दुबई से इजराइल के तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 में 34,000 फीट की ऊंचाई पर जो कुछ हुआ, उसने पूरी दुनिया के सिवि एविएशन के क्षेत्र में हड़कंप मचा दिया। कॉकपिट के भीतर सनकी को पायलट ने मुख्य भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया और विमान को क्रैश कराने की नीयत से अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की। गंभीर रूप से घायल और खून से लथपथ होने के बावजूद कैप्टन स्मित ने साहस का परिचय देते हुए सबसे पहले ग्राउंड टीम को इमरजेंसी अलर्ट भेजा, कॉकपिट का दरवाजा खोला और यात्रियों तथा क्रू मेंबर्स की मदद से हमलावर को काबू में करवाया।
कैसे एक 'साइलेंट कोड' से अलर्ट होती हैं सुरक्षा एजेंसियां
इस खौफनाक घटना के बाद हर किसी के मन में यह सवाल उठ रहा है कि जब हवा में उड़ते प्लेन पर कोई कब्जा करने की कोशिश करता है या बोलने के हालात नहीं होते, तब ग्राउंड टीम (ATC) को कैसे खबर मिलती है और सुरक्षा एजेंसियां क्या कदम उठाती हैं? आइए जानते हैं ऐसे हालात में क्या किया जाता है।
क्या है प्लेन का सीक्रेट कोड '7500'?
विमानन सुरक्षा मानकों (Aviation Safety Standards) के अनुसार, हर वाणिज्यिक विमान में 'ट्रांसपोंडर' (Transponder) नाम का एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है। यह उपकरण लगातार एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) के रडार को विमान की ऊंचाई, दिशा और गति का डेटा भेजता रहता है। जब विमान में हाइजैकिंग या किसी व्यक्ति द्वारा नियंत्रण लेने जैसे कोई गंभीर हालात पैदा होते हैं, तो पायलट ट्रांसपोंडर पर एक खास चार अंकों का कोड सेट करते हैं- '7500'। ये एक तरह का साइलेंट अलार्म है, इसे एविएशन की भाषा में "Squawk 7500" कहा जाता है। जब पायलट हाइजैकर्स के दबाव में होते हैं और रेडियो (VHF) पर बोलकर संदेश नहीं दे सकते, तब यह कोड डायल किया जाता है। जैसे ही कॉकपिट से यह कोड इनपुट होता है, जमीन पर एयर ट्रैफिक कंट्रोलर की रडार स्क्रीन पर उस विमान के कॉल साइन के साथ लाल रंग का इमरजेंसी अलर्ट फ्लैश करने लगता है।
इनके अलावा दो और जरूरी इमरजेंसी ट्रांसपोंडर कोड हैं, 7700 और 7600। 7700 का मतलब है, किसी भी प्रकार की सामान्य या तकनीकी आपातस्थिति और 7600 का मतलब है रेडियो कम्यूनिकेशन सिस्टम पूरी तरह फेल हो जाना।
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अलर्ट मिलने के बाद ग्राउंड टीम और ATC का एक्शन प्लान
जैसे ही ATC की रडार स्क्रीन पर '7500' का सिग्नल चमकता है, बिना समय गंवाए SOP लागू हो जाती है। ऐसे में सबसे पहले सिग्नल का गुप्त तरीके से वेरिफिकेशन किया जाता है। ATC कंट्रोलर रेडियो पर ऐसे सामान्य शब्दों में पायलट से संपर्क साधने की कोशिश करता है जिससे हाइजैकर्स को भनक न लगे। अगर पायलट से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तो अलर्ट को 100% सही मान लिया जाता है। इसके बाद हाई-लेवल क्राइसिस कमेटी को संदेश जाता है। गृह मंत्रालय, नागरिक उड्डयन मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के तहत गठित एंटी-हाइजैकिंग क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप (CMG) तुरंत सक्रिय हो जाता है। इसके तुरंत बाद वायुसेना को तुरंत अलर्ट पर डाल दिया जाता है। किसी भी अनहोनी या आत्मघाती हमले को रोकने के लिए लड़ाकू विमानों को संदिग्ध प्लेन को एस्कॉर्ट करने के लिए हवा में तैनात कर दिया जाता है। इसके बाद विमान को नजदीकी सुरक्षित एयरपोर्ट की ओर डाइवर्ट किया जाता है। लैंडिंग के बाद प्लेन को पैसेंजर टर्मिनल से बहुत दूर 'आइसोलेशन बे' (Isolation Bay) में खड़ा किया जाता है, ताकि बाकी एयरपोर्ट सुरक्षित रहे।
फ्लाईदुबई FZ1073 में क्या हुआ था
फ्लाईदुबई की घटना में स्थिति सामान्य हाइजैकिंग से भी अधिक चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि खतरा बाहर से नहीं बल्कि कॉकपिट के अंदर बैठे को पायलट से था। 30 सितंबर के दिन दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाइट में को-पायलट ने कैप्टन स्मित मच्छार पर हमला कर दिया। इसके बावजूद उन्होंने के बाद भी संयम नहीं खोया। उन्होंने तुरंत इमरजेंसी सिग्नल भेजकर जमीन पर कंट्रोल रूम को सूचित किया। इसके बाद बख्तरबंद कॉकपिट डोर का इमरजेंसी लॉक खोलकर केबिन क्रू और लोगों को अंदर आने का मौका दिया। यात्रियों और क्रू ने मिलकर हमलावर को रस्सियों और बेल्ट से बांधा, जिसके बाद विमान की सऊदी अरब के तबूक एयरपोर्ट पर सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई।
