Russia-Afghanistan Relations: रूस और अफगानिस्तान के संबंध दशकों पुराने हैं। 1980 के दशक की भीषण लड़ाई और 1989 में सोवियत संघ (वर्तमान रूस) की अफगानिस्तान से वापसी के बाद अब दोनों देशों के रिश्तों में नई गरमाहट देखने को मिल रही है।
रूस0 अफगानिस्तान के साथ एक सैन्य समझौता हुआ। AI IMAGE
तालिबान को आतंकवादी संगठनों की सूची से हटाने और उसकी सरकार को मान्यता देने के बाद रूस ने इस सप्ताह अफगानिस्तान के साथ एक सैन्य समझौता किया है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि अफगान तालिबान के लड़ाके रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में मदद कर सकते हैं। यूरेशियन टाइम्स के अनुसार, रूस के साथ हुए समझौते पर तालिबान ने कहा है कि वह रूस के साथ सहयोग को महत्वपूर्ण मानता है। हालांकि, रूस और अफगानिस्तान दोनों में से किसी ने भी इस सैन्य सहयोग समझौते का विस्तृत ब्योरा जारी नहीं किया है।
यह पहली बार है जब तालिबान सरकार ने किसी देश के साथ औपचारिक रक्षा समझौता किया है। इस डील में हथियार, तकनीकी सहयोग, लाइसेंसिंग और रक्षा परियोजनाओं पर संयुक्त रूप से काम करने की बात शामिल है। इससे पहले रूस ने 2024 में उत्तर कोरिया के साथ भी रक्षा समझौता किया था। इसमें NATO की तर्ज पर आपसी रक्षा का प्रावधान था, जिसके तहत एक देश पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।
अफगानिस्तान और रूस ने एक सैन्य और तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। TOLO NEWS
क्या है पूरा मामला?
रूस ने 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद धीरे-धीरे उसके साथ अपने संबंध मजबूत किए। अब दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग समझौता होने से तालिबान को अंतरराष्ट्रीय वैधता और सैन्य समर्थन मिलने की संभावना बढ़ गई है।
पाकिस्तान के लिए क्यों है चिंता की बात?
कई दशकों तक पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपनी "स्ट्रैटेजिक डेप्थ" के तौर पर देखता था। उसका मानना था कि काबुल में उसकी पसंद की सरकार होने से उसे भारत के खिलाफ रणनीतिक फायदा मिलेगा। लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद हालात बदल गए।
तालिबान ने डूरंड लाइन को आधिकारिक सीमा मानने से इनकार कर दिया। वहीं, पाकिस्तान विरोधी आतंकी संगठन टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के खिलाफ भी तालिबान ने कोई सख्त कार्रवाई नहीं की। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच सीमा संघर्ष और सैन्य तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। मतलब साफ है कि जिस तालिबान को पाकिस्तान ने वर्षों तक समर्थन दिया, वही अब उसके लिए सुरक्षा चुनौती बनता दिखाई दे रहा है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की फोटो।
भारत को कैसे हो सकता है फायदा?
भारत ने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन व्यावहारिक नीति अपनाते हुए काबुल में मानवीय सहायता और विकास परियोजनाओं पर काम जारी रखा है। भारत ने गेहूं, वैक्सीन और राहत सामग्री भेजकर अफगानिस्तान में अपनी सॉफ्ट पावर बनाए रखी है।
पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की फाइल फोटो। PTI
- रूस और तालिबान की बढ़ती नजदीकियों से पाकिस्तान का प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।
- अफगानिस्तान में भारत के लिए नए आर्थिक और रणनीतिक अवसर खुल सकते हैं।
- मध्य एशिया में भारत की पहुंच और मजबूत हो सकती है।
- पाकिस्तान को अपनी पश्चिमी सीमा पर अधिक संसाधन और सुरक्षा बल तैनात करने पड़ सकते हैं।
इतिहास का यू-टर्न क्यों कहा जा रहा है?
1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया था। इसके बाद मुजाहिदीन लड़ाकों ने पाकिस्तान और अमेरिका के समर्थन से सोवियत सेना के खिलाफ लंबा युद्ध लड़ा। बाद में इन्हीं मुजाहिदीन समूहों से तालिबान का उदय हुआ। अब वही तालिबान रूस के साथ रक्षा समझौता कर रहा है। यही वजह है कि इसे 'इतिहास का यू-टर्न' कहा जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-तालिबान रक्षा समझौता सिर्फ एक सैन्य डील नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत है। इससे पाकिस्तान की क्षेत्रीय रणनीति को झटका लग सकता है, जबकि भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान में नई रणनीतिक संभावनाएं उभरती दिखाई दे रही हैं।
