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जब संसद बनी रणभूमि : वो मंजर जिसने हिला दिया था हिंदुस्तान का दिल; लोकतंत्र के मंदिर पर हमले की पूरी टाइमलाइन

24 साल पहले साल 2001 में आज ही के दिन पांच आतंकियों ने संसद में हमला कर दुस्साहस दिखाया था। हालांकि सुरक्षा बलों ने अदम्य साहस दिखाते हुए हमले को नाकाम कर दिया और सभी पांचों आतंकियों को मार गिराया। आतंकियों से हुई मुठभेड़ में नौ लोगों की मौत भी हो गई थी। उस आतंकी घटना के बाद आज का दिन भारतीय इतिहास में काले अक्षरों में लिखा गया।

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संसद पर हमले की 24वीं बरसी।

आज से 24 साल पहले....तारीख थी 13 दिसंबर 2001 और लगभग 11 बज रहे थे। संसद में शीतकालीन सत्र चल रहा था और विपक्षी सांसद ताबूत घोटाला को लेकर सरकार का विरोध कर रहे थे। तभी पाकिस्तान परस्त पांच आतंकियों ने संसद भवन परिसर में हमला कर दिया। हालांकि संसद सुरक्षा सेवा, सीआरपीएफ और दिल्ली पुलिस के जवानों ने हमले को नाकाम कर दिया और सभी आतंकियों को मार गिराया गया। लोकतंत्र के मंदिर में इस अप्रत्याशित आतंकी घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। आज जब हम उस हमले की बरसी मना रहे हैं, तो ऐसे में हम आपको उस दिन की पूरी टाइमलाइन बताएंगे....

'कफन चोर....गद्दी छोड़' के लग रहे थे नारे

13 दिसंबर 2001 की सुबह सबकुछ सामान्य ही था। उस समय कारगिल युद्ध के दौरान ताबूत घोटाले को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार विपक्ष के आरोपों का सामना कर रही थी। विपक्षी सांसद इसी मुद्दे पर संसद में शीतकालीन सत्र के दौरान भी हंगामा काट रहे थे। ताबूत घोटाले को लेकर कफन चोर, गद्दी छोड़... सेना खून बहाती है, सरकार दलाली खाती है जैसे नारे संसद में लग रहे थे। विपक्ष के हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा दोनों को स्थगित किया गया था। जिसके कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई और सोनिया गांधी संसद से घर के लिए निकल गई थीं। (सोनिया गांधी इस समय कांग्रेस की अध्यक्ष थीं) हालांकि, उपप्रधानमंत्री आडवाणी समेत करीब 200 सांसद सदन और लाइब्रेरी आदि में मौजूद थे।

वक्त था 11: 40 और संसद में घुसी सफेद रंग की लाल बत्ती लगी एंबेसडर कार

उस वक्त समय 11: 40 हुआ था, तभी सफेद एंबेसडर कार जिसका रजिस्ट्रेशन नंबर DL-3CJ-1527 था, संसद भवन परिसर में दाखिल हुई। कार पर लाल बत्ती लगी थी और गृह मंत्रालय का नकली स्टीकर लगा हुआ था। उसके अंदर पांच लोग बैठे थे, संसद परिसर में दाखिल होने के बाद कार गेट नंबर 12 की ओर बढ़ी, वहां उस वक्त सीरआरपीएफ की महिला जवान कमलेश कुमारी तैनात थीं। उन्होंने देखा कि एक कार जिस पर गृह मंत्रालय का स्टीकर लगा था, बहुत तेजी से गेट नंबर 12 की ओर आ रही है, उसको देख कर कमलेश कुमारी को शक हुआ, जिसके बाद उन्होंने तुरंत वायरलेस पर संदिग्ध कार की सूचना दी और कार को रुकने का इशारा किया, लेकिन आतंकियों ने रुकने के बजाय तेज रफ्तार में गाड़ी बढ़ा दी। जिसके बाद उन्होंने कार की ओर दौड़ लगा दी। इस बीच, गेट नंबर 11 पर उपराष्ट्रपति कृष्ण कांत के ड्राइवर शेखर उनके सदन से बाहर आने का इंतजार कर रहे थे। जब तक वे कुछ समझते उससे पहले ही आतंकियों की कार उनकी गाड़ी से आ टकराई। जिसके बाद तुरंत सभी आतंकी कार से बाहर आ गए और अंधाधुंध गोलियां दागनी शुरू कर दीं।

सीआरपीएफ-आईटीबीपी के जवानों ने की जवाबी कार्रवाई

उपराष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात दिल्ली पुलिस के जवान, साथ ही ड्यूटी पर तैनात सीआरपीएफ और आईटीबीपी के जवान तुरंत अपनी-अपनी जगह पर आ गए और जवाबी फायरिंग की। इसी दौरान संसद भवन के सुरक्षाकर्मियों में से मतबर सिंह को गोली लग गई। इसके बाद, आतंकवादी गेट नंबर 12 की ओर भागे और फिर संसद भवन के गेट नंबर 1 की ओर बढ़े। गेट नंबर 1 पर सुरक्षा बलों ने एक आतंकवादी को गोली मार दी, जिससे उसके शरीर पर लिपटे विस्फोटक फट गए। शेष चार आतंकवादी वापस मुड़ गए और भवन के गेट नंबर 9 पर पहुंचे। जहां तीन आतंकियों को मार गिराया गया। बाकी बचा पांचवां आतंकवादी गेट नंबर 5 की ओर भागा, जहां उसे भी गोली मार दी गई।

नौ सुरक्षाकर्मी हुए शहीद

आतंकियों के साथ इस मुठभेड़ में नौ सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। इनमें उपराष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात दिल्ली पुलिस के चार जवान नानक चंद, रामपाल, ओम प्रकाश और घनश्याम शामिल थे। अन्य तीन लोग जो शहीद हुए, उनमें सीआरपीएफ की महिला कांस्टेबल कमलेश कुमारी, संसद भवन के वॉच एंड वार्ड स्टाफ के सुरक्षा सहायक जगदीश प्रसाद यादव और सीपीडब्लू के एक नागरिक कर्मचारी देश राज, वॉच एंड वार्ड स्टाफ के सुरक्षा सहायक मतबर सिंह और बिजेंद्र सिंह शामिल हैं। वहीं, मारे गए आतंकियों में हैदर उर्फ तुफैल, मोहम्मर राना, रणविजय, हमजा शामिल थे।

घटनास्थल और कार से बरामद हुआ हथियारों का जखीरा

आतंकियों को मार गिराने के बाद घटनास्थल को सील कर दिया गया। फोरेंसिक विशेषज्ञों और बम डिटेक्शन स्क्वाड सहित जांच टीमों ने घटनास्थल की जांच शुरू की। घटनास्थल से कई हथगोले मिले जिन्हें तुरंत निष्क्रिय किया गया। इसके अलावा, आतंकियों की कार से विस्फोटकों समेत भारी मात्रा में हथियार भी बरामद किए गए।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने किया था राष्ट्र को संबोधित

इस हमले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने उसी दिन राष्ट्र को संबोधित भी किया था। अपने संबोधन में उन्होंने कहा था कि संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। उन्होंने जानबूझकर उसे अपना निशाना बनाया। यह हमला संसद पर नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र पर था। हम सुनिश्चित करेंगे कि आतंकवादी अपने प्रयासों में असफल हों। हम पिछले दो दशकों से आतंकवाद से लड़ रहे हैं और इस संकट में पूरा देश हमारे साथ है। इसके साथ ही उन्होंने हमले में शहीद लोगों के परिजनों के प्रति सांत्वना भी व्यक्त की।

दो दिन बाद अफजल गुरू समेत तीन लोगों की गिरफ्तारी

इस हमले ने सुरक्षा एजेसियों के कान खड़े कर दिए। घटना की जांच शुरू हुई। उसमें पता चला कि ये आतंकी लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद से जुड़े थे। उन्होंने आतंकी मसूद अजहर के इशारे पर इस हमले को अंजाम दिया। मामले में जांच के तार अफजल गुरु, उसके भाई शौकत हुसैन गुरू और प्रोफेसर एस.ए.आर. गिलानी से जुड़े। हमले के दो दिन बाद ही तीनों को गिरफ्तार किया गया। उन पर पोटा (Prevention of Terrorism Act) के तहत मामला चलाया गया।

हमले के बाद का घटनाक्रम साल दर साल

25 दिसंबर 2001

जांच के दौरान हमले की कड़ी मसूद अजहर से जुड़ी थी। इसके बाद पाकिस्तान ने उसकी औपचारिक गिरफ्तारी की।

18 दिसंबर 2002

नई दिल्ली में ट्रायल कोर्ट ने हमले की साजिश रचने आतंकियों को हथियार मुहैया कराने और उनकी मदद करने के आरोप में अफजल गुरु उनके भाई शौकत हुसैन और एस ए आर गिलानी, तीनों को मौत की सजा सुनाई।

29 अक्टूबर 2003

जिसके बाद तीनों ने मौत की सजा को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। जहां कई सुनवाइयों के बाद हाईकोर्ट ने गिलानी को बरी कर दिया। वहीं, अफजल गुरू और शौकत की सजा को बरकरार रखा।

4 अगस्त 2005

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शौकत की सजा घटाकर 10 साल कर दी गई। लेकिन अदालत ने अफजल गुरु की फांसी की सजा को यथावत बरकरार रखा।

12 जनवरी 2007

इसके बाद अफजल गुरु ने अपनी मौत की सजा के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दायर की, जिसे 12 जनवरी 2007 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद अफजल गुरु की पत्नी तबस्सुम गुरु ने अक्तूबर 2006 में राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगाई। इसमें कहा गया कि अफजल गुरु को मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है। हालांकि राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने तीन फरवरी 2013 में उसकी दया याचिका खारिज कर दी।

9 फरवरी 2013

इसके बाद 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में अफजल गुरु की फांसी दे दी गई। हालांकि उसे फांसी एक दिन पहले ही यानी नौ फरवरी को दी जानी थी। लेकिन सुरक्षा कारणों से इसे एक दिन बढ़ा दिया गया था। उस समय के गृहमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे ने अपनी आत्मकथा 'फाइव डिकेड्स इन पॉलिटिक्स' में इस बात का जिक्र किया है। इसमें उन्होंने बताया कि ऐसा करने के पीछे का मुख्य उद्देश्य सुरक्षा को बरकरार रखना था। दरअसल, सरकार को भय था कि अफजल गुरु की फांसी की खबर से जम्मू-कश्मीर में हालात खराब हो सकते हैं। इसी वजह से बेहद गुप्त तरीके से उसे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई थी।

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