History of Cities in India: अगर कोई आपसे आपकी पसंदीदा जगह के बारे में पूछे तो हम अक्सर ऐसे शहरों का नाम लेते हैं जिनका एक लंबा और रोचक इतिहास रहा हो। हम दिल्ली, जयपुर, वाराणसी, उज्जैन या कोलकाता जैसे प्राचीन और सांस्कृतिक विरासत वाले शहरों के बारे में अक्सर सोचते हैं, जिन्हें समय के साथ संजोकर रखा गया है। लेकिन किसी शहर को केवल संग्रहालय में रखी वस्तु की तरह याद नहीं किया जा सकता। जरूरी है कि वह आपको अतीत की सैर कराए और साथ ही उसमें हर पल का आनंद लेने का अवसर भी दे। शहरों की इन्हीं गलियों में एक सवाल यह भी गूंजता है कि इनकी उत्पत्ति कैसे और कब हुई? साथ ही किसी नगर का निर्माण किन बुनियादी ढांचों पर होता है? बात अगर शहरों के इतिहास की करें तो भारत में और विश्व के सबसे प्राचीन नगरों में काशी अर्थात बनारस का नाम शीर्ष पर है, जिसका उल्लेख हिंदू धर्म ग्रंथों में भी मिलता है। इसी के साथ एक श्रेय हड़प्पा संस्कृति को भी जाता है, जहां से शहरीकरण की विचारधारा का जन्म हुआ। ऐसे में आज हम आपको भारत में शहरों के इतिहास से रूबरू करवाएंगे और बताएंगे कि कैसे कोई बंजर भू का टुकड़ा या एरिया सभी संसाधनों के साथ लोगों के रहने का जरिया बन जाता है...?
भारत में शहरों की उत्पत्ति और विकास
सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष (फोटो: iStock)
सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान शहरों का विकास
सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार अत्यंत व्यापक था और यह मुख्य रूप से इन्दुस (Indus) नदी के किनारे विकसित हुई थी। भौगोलिक उच्चारण में अंतर के कारण इस नदी को ‘सिंधु’ कहा गया, और धीरे-धीरे इसी नाम से यहां रहने वाले लोगों के लिए ‘हिन्दू’ शब्द उत्पन्न हुआ। भारत में शहरीकरण की शुरुआत इसी सभ्यता से हुई। इसके नगर आधुनिक शहरी नियोजन के बेहतरीन उदाहरण थे, जिनमें ग्रिड-पैटर्न वाली सड़कें, सुव्यवस्थित सीवरेज प्रणाली और मानकीकृत ईंट निर्माण जैसी विशेषताएं देखने को मिलती थीं। प्रारंभिक हड़प्पा काल (लगभग 5500-2800 ईसा पूर्व) में ग्रामीण समुदायों का विकास हुआ और परिपक्व हड़प्पा काल (लगभग 2800-1900 ईसा पूर्व) में बड़े शहरों का निर्माण हुआ, जो कुशल प्रशासन, जल निकासी और व्यापारी गतिविधियों के प्रमाण थे। 1900 ईसा पूर्व के आसपास यह सभ्यता धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ी, जिसके पीछे जलवायु परिवर्तन, नदियों का सूखना, सामाजिक-आर्थिक बदलाव और बाहरी आक्रमण जैसे कई कारक रहे। इसके नगर वीरान हो गए, लेकिन इसके कुछ सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाज बाद के काल में भी जीवित रहे।
मुगल सल्तनत के दौरान भारतीय शहर (फोटो: Canva)
मध्यकालीन युग में शहरों की नींव
भारत में मध्यकालीन युग लगभग 8वीं से 18वीं शताब्दी तक माना जाता है। मध्यकालीन भारत में शहरों का विकास विशेष रूप से दिल्ली सल्तनत और मुगलों के शासनकाल के दौरान हुआ। इस समय व्यापार, वाणिज्य, कृषि और शिल्पकला के क्षेत्र में विस्तार ने शहरी केंद्रों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शाही प्रशासन द्वारा भूमि राजस्व का खर्च, सेवा क्षेत्र में बढ़ती मांग, और फारस से आए रेशम और कागज जैसे नए उद्योगों की स्थापना, शहरी विकास के मुख्य कारण थे। इस दौर में विभिन्न प्रकार के शहर अस्तित्व में आए, जैसे प्रशासनिक केंद्र, धार्मिक नगर, तीर्थ स्थल और वाणिज्यिक केंद्र, जो क्रमशः सत्ता, धर्म और व्यापार के केंद्र बने। विशेष रूप से 13वीं से लेकर 18वीं शताब्दी के दौरान कई कस्बों और शहरों का विकास और उत्थान हुआ, जिसने राजनीतिक सत्ता और सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव डाला। इस काल के प्रमुख शहरों में तंजावुर, विजयनगर, कालीकट, आगरा, कोचीन, बीजापुर, फतेहपुर सीकरी, लाहौर, पटना, शाहजहानाबाद (दिल्ली), मदुरै, हम्पी, सूरत, सोमनाथ, कांचीपुरम, अजमेर और मसूलीपट्टनम शामिल थे।
ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान भारतीय शहरों का विकास (फोटो: Canva)
ब्रिटिश क्राउन के अधीन नगरों का विस्तार
1757 में प्लासी के युद्ध के बाद भारत पर अंग्रेजों का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ा और ब्रिटिश शासन की नींव पड़ी। 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त होकर भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। अंग्रेजी शासन के दौरान मद्रास (चेन्नई), बॉम्बे (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) जैसे शहरों को व्यापारिक, प्रशासनिक और सैन्य केंद्र के रूप में विकसित किया गया, जो औपनिवेशिक प्रभुत्व का प्रतीक बने। इस समय नए शहरों की योजनाबद्ध बसावट हुई, जिससे आधुनिक नगर नियोजन के सिद्धांतों, नस्लीय विभाजन (जैसे "श्वेत" और "काले" बस्तियों) और इंडो-गोथिक वास्तुकला जैसी नई शैली का विकास हुआ। स्वतंत्रता के बाद भी नए शहर, जैसे चंडीगढ़, बनाए गए, जिनमें आधुनिक शहरी नियोजन के विचार अपनाए गए। हालांकि, इससे पहले भी फतेहपुर सीकरी और जयपुर जैसे नियोजित शहर मौजूद थे, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से संगठित शहरी विकास का उदाहरण प्रस्तुत किया।
आधुनिक भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया (फोटो: Canva)
आजादी के बाद शहरीकरण की प्रक्रिया तेज
स्वतंत्रता के बाद भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी है। 1951 में शहरी आबादी केवल 17.6% थी, जो 2001 तक 27.8% और 2011 में 31.16% तक पहुंच गई। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 7,933 शहर और कस्बे हैं। वर्तमान में, देश के आठ सबसे बड़े शहरों का निर्मित क्षेत्रफल 1995 में 2,136 वर्ग किलोमीटर था, जो 2025 में बढ़कर 4,308 वर्ग किलोमीटर हो जाएगा। Economic Times की रिपोर्ट के मुताबित, इसका मुख्य कारण ग्रामीण इलाकों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन, औद्योगिकीकरण और बेहतर रोजगार अवसर हैं। भारत में 50 से अधिक ऐसे शहर हैं, जिनकी जनसंख्या एक मिलियन से अधिक है, जिनमें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु शामिल हैं। हालांकि शहरीकरण में वृद्धि हुई है, फिर भी यह वैश्विक मानकों की तुलना में धीमी रही है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, 2030 तक भारत की शहरी आबादी 40.76% तक पहुंच सकती है। बढ़ते शहरीकरण के साथ बुनियादी ढांचे, जल आपूर्ति, परिवहन और आवास जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं, इसलिए समावेशी और सतत शहरी विकास की योजनाओं की आवश्यकता बढ़ गई है।
शहरों की उत्पत्ति या विकास कब होता है (AI Image)
शहरों की उत्पत्ति या विकास कब होता है?
शहरों की उत्पत्ति या विकास तब शुरू होता है जब लोग बेहतर आर्थिक अवसरों, सुविधाजनक बुनियादी ढांचे और उन्नत जीवन स्तर की तलाश में किसी स्थान पर इकट्ठा होते हैं। यह छोटे गाँवों को धीरे-धीरे बड़े कस्बों और अंततः शहरों में बदल देता है। शहरीकरण की प्रक्रिया में प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर प्रवासन जैसे कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और परिवहन जैसी सुविधाओं को आकर्षित करते हैं। एक टिकाऊ शहर को योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया जाता है, जिसमें लचीला इंफ्रास्ट्रक्चर, किफायती आवास, नवीकरणीय ऊर्जा और सामुदायिक विकास शामिल होते हैं
