Manipur Violence : पूर्वोत्तर का राज्य मणिपुर हिंसा की आग में बीते करीब 80 दिनों से हिंसा की आग में धधक रहा है। हिंसा, उपद्रव और नफरत की खाई ने लोगों में जातीय विभाजन कर दिया है। एक समुदाय दूसरे समुदाय पर हमले कर रहा है। आगजनी एवं हिंसा की घटनाएं थम नहीं रहीं। इस हिंसा में अब तक 160 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों की संख्या में लोग विस्थापित हैं और सुरक्षित जगहों पर शरण लिया है।
मणिपुर के सीएम एन बीरेन सिंह।
मणिपुर में लोगों को एयरलिफ्ट करना पड़ा
मणिपुर में बिगड़े हालात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि एक समुदाय के लोगों को एयरलिफ्ट करना पड़ा है। चार माई को दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर उनकी परेड कराए जाने की घटना से देश आक्रोशित है। लोगों में गुस्सा है। मणिपुर हिंसा की गूंज संसद में सुनाई दे रही है। सरकार पर हमलावर विपक्ष मणिपुर मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की मांग कर रहा है। संसद चल नहीं पा रही है।
सवालों के घेरे में है बीरेन सिंह की भूमिका
मणिपुर हिंसा शुरू होने के बाद इसके फैलने तक मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की भूमिका सवाल के घेरे में है। कानून-व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी होती है लेकिन रिपोर्टों में दावा किया गया है कि हिंसा थामने के लिए समय रहते जो जरूरी उपाय करने चाहिए थे उसमें सिंह से चूक हुई। आरोप है कि उन्होंने समय की नजाकत नहीं समझी और हिंसा रोकने के लिए जिस तरह के कदम उठाने की जरूरत थी, उन्होंने नहीं उठाए। विपक्ष का कहना है कि हिंसा रोकने में सीएम सिंह नाकाम हुए हैं। विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग की लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उन्हें पद से नहीं हटाया।
सीएम के पास नहीं सवालों के जवाब
हिंसा को लेकर सीएम बीरेन को तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया के सवालों को वह जवाब नहीं दे पा रहे हैं। टाइम्स नाउ नवभारत ने सोमवार को बीरेन सिंह से हिंसा को लेकर सवाल किए लेकिन उन्होंने सवालों से बचने की कोशिश की और कैमरे के सामने से निकल गए। रिपोर्टर उनसे सवाल पूछती रह गईं। बाद में उनके सुरक्षाकर्मियों ने रिपोर्टर को वहां से हटाने की भी कोशिश की।
पुलिस ने दो महिलाओं को भीड़ को सौंपा
कई सवाल मणिपुर पुलिस पर भी उठे हैं। यह राज्य की पुलिस ही थी जिसने चार मई को दो महिलाओं को उग्र भीड़ के हवाले कर दिया। पुलिस का लोगों की सुरक्षा करना होता है लेकिन उसने महिलाओं की सुरक्षा करने की जगह उसे भीड़ को सौंप दिया। पुलिस राज्य के गृह मंत्रालय के अधीन होता है। गृह मंत्रालय का प्रभार बीरेन सिंह के पास ही है।राज्य में हिंसा का दौर शुरू होने के बाद सीएम बीरेन सिंह कई बार लोगों से शांति बनाए रखने की अपील कर चुके हैं लेकिन धरातल पर उनकी बातों का असर नहं हुआ है।
लोगों का भरोसा खो चुके हैं सीएम!
ऐसा लगता है कि कुकी एवं अन्य आदिवासी समुदाय जिनकी राज्य में आबादी करीब 30 से 40 फीसदी है उन पर कोई प्रभाव नहीं है। लगता है कि यह आबादी सीएम को पसंद नहीं करती। मणिपुर के लोगों को भरोसे में लेने की जरूरत है लेकिन ऐसा लगता है कि सीएम में लोगों का भरोसा नहीं है। सीएम को बदलने से राज्य में यदि हिंसा थमती है तो भाजपा को अपना सीएम बदलना चाहिए। राज्य की कमान उसे ऐसे चेहरे को सौंपनी चाहिए जिस पर दोनों समुदाय मेतेई और कुकी को भरोसा हो।
कुकी समुदाय के मन में संदेह
मणिपुर का नागा पीपुल्स फ्रंट ने सीएम सिंह पर नाराजगी जताते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है। फ्रंट ने उन्हें बर्खास्त करने की मांग की है। सिंह के पास पूर्ण बहुमत है, लिहाजा यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उन पर किसी तरह का कोई दवाब रहा होगा। हिंसा रोकने के लिए सीएम सिंह ने जो आदेश दिया उसे कुकी समुदाय खुद को सताए जाने के तौर पर देखता है, इसकी एक वजह बीरेन सिंह का मेतेई समुदाय से आना है। कुकी समुदाय का मानना है कि राज्य सरकार निष्पक्ष तरीके से काम नहीं कर रही है और उसके साथ भेदभाव हो रहा है।
कौन हैं एन बीरेन सिंह
सियासत में पारी शुरू करने से पहले एन बीरेन सिंह फुटबाल एवं पत्रकारिता में अपना नाम कमा चुके थे। कहा जाता है कि खेल एवं पत्रकारिता में उनकी रुचि उन्हें राजनीति में खींचकर ले आई। भारतीय जनता पार्टी में आने से पहले सिंह कांग्रेस में थे। कांग्रेस के सीएम ओकराम इबोबी सिंह से इन्होंने राजनीति के दांव-पेंच सीखे। यह अलग बात है कि सीएम बनने के लिए सिंह ने अपनी पार्टी से बगावत कर दी। वह साल 2017 में भाजपा की अगुआई में बनी सरकार के पहले मुख्यमंत्री बने। मैतेई समुदाय से आने वाले बीरेन सिंह देश के बाहर खेलने वाले मणिपुर के एकमात्र चर्चित फुटबाल खिलाड़ी थे। बीरेन सिंह का डिफेंस कमाल का माना जाता था। 1981 में डूरंड कप जीतने वाली सीमा सुरक्षा बल टीम का वह हिस्सा थे। उन्होंने बतौर संपादक नाहोरोलगी थुआदंग नामक एक अखबार में भी काम किया।
