Sergio Gor Ladakh Visit: जम्मू-कश्मीर के अपने ऐतिहासिक दौरे का समापन करने के बाद, भारत में 27वें अमेरिकी राजदूत और दक्षिण व मध्य एशियाई मामलों के अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर (Sergio Gor) गुरुवार दोपहर लद्दाख के लेह हवाई अड्डे पहुंचे। सुबह श्रीनगर में खराब मौसम के कारण उनकी उड़ान में देरी हुई थी, जिससे कयास लगाए जा रहे थे कि शायद दौरा रद्द हो जाए, लेकिन मौसम साफ होते ही वे भारी सुरक्षा घेरे के बीच लेह पहुंचे।
J&K के दौरे के बाद लद्दाख पहुंचे सर्जियो गोर, दलाई लामा से मिलेंगे, चीन के लिए क्या है संकेत?
2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और जम्मू-कश्मीर व लद्दाख के केंद्रशासित प्रदेश (UT) बनने के बाद, किसी मौजूदा अमेरिकी राजदूत की लद्दाख के लिए यह पहली स्वतंत्र यात्रा है। 39 वर्षीय सर्जियो गोर लद्दाख का दौरा करने वाले पहले अमेरिकी दूत बन गए हैं- एक ऐसा क्षेत्र जो अधिकांश विदेशी राजनयिकों के लिए प्रतिबंधित रहा है।
दौरे का सबसे बड़ा पड़ाव: दलाई लामा से मुलाकात
अपनी इस यात्रा के दौरान सर्जियो गोर लेह में रह रहे तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा से एक निजी मुलाकात करेंगे। 91 वर्षीय बौद्ध धर्मगुरु अपनी गर्मियों का समय लेह में बिताते हैं।
मुलाकात के प्रमुख विषय: हालांकि कोई आधिकारिक एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि इसमें धार्मिक स्वतंत्रता, तिब्बती सांस्कृतिक विरासत, मानवाधिकार और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी।
वाशिंगटन का रुख: अमेरिका लंबे समय से मानव अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और तिब्बती संस्कृति के संरक्षण के समर्थन में दलाई लामा और तिब्बती नेतृत्व के साथ जुड़ा रहा है।
चीन के लिए क्या हैं इस दौरे और मुलाकात के कूटनीतिक संकेत?
रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत-चीन और पाकिस्तान के ट्राइजंक्शन (सीमा संगम) पर स्थित लद्दाख में सर्जियो गोर की मौजूदगी से बीजिंग को तीन सीधे संकेत मिलते हैं:
लद्दाख पर भारत के नियंत्रण को अमेरिका की मौन स्वीकृति: लद्दाख अक्साई चिन और पीओके (PoK) से सटा हुआ संवेदनशील क्षेत्र है। चीन भारत के सीमावर्ती दावों पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में नई दिल्ली द्वारा अमेरिकी दूत को लद्दाख यात्रा की अनुमति देना और एक मौजूदा अमेरिकी राजदूत का वहां उपस्थित होना, बीजिंग के सामने वाशिंगटन द्वारा लद्दाख पर भारत की संप्रभुता और नियंत्रण को स्पष्ट समर्थन देने का संदेश है।
तिब्बत मुद्दे पर बीजिंग को सीधी चुनौती: चीन दलाई लामा को एक 'राजनीतिक हस्ती' और 'अलगाववादी' मानता है तथा विदेशी सरकारों के अधिकारियों के साथ उनकी किसी भी बैठक को अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के इतने करीब अमेरिकी दूत का उनसे मिलना चीन को सीधे तौर पर असहज करेगा।
रणनीतिक और खुफिया साझेदारी: 2020 में गलवान और एलएसी पर हुए सीमा गतिरोध के दौरान अमेरिका ने भारत को वास्तविक समय (Real-time) की खुफिया जानकारी और कड़ा कूटनीतिक समर्थन दिया था। वर्तमान में हालांकि भारत और चीन के बीच सैनिकों की वापसी के बाद एक 'रणनीतिक ठहराव' है, लेकिन मई 2025 में 88 घंटे चले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन द्वारा पाकिस्तान को दिए गए सैन्य समर्थन के बाद भी भारत-अमेरिका का रणनीतिक तालमेल मजबूत बना हुआ है।
सर्जियो गोर कौन और उनके दौरे का महत्व
पाकिस्तान में खलबली और मध्य एशिया का 'ग्रेट गेम 2.0'
सर्जियो गोर के इस दौरे का प्रभाव केवल भारत और चीन तक सीमित नहीं है:
पाकिस्तान की नाराजगी: श्रीनगर में गोर के उस बयान ने पाकिस्तान को बुरी तरह से भड़का दिया है जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया था। इसके जवाब में पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को समन जारी किया। (उल्लेखनीय है कि जून 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका ने कश्मीर को उच्च जोखिम क्षेत्र में डाला था, जिसकी अब समीक्षा की जा रही है)।
मध्य एशिया में प्रतिस्पर्धा: वाशिंगटन और बीजिंग के बीच दुर्लभ खनिजों और मध्य एशियाई बाजारों को लेकर मुकाबला तेज हो गया है। सर्जियो गोर का जन्म सोवियत संघ के ताशकंद (जो श्रीनगर से महज 900 किमी उत्तर-पश्चिम में है) में हुआ था। व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के चीफ ऑफ पर्सनल रह चुके गोर मध्य एशिया में अमेरिका की आर्थिक पैठ बढ़ाने के मुख्य रणनीतिकार हैं।
बता दें कि लद्दाख और जम्मू-कश्मीर का यह दौरा दर्शाता है कि वाशिंगटन न केवल भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को प्रगाढ़ कर रहा है, बल्कि चीन और पाकिस्तान के प्रभाव वाले पूरे दक्षिण-मध्य एशियाई क्षेत्र में अपनी सक्रिय कूटनीतिक मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
