Indo-Russia Relation: मजबूत है मॉस्को और दिल्ली के तिजारती तालुक्कात, वाशिंगटन करेगा सेंधमारी?

शीतयुद्ध से पहले वाशिंगटन और मॉस्को के बीच जंगी मोर्चें भले ही खत्म हो गए हों लेकिन इसके बाद से पॉलिसी वॉर में इजाफा देख गया खासतौर से अमेरिकी हुक्मरान की ओर से। आज से करीब आठ साल पहले अमेरिकी निजाम ने ये कानून कायम किया कि तरह-तरह के बैन लगाकर अमेरिका के दुश्मनों को घुटनों पर ला दिया जाए।

रूसी सुरक्षा बलों ने जैसे ही यूक्रेनी सरजमीं पर अपना मोर्चा खोला तो कथित पश्चिमी उदारवादी जम्हूरियत पसंद मुल्कों ने क्रेमलिन पर नकेल कसने की हरमुमकिन कोशिश को अंजाम दिया। मॉस्को के हौंसले को तोड़ने के लिए उस पर बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। पूर्वी यूरोप में उसके आयात-निर्यात को खासतौर से रोका गया, अमेरिका के इशारे पर रूसी अर्थव्यवस्था को बेल्जियम ने स्विफ्ट बैकिंग सिस्टम से बाहर कर दिया। इन कवायदों ने आधे अधूरे तौर पर मॉस्को को परेशान किया, लेकिन इसका दीर्घकालीन असर नदारद रहा। अभी तक पश्चिमी मुल्कों के साथ रूस के तिजारती तालुक्कात खटास भरे हैं, बावजूद इनके रूसी इकोनॉमी लड़खड़ाते-लड़खड़ाते ट्रैक पर बनी रही। जहां एक ओर अमेरिकी अगुवाई वाले देशों ने रूसी निर्यात को रोका तो वहीं क्रेमलिन ने पश्चिम की ओर होने वाले आयात प्रवाह को बाधित किया। प्रतिबंधों के चलते रूस से होने वाले डॉलर और यूरो एक्सचेंज को भी सीमित दायरे में बांध दिया गया। इन हालातों को दरकिनार करते हुए मॉस्को ने करीबी दोस्ताना मुल्कों के साथ अपने रिश्तों को धार दी और पश्चिमी बॉयकाट के असर को धत्ता बता दिया। इस फेहरिस्त में मॉस्को और नई दिल्ली एक दूसरे के साथ खड़े नजर आए।

Indo Russia Relation

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

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