विरोध, आत्म-शुद्धि और सत्ता की गूंज: भारतीय इतिहास में अनशन और भूख हड़ताल की विरासत

भारतीय लोकतंत्र और इतिहास में 'अनशन' केवल भोजन का त्याग नहीं है। यह अनैतिकता के खिलाफ नैतिक बल की, तलवार के खिलाफ आत्म-बलिदान की और सत्ता के अहंकार के खिलाफ जनता की बेबसी को ताकत में बदलने की एक पवित्र विधा है।

महात्मा गांधी, भगत सिंह, जतींद्रनाथ दास, पी. श्रीरामुलु, इरोम शर्मिला, अन्ना हजारे, प्रो. जी. डी. अग्रवाल... और अब सोनम वांगचुक। भारत में यह सूची बहुत लंबी है। समय बदला, शासक बदले और मुद्दे भी बदले, लेकिन व्यवस्था के खिलाफ विरोध जताने और अपनी बात को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने का सबसे अचूक और शक्तिशाली तरीका आज भी एक ही है-'अनशन' या 'भूख हड़ताल'। अनशन कुछ दिनों का रहा हो या फिर 16 साल तक खिंचा हो, इसने हर दौर में उस देश के दिल को झकझोरा है जो अन्याय के खिलाफ लड़ाई में अहिंसक प्रतिरोध की अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व करता है।

history of hunger strike in india

भारत में अनशन का इतिहास (AI Photo)

वर्तमान में, परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्रों की संस्था ’कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) के साथ एकजुटता दिखाते हुए शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे हैं। उनके इस आंदोलन का आज 20वां दिन है। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद वांगचुक का यह संकल्प समसामयिक भारतीय इतिहास में भूख हड़ताल की उसी गौरवशाली और दार्शनिक परंपरा का हिस्सा है, जिसकी नींव राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने रखी थी।

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