Explained: मादर-ए-वतन से बेदखली और तख्तापलट के बाद शेख हसीना लगातार हमदर्दी बटोर रही हैं। अपदस्थ होते ही उनके कई फैसलों को लेकर उनकी छवि का मूल्याकंन किया जा रहा है। कथित रूप से हसीना पर तानाशाही रवैया अख़्तियार करने और विपक्षियों को जेल में डालने का इल्ज़ाम लगा। बांग्लादेशी मीडिया उन पर आरोप लगाती रही कि उन्होनें प्रशासन और लगभग सभी संस्थानों में अपना दखल देते हुए उन्हें अपने नियंत्रण में ले लिया। साथ ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी अक्सर आरोप लगाती आयी है कि संवैधानिक संस्थानों में स्वायत्ता के नाम पर देश में कुछ भी नहीं बचा।
बांग्लादेश में विद्रोह की पूरी कहानी।
मुक्तिवाहिनी से जुड़े स्वतंत्र सेनानियों के परिवारों का आरक्षण खत्म करने के नाम पर शुरू हुआ आंदोलन आवामी लीग के लिए भारी चिंता का सब़ब बना। शुरूआती दिनों में ये आंदोलन युवा कॉलेज छात्रों तक ही सीमित था, बांग्लादेश की हवा ऐसी बनी कि आंदोलन की धधक सड़कों से उठकर सीधा प्रधानमंत्री आवास तक पहुंच गयी। अब ढाका के लिए आगे की राह चुनौतियों से भरी होगी। जेल से बाहर आए हसीना के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उनके खिलाफ नए सिरे से नैरेटिव गढ़ेगें।
दुनिया ने देखी अराजकता की तस्वीरें
शेख हसीना की सियासी गिरावट की शुरुआत का पहला बिंदु सरकारी नौकरियों में कोटा प्रणाली से हुआ। इस कोटा सिस्टम पर आरोप लगा कि हसीना अपनी पार्टी के लोगों, रिश्तेदारों और चहेतों में रेवड़ियां बांटते हुए उन्हें वरीयता दे रही थी। इससे असंतोष बढ़ने लगा, हालातों को भांपते हुए ISI ने बीएनपी के साथ सत्ता परिवर्तन का सारा ताना बाना बुना। माहौल को और भड़काने के लिए कट्टरपंथी इदारों और जमातों ने अपने कैडरों के घुसपैठ युवा आंदोलनकारियों के बीच करवा दी। बिगड़ रहे हालात कुछ वादों के साथ सुधर सकते थे, लेकिन हसीना की तल्ख तकरीरों ने आंदोलन की आग में घी का काम किया। नतीजन दंगों, आगजनी और अराजकता की तस्वीरों से दक्षिण एशिया समेत तमाम दुनिया बगावत की गवाह बनी।
बांग्लादेश संकट
लगातार बढ़ता रहा असंतोष
विरोध और बगावत के सुर बांग्लादेश में काफी पहले से फूट रहे थे। विरोध प्रदर्शनों का दमन, छात्र नेताओं की नज़रबंदी-मार पिटाई, इंटरनेट सेवाओं को बाधित करना और राजनीतिक विरोधियों पर बेबुनियादी न्यायिक कार्रवाई से बांग्लादेशी युवा गुस्से से भरा था। ज्यादातर बांग्लादेश आवामी लीग को मिलिशिया संगठन के तौर पर देखते है। हसीना सरकार के दौरान फोन टैपिंग और टैक्निकल सर्विलांस से जुड़ी खबरों का आना आम सी बात हो गयी। साल 2018 के दौरान बस से कुचलकर दो छात्रों की मौत ही गयी थी, वो बस सर्विस आवामी लीग के एक बड़े नेता के रिश्तेदार की थी। उस हादसे के जवाब में भी उग्र प्रदर्शन हुए थे। इस तरह बढ़ते असंतोष ने हसीना को बांग्लादेश से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
तख्तापलट रहा है, बांग्लादेशी इतिहास का हिस्सा
गौरतलब है कि साल 1975 में बांग्लादेश खूनी तख्तापलट का गवाह बना था, उसकी जद में राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान सीधे आये, साथ ही लगभग उनका पूरा परिवार खत्म हो गया। मजबूरन हसीना को यूरोप में रहना पड़ा। 1980 के दशक की शुरुआत हसीना की वतन वापसी हुई, जल्दी ही मुल्क के सियासी गलियारों में उन्होनें काफी मजबूत पैठ कायम कर ली। अपने वालिद साहब के नक्शे कदम पर उन्होनें अवामी लीग के सदस्यों के बीच मजबूत तालुक्कात मुकम्मल कर पार्टी में नयी जान फूंक दी। इस कड़ी का अगला अहम सिरा जुड़ा साल 2006 के सैन्य तख्तापलट के बाद, उस दौरान शेख हसीना और खालिदा जिया दोनों की पकड़ मुल्क पर ढ़ीली पड़ती चली गयी। दोनों ने ही अलग-अलग रास्ते अख्तियार किए। एक ओर जिया ने नजरबंदी को गले लगाते हुए देश से बाहर जाना कबूल नहीं किया, दूसरी ओर हसीना ने अपना रूख़ यूरोप और अमेरिका की ओर किया। ठीक दो साल बाद यानि कि साल 2008 में हुए आवामी इंतिखाब में शानदार जीत हासिल करते हुए वो ढाका के तख्त पर काबिज़ हुई। मौजूदा हालातों में उन्हें भले ही अपना देश छोड़ना पड़ा हो लेकिन वो एक बार फिर से वापसी कर सकती है।
बांग्लादेश में 5 अगस्त को हुआ तख्तापलट।
अंतरिम सरकार की होगी अग्निपरीक्षा
तख्तापलट के ठीक तीन दिन बाद 8 अगस्त को डॉ. मुहम्मद यूनुस की अगुवाई में अंतरिम कार्यवाहक सरकार ने शपथ ली। नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाले एकमात्र बांग्लादेशी डॉ. मुहम्मद यूनुस अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार बने, उनका ओहदा प्रधानमंत्री के बराबर का है। डॉ. मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार चलाने के लिए जिन लोगों को चुना है, उनमें छात्र आंदोलन से जुड़े दो कोर्डिनेटर अहम भूमिका में हैं। डॉ. मुहम्मद यूनुस और अंतरिम सरकार के दूसरे नुमाइंदों को भारी जनसमर्थन हासिल है, लेकिन इन लोगों के सामने विकट परिस्थिति में पसरा हुआ बांग्लादेश है, जिसे सहेजना बेहद मुश्किल काम है।
निष्पक्ष और पारदर्शी प्रशासन चाहते हैं बांग्लादेशी
फिलहाल छात्र संगठन घोटालों में शामिल रहे हसीना सरकार के नेताओं को हटाने की पुरजोर मांग उठा रहे है, इनमें वो दागदार सियासतदान भी शामिल है, जो कि पूववर्ती सरकारों में रहे हैं। इस किस्म के कई लोग अभी भी सत्तानशीं है। अंतरिम सरकार की जन स्वीकार्यता में इजाफा तभी होगा, जब ऐसे लोगों को बर्खास्त कर गिरफ्तार किया जाए। इस कदम को अंजाम देने के लिए बड़े पैमाने पर प्रशासनिक फेरबदल करने होगें, जो कि दीर्घकालीन प्रक्रिया है। इसी बात की झलक तख्तापलट के ठीक बाद हुई जनरल ज़मान की प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ हो गयी, जिसमें वो ये कहते नज़र आये कि सरकारी मशीनरी के चलते जिन लोगों को कत्ल किया गया, उन्हें इंसाफ दिलाना उनकी प्राथमिकता होगी। इसके बाद गठित हुई अंतरिम सरकार ने भी इस संकल्प को दोहराया।
बांग्लादेश की स्थिति।
बांग्लादेशी हिंदूओं की रक्षा के लिए संवेदनशील नई दिल्ली
पदभार संभालते ही डॉ. यूनुस ने साफ किया कि द्विपक्षीय संबंधों की बुनियाद पर भारत और चीन के साथ उनके रिश्ते चुनौतियों से जूझ रहे हैं। बांग्लादेश के तख्तापलट से नई दिल्ली के चेहरे पर परेशानी की लकीरें खींच गयी, हसीना के निर्वासन से हैरानगी और परेशानी से भरा भारत बांग्लादेशी हिंदू आबादी को लेकर संजीदा है। वहां की कानून व्यवस्था बांग्लादेशी हिंदूओं की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर नहीं कर पा रही है। इस्कॉन मंदिरों पर हमला, हिंदू बहुल आबादी वाले इलाकों में आगजनी और हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर की जा रही हिंसा पर नई दिल्ली नज़रे बनाए हुए है। बांग्लादेशी हिंदू समुदाय के कई नेता किसी भी तरह की अप्रत्याशित घटना ना होने का आश्वासन दे रहे है, इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर गोबिंद चंद्र प्रमाणिक का नाम है। उनके मुताबिक हालात पटरी पर लौट रहे हैं, साथ ही उन्होनें दावा किया कि बहुसंख्यक समुदाय से जुड़े कई स्वयं सेवक हिंदू मोहल्लों और मंदिरों की हिफाज़त के लिए आगे आ रहे हैं। इन सबके बीच अंतरिम सरकार को नई दिल्ली के कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है ताकि वहां से होने वाले हिंदूओं के संभावित पलायन को रोका जा सके। नई दिल्ली के सामने वार्ता का ये मुद्दा ढ़ाका के लिए पेचीदियों से भरा होगा।
संभावित आम चुनावों में पार्टियों की भागीदारी को लेकर फैला है पशोपेश
डॉ. मुहम्मद यूनुस और उनकी अंतरिम सरकार के लिए नया आम चुनाव करवाना सबसे अहम काम होगा। दिलचस्प ये हो सकता है कि मानवाधिकारों के उल्लंघन और निर्दोष लोगों की मौत की सुनवाई करने के लिए बना ट्रिब्यूनल उन संभावित चुनावों में अवामी लीग की भागीदारी को पेचीदा बना सकता है। माना ये भी जा रहा है कि आवामी लीग ये दलील दे सकती है कि उनकी पार्टी अब हसीना की सरपरस्ती से बाहर है। मामले को दूसरा पक्ष ये भी है कि हसीना सरकार के दौरान संगीन आरोपों से घिरी पॉलिटिकल पार्टियों को भी उन चुनावों में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है, मुमकिन तौर पर वो चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहराए जा सकते है। इस लिस्ट में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान का नाम सबसे ऊपर आता है। ठीक इसी तरह बांग्लादेश की सबसे बड़ी कट्टरपंथी इस्लामी राजनीतिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी को साल 2013 के दौरान चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था।
बाहरी दबाव और कट्टरपंथ है बड़ी चुनौती
आंशकाओं से उपजी तमाम बाधाओं के बीच ये तय नहीं है कि मौजूदा अंतरिम बांग्लादेशी सरकार कितने दिनों तक चलेगी। शपथ ग्रहण से लेकर अब तक ये साफ नहीं हो पाया है कि सलाहकार सरकार कितनों दिनों तक वजूद में रहेगी? बांग्लादेशी लोग फिलहाल अपनी दूसरी कथित आज़ादी का लुत्फ उठा रहे है, जो कि उन्हें अपनी पहली आजादी से 53 साल बाद मिली है। बांग्लादेश के बेहतर भविष्य की उम्मीदें बेहद कम है। ऐसे में निष्पक्ष, स्वतंत्र, बेरहम और लोकतांत्रिक बांग्लादेश बनना भी काफी मुश्किल दिखायी देता है। अब बांग्लादेश के लिए बड़ी चुनौती ये है कि नयी सरकार और भविष्य बाहरी ताकतों के दबावों और कट्टरपंथ से अछूता रहे।
इस लेख के लेखक राम अजोर जो स्वतंत्र पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं।
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