पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी तनाव के बीच यमन से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। यमन के हूती विद्रोहियों ने महज 48 घंटे के भीतर लाल सागर के लगभग पूरे रणनीतिक तटीय इलाके और बेहद अहम मोखा (Mokha) बंदरगाह पर कब्जा जमा लिया है। यमन की सऊदी समर्थित सरकारी सेना के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।
मोखा बंदरगाह का गिरना और सऊदी की नाकेबंदी (Photo: AI Generated/Newsroom Verified)
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि साल 2014 से चल रही इस जंग में हूतियों ने अचानक इतनी तेजी से इतना बड़ा जमीनी इलाका कैसे हथिया लिया? AP की एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट के अनुसार, हूतियों ने यह जंग अकेले नहीं जीती, बल्कि मैदान-ए-जंग में उनके साथ ईरान के 'इरमी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (IRGC) के सीनियर सैन्य सलाहकार मौजूद थे।
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रणनीति से लेकर युद्ध के मैदान तक: ईरान की सीधी एंट्री
यमन के गृहयुद्ध की शुरुआत से ही ईरान पर हूतियों को हथियार और ड्रोन देने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन यह पहली बार है जब ईरानी सैन्य सलाहकारों के सीधे मोर्चे पर मौजूद रहने के सबूत मिले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में तेहरान से सना (यमन की राजधानी) आई एक विशेष फ्लाइट के जरिए ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और हिजबुल्लाह के टॉप सलाहकारों का जत्था यमन पहुंचा था।
पहले ईरानी सलाहकार केवल पर्दे के पीछे से रणनीतिक योजनाएं बनाते थे, लेकिन इस बार वे कमांड सेंटर से लेकर मोर्चे की अग्रिम पंक्तियों तक में तैनात थे। उन्होंने न सिर्फ हमले की हर एक बारीकी तय की, बल्कि हूतियों को सैटेलाइट इंटेलिजेंस डेटा और दुश्मन सेना के वॉकी-टॉकी कम्युनिकेशन को हैक करने में सीधी तकनीकी मदद भी दी।
(Photo: iStock)
सरकारी सेना का बिखराव और 'कम्युनिकेशन हैक'
एपी की रिपोर्ट के मुताबिक हूतियों का यह 115 किलोमीटर का आक्रामक हमला केवल ताकत के दम पर नहीं, बल्कि सरकारी सेना की अंदरूनी फूट के कारण कामयाब हुआ। तटीय इलाके में तैनात यमन सरकार की 'नेशनल रेजिस्टेंस' सेना (जिसमें करीब 30,000 जवान थे) लंबे समय से युद्ध से दूर थी।
हूतियों ने हमले की शुरुआत में एक महीने तक लगातार 130 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलों और 145 सुसाइड ड्रोन्स से हमला बोला। इसके बाद उन्होंने 'नेशनल रेजिस्टेंस' के इंटरनल कम्युनिकेशन नेटवर्क को पूरी तरह हैक कर लिया। इससे हूतियों को यह पहले से पता चल जाता था कि सरकारी सेना किस तरफ बढ़ रही है। इस भ्रम की वजह से कमांडरों का अपने ही जवानों से संपर्क टूट गया और सेना में भगदड़ मच गई।
'जायंट्स ब्रिगेड' की आपसी दुश्मनी का फायदा
जब 'नेशनल रेजिस्टेंस' दबाव में थी, तब उसकी मदद के लिए यमन की ही एक दूसरी मिलिशिया 'जायंट्स ब्रिगेड' आगे आई। लेकिन दोनों गुटों के बीच पहले से ही संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के प्रभाव को लेकर पुरानी आपसी प्रतिद्वंद्विता थी।
किसी एक केंद्रीय कमान (यूनिफाइड कमांड) के न होने की वजह से दोनों गुट आपस में ही उलझ गए। हूतियों ने इस आपसी फूट का पूरा फायदा उठाया और 9 सितंबर को पहाड़ों के रास्ते तेजी से आगे बढ़ते हुए सप्लाई लाइन काट दी। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि 'नेशनल रेजिस्टेंस' के शीर्ष नेता लेफ्टिनेंट जनरल तारिक सालेह को भागकर सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी।
रातों-रात खाली हो गया मोखा शहर
9 सितंबर की शाम को जब पीछे हटने का आदेश जारी हुआ, तो हजारों हथियारबंद जवान मोखा बंदरगाह शहर की ओर भागने लगे। मोखा में तैनात सैनिकों को लगा कि हूतियों ने शहर पर सीधा हमला कर दिया है, जिससे वे भी डरकर भाग निकले।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि सेना उन्हें भगवान के भरोसे छोड़कर भाग गई। इसके बाद जान बचाने के लिए दसियों हजार आम नागरिक भी रातों-रात शहर छोड़कर निकल गए। 10 सितंबर की सुबह जब हूती विद्रोही मोखा पहुंचे, तो पूरा शहर खाली पड़ा था और उन्हें बिना एक भी गोली चलाए पूरे बंदरगाह और आसपास के रणनीतिक द्वीपों पर नियंत्रण मिल गया। हूतियों के हाथ भारी मात्रा में यूएई और सऊदी अरब के अत्याधुनिक हथियार, बख्तरबंद गाड़ियां और गोला-बारूद लग गए।
दुनिया और तेल बाज़ार पर इसका क्या असर होगा?
मोखा बंदरगाह और लाल सागर तट पर कब्जा हो जाने से हूतियों की स्थिति अब बेहद मजबूत हो गई है। यहां से वे लाल सागर से गुजरने वाले सऊदी अरब के तेल टैंकरों और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को आसानी से निशाना बना सकते हैं।
इस कब्जे के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने की आशंका बढ़ गई है। इसके अलावा, अमेरिका और उसके सहयोगी सऊदी अरब के लिए यह बहुत बड़ा रणनीतिक झटका है, क्योंकि यह इलाका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। फिलहाल, सरकारी सेना फिर से एकजुट होने की कोशिश कर रही है, लेकिन हूतियों ने जीते हुए नए इलाकों में अपनी कंक्रीट की मजबूत किलेबंदी शुरू कर दी है।
