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क्या है Zero FIR? जिसे लेकर राजस्थान में कांग्रेस ने छेड़ रखी है 'जंग', आसाराम तक को दिला चुका है सजा

जीरो एफआईआर (Zero FIR) 2013 में निर्भया केस के बाद आया था। इस कानून के आने के बाद त्वरित न्याय की उम्मीद जगी, खासकर ऐसे क्राइम के मामले में जहां केस दर्ज कराने में पीड़ितों को परेशानी होती थी।

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क्या है जीरो एफआईआर (AI Photo)
Authored by: शिशुपाल कुमार
Updated Oct 21, 2026, 14:18 IST
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देश में इस समय आंदोलनों का दौर चल रहा है, नीट पेपर लीक से शुरू हुआ यह सिलसिला SIR तक पहुंच चुका है। आंदोलनों के हिंसक होने के साथ-साथ पुलिसिया कार्रवाई पर उठ रहे सवालों के बीच जीरो एफआईआर (Zero FIR) की खूब चर्चा हो रही है। जीरो एफआईआर की कहानी इस बार दिल्ली के एक फोन कॉल से शुरू हुई है, जिसकी धमक अब राजस्थान में दिख रही है। कांग्रेस इस जीरो एफआईआर के कारण सड़कों पर है, गोविंद सिंह डोटासरा से लेकर अशोक गहलोत तक मोर्चा संभाले हुए हैं, जिसके कारण राजस्थान की पुलिस और सरकार दोनों परेशानी में दिख रही है। अब सवाल ये है कि आखिर ये जीरो एफआईआर है क्या, क्या है दिल्ली के उस फोन कॉल की कहानी, जिसके कारण राजस्थान हिला हुआ है, कभी इसी जीरो एफआईआर ने आसाराम जैसों पर शिकंजा कसा था और फिर उम्रकैद की सजा भी सुनाई गई।

जीरो एफआईआर है क्या?

जीरो एफआईआर का अस्तिव 2013 में निर्भया केस के बाद आया। वर्ष 2012 के चर्चित निर्भया सामूहिक दुष्कर्म मामले के बाद केंद्र सरकार ने आपराधिक कानूनों में सुधार के लिए जस्टिस जे.एस. वर्मा समिति का गठन किया था। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 'क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2013' लागू किया गया, जिसके तहत 'जीरो एफआईआर' के प्रावधान की औपचारिक शुरुआत हुई।

जीरो एफआईआर और सामान्य एफआईआर में अंतर

जीरो एफआईआर और सामान्य एफआईआर में अंतर

जीरो एफआईआर की जरूरत क्यों पड़ी?

सामान्य तौर पर, जब कोई अपराध होता है, तो पीड़ित व्यक्ति को उस क्षेत्र के पुलिस थाने में जाकर शिकायत दर्ज करानी पड़ती है, जहां वह अपराध घटित हुआ है। एफआईआर को संबंधित थाने की एक विशिष्ट संख्या (FIR Number) दी जाती है। लेकिन जीरो एफआईआर एक ऐसी विशेष व्यवस्था है, जिसके तहत पीड़ित व्यक्ति किसी भी क्षेत्र या क्षेत्राधिकार के पुलिस थाने में जाकर एफआईआर दर्ज करा सकता है, भले ही अपराध उस थाने की सीमा में न हुआ हो।

जीरो एफआईआर का मुख्य उद्देश्य पीड़ित को तुरंत पुलिस सहायता पहुंचाना और जांच प्रक्रिया में बिना वजह की देरी को रोकना है। शुरुआती जांच या प्राथमिक बयान दर्ज करने के बाद, जिस थाने में जीरो एफआईआर दर्ज हुई है, वह उसे उस संबंधित थाने में ट्रांसफर कर देता है, जहां अपराध वास्तव में घटित हुआ था। वहां पहुंचने पर उसे नियमित एफआईआर नंबर दिया जाता है। कानून के मुताबिक, कोई भी पुलिस स्टेशन क्षेत्राधिकार (Area/Jurisdiction) न होने का बहाना बनाकर शिकायत दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकता।

यह कब और क्यों उपयोगी है?

गंभीर अपराधों जैसे- बलात्कार, हत्या, अपहरण, दुर्घटना जैसी आपातकालीन और गंभीर स्थितियों में, जहां प्राथमिक साक्ष्य और समय बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, वहां जीरो एफआईआर न्याय दिलाने में काफी मददगार साबित हो सकता है।

यदि किसी व्यक्ति के साथ ट्रेन, बस या यात्रा के दौरान किसी अज्ञात/दूर स्थान पर अपराध होता है, तो वह निकटतम उपलब्ध पुलिस स्टेशन में जीरो एफआईआर दर्ज करा सकता है।

दिल्ली से फोन और राजस्थान में बवाल की क्या है कहानी?

दरअसल इस बार जिस मामले को लेकर जीरो एफआईआर की चर्चा हो रही है, वो कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से जुड़ी हुई है। दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान NSUI की नेता ऋतु बराला और अथिरा के साथ कथित रूप से दिल्ली पुलिस की महिला कांस्टेबल ने मारपीट की थी। एनएसयूआई नेता बराला ने आरोप लगाया था कि 13 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को ले जा रही बस में दिल्ली पुलिस की महिला कांस्टेबल चंचल यादव ने उनके साथ मारपीट की। बराला के अनुसार, कांस्टेबल ने उनकी गर्दन पकड़ी, उन्हें सीट पर धकेला, चेहरे पर नाखूनों से खरोंचा और थप्पड़ मारा।

इसी को लेकर राहुल गांधी ने फोन कर राजस्थान कांग्रेस से ऋतु बराला के लिए और केरल कांग्रेस से अथिरा के लिए कानूनी कार्रवाई करने को कहा। केरल में कांग्रेस की सरकार है, वहां जीरो एफआईआर हो गई, लेकिन राजस्थान में कांग्रेस विपक्ष में है और वो ऋतु बराला के साथ हुई मारपीट को लेकर जीरो एफआईआर कराने पर अड़ी है। कांग्रेस की राजस्थान इकाई के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा सोमवार शाम ऋतु बराला और पार्टी के अन्य नेताओं के साथ जयपुर पुलिस आयुक्तालय पहुंचे और दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान बराला से कथित मारपीट करने वाली दिल्ली पुलिस की महिला कांस्टेबल के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की। डोटासरा और कांग्रेस के अन्य नेता पहले प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए मोती डूंगरी पुलिस थाने पहुंचे। हालांकि, पुलिस ने शिकायत तो प्राप्त कर ली, लेकिन प्राथमिकी दर्ज नहीं की। इसके बाद कांग्रेस नेताओं का प्रतिनिधिमंडल पुलिस आयुक्तालय पहुंचा।

आयुक्तालय में डोटासरा और अन्य नेताओं को प्रतीक्षालय में बैठाया गया। इस दौरान डोटासरा ने प्राथमिकी दर्ज करने के संबंध में पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी से फोन पर बात की। इस बीच, आयुक्तालय के बाहर बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता जमा हो गए, जिसके बाद मुख्य द्वार बंद कर दिया गया और सुरक्षा बढ़ा दी गई। डोटासरा, बराला और अन्य कांग्रेस नेता प्राथमिकी दर्ज करने की मांग पर अड़े रहे।

जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के सामने धरने पर कांग्रेस नेता (फोटो- Rajasthan Congress)

जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के सामने धरने पर कांग्रेस नेता (फोटो- Rajasthan Congress)

कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा कि पुलिस द्वारा मामला दर्ज किए जाने तक नेता आयुक्तालय से नहीं हटेंगे। सोमवार से शुरू हुआ यह धरना बुधवार को भी जारी है।

डोटासरा ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को मारपीट की घटना के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि कानून के तहत कथित अपराध किसी थाने के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने पर भी शून्य प्राथमिकी (जीरो एफआईआर) दर्ज की जा सकती है। उन्होंने कहा कि इसी मामले में दूसरे राज्य में प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है और सवाल किया कि राजस्थान पुलिस ऐसा क्यों नहीं कर सकती।

अशोक गहलोत ने ’शून्य प्राथमिकी’ दर्ज करने से इनकार किए जाने को लेकर भाजपा सरकार की आलोचना की और आरोप लगाया कि कांग्रेस से जुड़ी होने के कारण एक महिला को न्याय से वंचित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि जयपुर पुलिस को केवल ’शून्य प्राथमिकी’ दर्ज कर उसे दिल्ली पुलिस को भेजना था, जहां मामले की जांच कर आगे की कार्रवाई की जा सकती थी। उन्होंने सवाल किया, ’’क्या अब भाजपा शासित राज्यों में किसी बेटी को सिर्फ इसलिए न्याय नहीं मिलेगा कि वह कांग्रेस या उसके छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़ी है? क्या देश में अब दो तरह के कानून होंगे, एक सत्तारूढ़ दल के लिए और दूसरा विपक्ष के लिए?’’

गहलोत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 173(1) का हवाला देते हुए कहा कि कानून में अपराध का स्थान चाहे जो भी हो, ’शून्य प्राथमिकी’ दर्ज करने का प्रावधान है।

जयपुर पुलिस क्या कह रही है?

जयपुर पुलिस ने ’शून्य प्राथमिकी’ दर्ज करने की मांग खारिज करते हुए कहा कि बराला इस घटना के संबंध में दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में पहले ही शिकायत दर्ज करा चुकी हैं और मामले की जांच की जा रही है। जयपुर पुलिस ने कहा, ’’समान तथ्यों के आधार पर राजस्थान में एक और प्राथमिकी दर्ज करना कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं होगा।’’ पुलिस के अनुसार, बराला ने सोमवार को मोती डूंगरी थाने में शिकायत देकर आरोप लगाया था कि दिल्ली में 13 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की महिला कांस्टेबल चंचल यादव, सोनिका और ज्योति ने उनके साथ मारपीट की थी। जयपुर पुलिस ने बताया कि बराला ने अपनी शिकायत में कहा था कि वह शिकायत दर्ज कराने के लिए दिल्ली जाने में असमर्थ हैं। उसने बताया कि दिल्ली पुलिस से संपर्क करने पर पता चला कि बराला ने 13 अक्टूबर को ही कनॉट प्लेस थाने में तीन महिला कांस्टेबल के साथ हुई झड़प के संबंध में शिकायत दर्ज कराई थी। जयपुर पुलिस के मुताबिक, कनॉट प्लेस थाने में दर्ज शिकायत की जांच के तहत दिल्ली पुलिस मामले की पड़ताल कर रही है।

किस मामले में जीरो एफआईआर ने दिलाया न्याय

जीरो एफआईआर ने पीड़ितो को न्याय दिलाने में तो मदद किया है। आसाराम के केस में जीरो एफआईआर के कारण ही पीड़िता को न्याय मिलने में सहायता हुई थी। जोधपुर रेप केस में आसाराम के खिलाफ 20 अगस्त 2013 को दिल्ली के कमला मार्केट पुलिस स्टेशन में एक नाबालिग पीड़िता की शिकायत पर जीरो एफआईआर दर्ज की गई थी। बलात्कार की यह घटना जोधपुर (राजस्थान) के पास मड़ाई गांव स्थित आसाराम के आश्रम में हुई थी। चूंकि जोधपुर और शाहजहांपुर में मामला दर्ज करने में परेशानी आ रही थी, इसलिए पीड़िता के परिवार ने 20 अगस्त 2013 को दिल्ली में मामला दर्ज कराया था। जीरो एफआईआर दर्ज करने के बाद इस मामले को आगे की जांच के लिए जोधपुर पुलिस को ट्रांसफर कर दिया गया था, जिसके बाद आसाराम को गिरफ्तार किया गया और बाद में अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया।

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