No-Fault compensation Policy for COVID Vaccine Side Effects: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (10 मार्च) को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह उन लोगों के लिए एक 'नो-फॉल्ट' मुआवजा नीति बनाए, जिन्हें कोविड वैक्सीन लगवाने के बाद गंभीर साइड-इफेक्ट्स हुए या जिनकी मौत हो गई। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि वैक्सीन से जुड़ी समस्याओं के लिए मुआवजा मांगने हेतु परिवारों को सिविल कोर्ट में जाकर किसी की लापरवाही साबित करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। यानी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पीड़ित मदद मांगे तो उस दौरान लापरवाही तय ना करें। इसके बजाय, कोर्ट ने कहा कि जनता के स्वास्थ्य की रक्षा करने का राज्य का संवैधानिक दायित्व उन लोगों को एक व्यवस्थित मुआवजा तंत्र प्रदान करना भी है, जिन्हें राज्य द्वारा चलाए गए टीकाकरण अभियान के दौरान गंभीर परिणाम भुगतने पड़े।
SC ने कोविड वैक्सीन के साइड-इफेक्ट्स के लिए 'नो-फॉल्ट' नीति का आदेश क्यों दिया?
वैक्सीन से जुड़ी जटिलताएं
दरअसल, कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिन्हें उन लोगों ने दायर किया था जिन्होंने 2021 में कोविशील्ड और कोवैक्सिन लगवाने के कुछ ही समय बाद, खून जमने (ब्लड क्लॉटिंग) जैसी दुर्लभ जटिलताओं के कारण अपने बच्चों या जीवनसाथी को खो दिया था। ये लोग 18 से 40 वर्ष की आयु के बीच के थे। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सरकार 'सूचित सहमति' (informed consent) सुनिश्चित करने और वैक्सीन से जुड़े जोखिमों के बारे में पारदर्शी तरीके से जानकारी देने में विफल रही। उनके अनुसार, टीकाकरण अभियान, जो आधिकारिक तौर पर स्वैच्छिक था, उसे वास्तव में उन लोगों पर विभिन्न प्रशासनिक प्रतिबंध लगाकर अनिवार्य बना दिया गया था जिन्होंने वैक्सीन नहीं लगवाई थी; इस तरह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
सरकार ने क्या तर्क दिया?
केंद्र सरकार ने अपने बचाव में तर्क दिया कि वैक्सीन कई कड़े नियामक मंजूरियों से गुजरी थीं और 'टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं' (AEFI) का पता लगाने के लिए मौजूदा प्रणाली काफी मजबूत थी।
सरकार ने जोर देकर कहा कि वैक्सीन से जुड़ी मौतें बेहद दुर्लभ थीं और भारत में कुछ खास तरह के ब्लड क्लॉटिंग विकारों के लिए प्रति एक लाख डोज पर रिपोर्टिंग दर केवल 0.001 थी। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि पीड़ित परिवारों के पास पहले से ही एक कानूनी उपाय मौजूद था: वे वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों के खिलाफ लापरवाही या कदाचार के लिए मुआवजा मांगने हेतु सिविल या उपभोक्ता अदालतों का दरवाजा खटखटा सकते थे।
जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने सरकार के उस सुझाव को खारिज कर दिया जिसमें परिवारों को अलग-अलग निचली अदालतों में जाने की छूट देने की बात कही गई थी। बेंच ने कहा कि वैक्सीन से होने वाली चोट के दावों में जटिल वैज्ञानिक कारणों का पता लगाना शामिल होता है। लापरवाही का सबूत मांगने पर जोर देते हुए बेंच ने कहा, 'इससे प्रभावित परिवारों पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ेगा और यह प्रभावित लोगों के लिए सबसे अच्छा समाधान नहीं होगा।' बेंच ने यह भी कहा कि नागरिकों को कई अलग-अलग कानूनी लड़ाइयों में उलझने पर मजबूर करने से अलग-अलग नतीजे आने और राहत तक असमान पहुंच का खतरा भी पैदा होगा, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता की गारंटी को कमजोर करता है।
बिना गलती के दायित्व और स्वास्थ्य का अधिकार
इस समस्या को हल करने के लिए, अदालत ने 'बिना गलती के दायित्व' (no-fault liability) के कानूनी सिद्धांत का सहारा लिया। इसका मतलब है कि कोई पीड़ित या उसका परिवार बिना यह साबित किए कि चोट किसी की लापरवाही या जानबूझकर की गई गलती के कारण लगी है, आर्थिक राहत पा सकता है। अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत भारतीय कानून में पहले से ही मान्य है, जैसे कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं के मामलों में, और ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और जापान जैसे देशों में वैक्सीन से होने वाली चोटों से जुड़ी योजनाओं का एक आम हिस्सा है।
यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 पर आधारित था, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने कहा कि संविधान 'राज्य को मानवीय पीड़ा का एक दूर का दर्शक नहीं, बल्कि लोगों के कल्याण और गरिमा का एक सक्रिय संरक्षक मानता है।' अदालत ने फैसला सुनाया कि चूंकि बड़े पैमाने पर टीकाकरण कार्यक्रम राज्य द्वारा शुरू किया गया एक सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान था, इसलिए राज्य का यह सकारात्मक दायित्व बनता है कि वह उन लोगों की मदद करे जिन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े हैं, टभले ही ऐसे मामले कितने भी दुर्लभ क्यों न हों।'
'जबरदस्ती वैक्सीन नहीं लगाई जा सकती...'
कोर्ट ने साफ किया कि वह वैक्सीन की साइंटिफिक समीक्षा के लिए नहीं बैठी है। उसने अपने 2022 के फैसले का ज़िक्र किया, जो जैकब पुलियेल बनाम भारत संघ मामले में आया था। इस फैसले में कोर्ट ने वैक्सीन मंजूरी की प्रक्रिया और सरकार के AEFI निगरानी तंत्र की वैधता को सही ठहराया था, साथ ही यह भी कहा था कि शारीरिक अखंडता अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित है और किसी भी व्यक्ति को जबरदस्ती वैक्सीन नहीं लगाई जा सकती।
इस फैसले पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने मौतों की जांच के लिए एक अलग विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड बनाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा AEFI समितियां इसके लिए काफ़ी हैं। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य की जिम्मेदारी 'सिर्फ निगरानी तक ही सीमित नहीं हो सकती, बल्कि उसे उचित मुआवजा देने तक भी बढ़ानी होगी।'
जल्द बनाए 'नो-फॉल्ट मुआवजा ढांचा'
सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह Covid-19 टीकाकरण अभियान से होने वाली गंभीर प्रतिकूल घटनाओं (AEFI) से निपटने के लिए जल्द से जल्द एक 'नो-फॉल्ट मुआवजा ढांचा' तैयार करे और उसे प्रकाशित करे। साथ ही, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस नीति को केंद्र सरकार द्वारा किसी भी तरह की जिम्मेदारी या गलती की स्वीकारोक्ति के तौर पर नहीं देखा जाएगा।
Covid से हुई मौतों के लिए मुआवजे पर SC का निर्देश
मंगलवार का फैसला, महामारी के दौरान Covid-19 से हुई मौतों के लिए मुआवजे के मामले में सुप्रीम कोर्ट के पहले के हस्तक्षेप की ही एक झलक है। साल 2021 के गौरव कुमार बंसल बनाम भारत संघ मामले में, कोर्ट के सामने यह तय करने का काम था कि क्या वायरस से जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को आर्थिक राहत पाने का अधिकार है या नहीं।
उस मामले में, याचिकाकर्ताओं ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रीय प्राधिकरण 'राहत के न्यूनतम मानकों के लिए दिशानिर्देशों की सिफारिश करेगा', जिसमें जानमाल के नुकसान के लिए अनुग्रह राशि (ex gratia assistance) भी शामिल है।
हालांकि केंद्र ने शुरू में वित्तीय बाधाओं और अन्य प्राथमिकताओं के चलते एक निश्चित राशि का भुगतान करने में अपनी असमर्थता जताई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कानून में इस्तेमाल किए गए शब्द 'shall' को एक 'अनिवार्य वैधानिक कर्तव्य' के रूप में समझा जाना चाहिए। कोर्ट ने NDMA को निर्देश दिया कि वह 'कोविड-19 के कारण जान गंवाने वाले लोगों के परिवार के सदस्यों को अनुग्रह राशि देने के लिए दिशानिर्देशों की सिफारिश करे' और इस राशि की सटीक व उचित मात्रा तय करने का अधिकार प्राधिकरण पर छोड़ दिया।
इस निर्देश के बाद, NDMA ने सितंबर 2021 में दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें प्रत्येक मृतक व्यक्ति के लिए 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि तय की गई; इस राशि का वितरण राज्यों द्वारा 'राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष' (State Disaster Response Fund) से किया जाना था। यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसी भी परिवार को अनुचित रूप से राहत से वंचित न किया जाए, एक सरल प्रक्रिया स्थापित की गई: इसके तहत, पॉजिटिव टेस्ट के 30 दिनों के भीतर होने वाली मौतों को कोविड-19 से हुई मौत माना गया, और मृत्यु प्रमाण पत्रों से जुड़े किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए जिला-स्तरीय शिकायत निवारण समितियां गठित की गईं।
