंक अकेली कंपनी नहीं है जिसके साथ व्यवहार हो रहा है। दूरसंचार विभाग ने सभी सैटकॉम कंपनियों को लाइसेंस और अनंतिम स्पेक्ट्रम दिया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि न मस्क और न स्टारलिंक "सुपर-प्रिविलेज्ड" हैं जिन्हें तरजीह दी जाए। उन्होंने यह भी बताया कि स्टारलिंक को अंतरिक्ष नियामक से परमिट और अधिकार मिल चुका है, अब सिर्फ़ सरकार की सुरक्षा मंज़ूरी बाक़ी है। यानी सरकार की दलील यह है कि देरी भेदभाव से नहीं, सुरक्षा जाँच की प्रक्रिया से है। विवाद की जड़ तीन जगह दिखती है।
1. सुरक्षा मंज़ूरी
गेटवे और हब के लिए सुरक्षा क्लियरेंस ज़रूरी है। लॉफ़ुल इंटरसेप्शन, डेटा लोकलाइज़ेशन और घरेलू मानकों वाले निगरानी उपकरण जैसी शर्तें भी हैं। विदेशी कंपनी के लिए यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से कड़ी होती है।
2. FDI मंज़ूरी
सितंबर 2026 की रिपोर्टों के अनुसार स्टारलिंक और अमेज़न लियो को FDI क्लियरेंस भी चाहिए, जबकि वनवेब और जियो सैटेलाइट को नहीं। यह फ़र्क़ इसलिए है कि वे भारतीय समूहों से जुड़ी हैं। 2020 में भारत ने उन देशों से निवेश पर पूर्व-मंज़ूरी अनिवार्य की थी जिनकी ज़मीनी सीमा भारत से लगती है। इसी के तहत संचार जैसे क्षेत्रों में शेयरधारिता का पूरा ब्योरा देना पड़ता है।
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3. स्पेक्ट्रम की क़ीमत
डिजिटल कम्युनिकेशन कमीशन ने सितंबर में राजस्व का 5% स्पेक्ट्रम शुल्क तय किया, जो ग्रामीण और दूरस्थ इलाक़ों में 4% रहेगा। स्पेक्ट्रम पाँच साल के लिए मिलेगा और दो साल बढ़ सकेगा। लेकिन प्रशासनिक रूप से दिए जाने वाले एयरवेव्स की क़ीमत अभी तय नहीं हुई है, और उसके बिना व्यावसायिक सेवा शुरू नहीं हो सकती। मस्क के आरोप में जियो का नाम बिना नाम लिए आया। यह पहलू दो तरह से देखा जा सकता है। एक ओर, पारंपरिक टेलिकॉम कंपनियों ने शुरू से सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की प्रशासनिक यानी बिना नीलामी के आवंटन की मांग का विरोध किया था। उनका तर्क था कि उन्होंने नीलामी में भारी रकम चुकाई है और नए खिलाड़ियों को वही रियायत नहीं मिलनी चाहिए। इसलिए मस्क के संदेह को पूरी तरह हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। दूसरी ओर, तथ्य यह भी हैं कि एयरटेल और जियो दोनों ने मार्च में स्टारलिंक के साथ अलग-अलग साझेदारी समझौते किए थे। यह तस्वीर "रोकने" वाले आरोप से मेल नहीं खाती। साथ ही, प्रशासनिक आवंटन के पक्ष में सरकार का झुकाव ख़ुद दिखाता है कि नीति स्टारलिंक के विरुद्ध नहीं गई।