Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तानी हुक्मरानों के पांवों तले जमीन गर्म कर दी। इस तपिश के चलते उन्हें अपना वजूद खतरे में लगने लगा। नई दिल्ली की इस कड़ी जंगी कार्रवाई के जवाब में अपनी आवाम़ की झूठी तसल्ली देने के लिए रावलपिंडी के जनरलों ने ऑपरेशन बनयान-उम-मर्सूस छेड़ा। नई दिल्ली के आक्रामक रवैये को देखते हुए कई पश्चिमी ताकतों ने दांतों तले उंगली दबा ली। जहां एक ओर पाकिस्तान के पैर जंगी जमीन से उखड़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर वेब स्पेस/डिजिटल दुनिया में भी इस्लामाबाद लगातार मुंह की खा रहा था। भारत के हमलों का जवाब पाकिस्तान एक्स प्लेटफॉर्म पर अपने घटिया नैरेटिव और प्रौपेगेंडा से दे रहा था। भारतीय सेना ने जिस तरह से पाक के नापाक इरादों को उधेड़ा उसे दुनिया भर ने देखा, लेकिन ऑप्रेशन सिंदूर का नेपथ्य वाला हिस्सा डिजिटल दुनिया में अंजाम दिया गया। यानी कि इस किस्से की बानगी का दूसरा हिस्सा लगभग सभी से छिपा हुआ है, ये हैं इस्लामाबाद की ओर से जारी मीम्स, हैशटैग्स, फर्जी ट्रैंडस, उनके डिबेट्स शोज और सुर्खियां। पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों से ज्यादा खतरनाक ये थे। इन्हें ध्वस्त करने में भारतीय मीडिया, PIB और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने शानदार काम किया। पाकिस्तानी मीडिया ने अपनी हार की हर पटकथा को दिलेरी की लबादे में लपेटा। शिकस्त की हर तस्वीर को ISPR ने सियासी रंग देकर आम पाकिस्तानी आवाम के सामने रखा। कुल मिलाकर उसने अपने फ्लॉप शो को हिट कराने की लगातार नाकाम कोशिश की।
नई दिल्ली के सामने नहीं चली पाकिस्तानी दुष्प्रचार की साजिशें
पस्त हुआ, पाकिस्तानी एजेंडा
7 मई से लेकर अब तक पाकिस्तान अपने दुष्प्रचार का इंद्रजाल बुनना जारी रखे हुए है। जब भारत की मिसाइलें आंतकी ठिकानों पर कहर बरपा रही थी तो उसने इसे जंग की कार्रवाई करार दिया, इसका मुंहतोड़ जवाब देते हुए भारत ने दुनिया के सामने सबूत पेश किया और बताया कि ये युद्ध नहीं बल्कि आंतकी ठिकानों पर हथियारबंद कार्रवाई है। नई दिल्ली को बदनाम करने के लिए शहबाज़ शरीफ बार-बार "एक्ट ऑफ़ वॉर" का माला जपते रहे लेकिन दुनिया के सामने सच्चाई आ चुकी थी कि किस तरह भारतीय मिसाइलों ने आंतकी ठिकानों को नेस्तनाबूत कर दिया है। जिन बेबुनियादी विजुअल्स और ग्राफिक के दम पर इस्लामाबाद भारत को बदनाम करने की कोशिश कर रहा था, उसकी नंगी हकीकत उस पर खुद भारी पड़ गयी। इसे लेकर अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय भारत के पक्ष में लामबंद होने लगा। नई दिल्ली को मजहबी तौर पर असहिष्णु और आक्रामक दिखाने की पाकिस्तानी कोशिशें बेनूर हो गयी।
इस्लामाबाद और इस्तांबुल ने लिया पश्चिमी मीडिया का सहारा
एआरवाय न्यूज, पाकिस्तान टुडे, जियो न्यूज, समा टीवी और पीटीवी लगातार पाक सेना की सामरिक बढ़त के मनगढ़ंत किस्से अपनी आवाम़ की सुनाते रहे। दूसरी तरफ दुनिया इस बात से अच्छी तरह वाकिफ रही कि पाकिस्तानी गुरूर को किस तरह हिंदुस्तानी हथियारों ने मटियामेट किया। नई दिल्ली की हवाई कार्रवाई के खिलाफ उनकी वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह खोखली ही रही। इस तस्वीर से उलट किस्से पाकिस्तानी मीडिया में लंबे वक्त तक छाये रहे। अपने झूठे नैरेटिव को धार देने के लिए ISI के इशारे पर तहरीक-ए-लब्बैक की अगुवाई में यौम-ए-तशक्कुर जैसे दोयम दर्जे के कार्यक्रम करके पाकिस्तान की भूखी आवाम़ को ये भरोसा दिलाने की कोशिश की गयी कि उन्होनें भारत को हराया है। पाकिस्तानी आवाम को झांसा और दिलासा देने के लिए इस कार्यक्रम से जुड़े क्लिप तेजी से इरादतन सर्कुलेट करवाये गए। शहबाज़ शरीफ के झूठ का पुलिंदा उस वक्त भी साफ हो गया, जब लड़खड़ाते हुए कराची स्टॉक एक्सचेंज 6400 अंक नीचे गिर गया। मुफलिस्सी से घिरे पड़ोसी मुल्क को करीब 3 अरब डॉलर की चपेट झेलनी पड़ी। ये उनका छलावा ही है कि खुद को पीड़ित दिखाते हुए उन्होंने IMF के आगे अपना कटोरा बढ़ा दिया। पाकिस्तानी मीडिया ने ऑप्रेशन सिंदूर की आड़ में कश्मीर मुद्दे को वैश्विक मंचों पर भुनाने की कोशिश की, लेकिन ये हरकत परवान ना चढ़ सकी। भारत के सामने अपनी दुष्प्रचार कवायदों को फ्लॉप होता देख इस्लामाबाद ने अंकारा की भी मदद ली। इसके लिए कई सेमिनार आयोजित करवाए गए, उनकी भड़काऊ क्लिपों को ऑप्टामाइज़ कर वायरल करवाया गया। भारत-विरोधी कैंपेन चलाने के लिए कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया गया, इस काम के लिए तुर्किए का सार्वजनिक प्रसारक टीआरटी वर्ल्ड भी आगे आया। इन हरकतों को मात देने के लिए नई दिल्ली ने कई पाकिस्तानी इंफ्लूएसर्स को बैन किया, कई पाकिस्तानी यू-ट्यूबरों के वीडियों पर रोक लगायी गयी। पाक समर्थित फेसबुक पेजों और चैनलों पर नकेल कस दी गयी। इस क्रम में भारत में टीआरटी वर्ल्ड के प्रसारण पर भी रोक लगा दी गयी। इस तरह भारत सरकार के प्रोएक्टिव कदमों ने पाकिस्तानी एजेंडा को वक्त रहते फुस्स कर दिया। मात खाये इस्लामाबाद और इस्तांबुल ने इसके बाद अपने पश्चिम सहयोगियों का सहारा लेते हुए, भारत के खिलाफ न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और CNN जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया मंचों पर प्रायोजित खबरें प्रसारित करवायी। साफ है कि इससे पाकिस्तान के नैरेटिव को अच्छी खासी माइलेज मिली। इन पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने बिना जांच पड़ताल किए भारत के खिलाफ जमकर खबरें चलायी। नई दिल्ली ने इस्लामाबाद के इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए सैटेलाइट तस्वीरें जारी की, साथ ही PIB फैक्ट-चेक की मदद से ISI की नापाक कोशिशों को धराशायी कर दिया। भारत सरकार की पहल की चलते पाकिस्तान के झूठे दावे बेनकाब हुए और उनके पर्सपेक्टिव का वैश्विक असर काफी सीमित हो गया।
पाकिस्तान ने दुष्प्रचार को दिया महज़बी रंग
ऑपरेशन सिंदूर के जवाब में रावलपिंडी के अय्याश जनरलों ने ऑपरेशन बनयान मार्सूस शुरू किया। ये अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘लोहे की दीवार’ ऑप्रेशन के नाम से ही साफ हो जाता है कि वो अपनी काली करतूती पर मज़हब का रंग चढ़ाना चाह रहा था। वो अपने आंतकी ठिकानों पर हुए हिंदुस्तानी हमले को धार्मिक अतिक्रमण बताने की फिराक में था। इसी बीच पाकिस्तान में एक क्लिप तेजी से वायरल होता दिखा, जिसमें पाक सेना प्रमुख आंतकियों की जुबान बोलते हुए मौलानाओं की मौजूदगी में पाक सेना के जवानों और कमांडरों को संबोधित कर रहे थे। उनके मुताबिक भारत के खिलाफ उनकी जवाबी कार्रवाई अल्लाह की लड़ाई है। अपनी बात को मजबूती देने के लिए उन्होंने मौके पर कुरान की आयातों का भी सहारा लिया। साफ है कि इस जंग में वो अपने खेमे में मुस्लिम मुल्कों की सीधी लामबंदी चाह रहे थे, लेकिन इस पैंतरे में भी वो नाकाम ही रहे। ऑप्रेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने अपने निजी और सार्वजनिक प्रसारकों का इस्तेमाल करते हुए दावा कि उन्होंने भारतीय सेना के ब्रिगेड मुख्यालय, एक एस-400 प्रणाली बैट्री, पंजाब और जम्मू में सैन्य प्रतिष्ठानों का निशाना बनाया। इसके ज़वाब में नई दिल्ली ने पुख्ता सबूत पेश करके उनके खोखले दावों की हवा निकाल दी। अपने अपाहिज़ पक्ष को मजबूती देने के लिए पाकिस्तानी टीवी चैनलों पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की बाइट चलायी गयी, जिसमें वो बहककर कहते दिखे कि उन्होंने 1971 का बदला ले लिया। हद तो तब हो गयी, जब पाकिस्तानी मीडिया ने आतंकी ठिकानों से सामने आयी मलबे और खून की तस्वीरों को शहादत का कैप्शन लगाकर प्राइम टाइम स्लॉट में चलाया। जेहाद, शहादत, अल्लाह की रज़ा, न्यूक्लियर ताकत और बहादुर कौम जैसे शब्दों को पाकिस्तानी मीडिया घरानों की ओर से चले न्यूज पैकेजों में लगातार दोहराया जाने लगा। नई दिल्ली की आंतकरोधी कार्रवाई को उन्होंने धार्मिक युद्ध करार दिया। भारत की छवि पाकिस्तानी चैनलों ने फासीवादी मुल्क के तौर पर पेश की।
आंतकी ठिकानों और प्रशिक्षण केंद्रों पर भारतीय सैन्य बलों के हमले को पाकिस्तान ने अपनी अस्मत, आबरू और इज़्ज़त पर हमला बताया। हालात भड़काने के लिए पाकिस्तानी सेना ने हवाला दिया कि भारतीय मिसाइलें मस्जिदों पर दागी गयी, जिसमें आम नागरिक घायल हुए। अपने लोगों के सामने इस्लामाबाद ने नई दिल्ली को आंतकवाद विरोधी मुल्क नहीं, बल्कि ईशनिंदक बताया। पाकिस्तान के इस दावे की हवा निकालने के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडलों ने कई मुल्कों का दौरा किया और पुख्ता-जमीनी सबूत सामने रखकर उनकी नंगी असलियत दुनिया के सामने रख दी। शहबाज़ शरीफ की हताशा का ये आलम था कि जब भारतीय सेना ने 80 आतंकियों को मारने का साक्ष्य सामने रखा तो उन्होंने इसे ख्याली करार दिया। जंगी गहमागहमी खत्म होने के बाद पाकिस्तानी सेना ने चीनी सेना के युद्धाभ्यास से जुड़ी पुरानी तस्वीर को अपनी शौर्य गाथा बताते हुए अपनी जनता के सामने रखा। ऑप्रेशन सिंदूर के दौरान ISI ने जंग से जुड़े कई फर्जी, पुराने और दूसरे मुल्कों के क्लिप सोशल मीडिया पर जमकर चलाये। गूगल रिवर्स सर्च से उसकी पोल खुल गयी।
मैदान में पिछड़ने के बावजूद पड़ोसी मुल्क ने न्यूजरूम, डिबेट्स, सेमिनार, रैलियों, मीम्स, हैशटैग्स, ट्रैंडस, इंफ्लूएसर्स, वेस्टर्न मीडिया और सोशल मीडिया का सहारा लिया ताकि खुद को जीता हुआ दिखा सके, लेकिन यहां भी उसे भारत से करारी शिकस्त ही मिली। चाहे जंगी मैदान हो या काउंटर नैरेटिव, एजेंडा, या फिर पर्सपेक्टिव का अखाड़ा इस्लामाबाद के खिलाफ नई दिल्ली हमेशा आगे ही रहेगी।
इस आर्टिकल के लेखक राम अजोर वरिष्ठ पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं।
