Caste Census: आजादी से पहले भारत में 1881 से 1931 के बीच की गई जनगणना के दौरान सभी जातियों की गणना की गई थी, लेकिन 1951 में स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना के समय तत्कालीन सरकार ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों को छोड़कर अन्य जातियों की गणना नहीं कराने का निर्णय लिया। एक दशक बाद 1961 में, केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा कि वे चाहें तो अपने स्तर पर सर्वेक्षण कराएं और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूचियां तैयार करें। आपको बताते हैं कि भारत में जनगणना का क्या इतिहास है।
जाति जनगणना से जुड़े 5 अहम सवाल।
भारत में जनगणना का इतिहास
भारत दुनिया के उन बहुत कम देशों में से एक है, जिसका हर दस साल बाद जनगणना करने का गौरवशाली इतिहास है। भारतीय जनगणना का इतिहास बहुत लंबा है। सबसे पुराने साहित्य ‘ऋग्वेद’ से पता चलता है कि 800-600 ईसा पूर्व के दौरान किसी तरह की जनसंख्या गणना की जाती थी। 321-296 ईसा पूर्व के आसपास लिखे गए कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कराधान के उद्देश्य से राज्य की नीति के उपाय के रूप में जनगणना पर जोर दिया गया था।
भारत में जनगणना का इतिहास। (तस्वीर- 'Directorate of Census Operations, Tamil Nadu')
'आइने-अकबरी' में शामिल थे व्यापक डेटा
मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल के दौरान, प्रशासनिक रिपोर्ट 'आइने-अकबरी' में जनसंख्या, उद्योग, धन और कई अन्य विशेषताओं से संबंधित व्यापक डेटा शामिल थे। प्राचीन रोम में भी कराधान के उद्देश्य से जनगणना की जाती थी। भारतीय जनगणना के इतिहास को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है, यानी स्वतंत्रता पूर्व युग और स्वतंत्रता के बाद का युग। आपको हम बताते हैं कि आजादी से पहले कब-कब और कितनी बार पूर्ण जनगणना कराई गई थी।
भारत में इलाहाबाद और बनारस में हुई थी जनगणना
जनगणना का इतिहास 1800 से शुरू होता है जब इंग्लैंड ने अपनी जनगणना शुरू की थी, लेकिन उस समय आश्रित देशों की जनसंख्या ज्ञात नहीं थी। इसके क्रम में, इस पद्धति के आधार पर 1824 में इलाहाबाद शहर में और 1827-28 में जेम्स प्रिंसेप द्वारा बनारस शहर में जनगणना की गई थी। किसी भारतीय शहर की पहली पूर्ण जनगणना 1830 में हेनरी वाल्टर द्वारा ढाका में की गई थी। इस जनगणना में लिंग और व्यापक आयु वर्ग के साथ जनसंख्या के आंकड़े और साथ ही उनके साथ रहने वाले घरों की सुविधाएं एकत्रित की गईं।
भारत में जनगणना का इतिहास। (तस्वीर- 'Directorate of Census Operations, Tamil Nadu')
'जनगणना कार्य निदेशालय, तमिलनाडु' के अनुसार... दूसरी जनगणना 1836-37 में फोर्ट सेंट जॉर्ज द्वारा की गई थी। 1849 में भारत सरकार ने स्थानीय सरकार को जनसंख्या के पंचवर्षीय रिटर्न का संचालन करने का आदेश दिया। परिणामस्वरूप मद्रास में लोगों की आवधिक स्टॉक लेने की एक प्रणाली का उद्घाटन किया गया जो शाही जनगणना के आदेश दिए जाने तक जारी रही। ये रिटर्न क्रमशः आधिकारिक वर्षों 1851-52, 1856-57, 1861-62 और 1866-67 के दौरान लिए गए थे। उत्तर पश्चिमी प्रांतों में जनगणना 1852 में हुई, जो 31 दिसंबर 1852 की रात को प्रांत के सभी लोगों की नियमित घर-घर जाकर गिनती थी। 1866-67 की पंचवर्षीय जनगणना को 1871 की शाही जनगणना में मिला दिया गया था।
वर्ष 1866-67 में देश के अधिकांश हिस्सों में लोगों की वास्तविक गिनती करके जनगणना की गई थी, जिसे 1872 की जनगणना के रूप में जाना जाता है। ये लॉर्ड मेयो के नेतृत्व में हुई थी, लेकिन यह पूरी तरह से नहीं थी। इस जनगणना में अंग्रेजों के कब्जे वाले या उनके नियंत्रण वाले सभी क्षेत्रों को शामिल नहीं किया गया था। इस जनगणना में 17 सवालों के साथ एक हाउस रजिस्टर तैयार किया गया था। एकत्र की गई जानकारी नाम, आयु, धर्म, जाति या वर्ग, नस्ल या राष्ट्रीयता, स्कूल/कॉलेज में भाग लेने और पढ़ने और लिखने में सक्षम होने से संबंधित थी। ये सामान्य प्रश्न पुरुषों और महिलाओं से अलग-अलग पूछे गए थे। व्यवसाय पर एक प्रश्न केवल पुरुषों के लिए पूछा गया था। हालांकि 1881 में पहली पूर्ण जनगणना हुई, जिसमें जाति संबंधी डेटा भी एकत्र किया गया था।
आजादी से पहले भारत में कब-कब हुई जनगणना
पहली जनगणना). 1881 की जनगणना जो 17 फरवरी, 1881 को भारत के जनगणना आयुक्त डब्ल्यू.सी. प्लोडेन द्वारा की गई थी, एक आधुनिक समकालिक जनगणना की दिशा में एक बड़ा कदम था। तब से, जनगणना हर दस साल में एक बार निर्बाध रूप से की जाती रही है। इस जनगणना में न केवल पूर्ण कवरेज पर बल्कि जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक विशेषताओं के वर्गीकरण पर भी जोर दिया गया था।
दूसरी जनगणना). दूसरी जनगणना 26 फरवरी, 1891 से लगभग 1881 की जनगणना की तर्ज पर की गई। इस जनगणना में शत-प्रतिशत कवरेज के प्रयास किए गए तथा वर्तमान बर्मा, कश्मीर और सिक्किम के ऊपरी भाग को भी शामिल किया गया। इस जनगणना के दौरान वही अनुसूची दोहराई गई जिसमें 14 प्रश्न थे। धर्म, जाति, साक्षरता, व्यवसाय आदि के प्रश्नों को और संशोधित किया गया।
भारत में जनगणना का इतिहास। (तस्वीर- 'Directorate of Census Operations, Tamil Nadu')
तीसरी जनगणना). तीसरी सतत जनगणना 1 मार्च, 1901 को शुरू हुई। इस जनगणना में बलूचिस्तान, राजपूताना, अंडमान निकोबार, बर्मा, पंजाब तथा कश्मीर के सुदूर क्षेत्रों को शामिल किया गया तथा अन्य क्षेत्रों के संबंध में, जहां विस्तृत सर्वेक्षण संभव नहीं था, वहां घरों के आधार पर जनसंख्या का अनुमान लगाया गया। 1901 की जनगणना की जनगणना अनुसूची में 16 प्रश्न थे।
चौथी जनगणना). 1911 की जनगणना 10 मार्च, 1911 को सभी चौदह ब्रिटिश प्रांतों और देशी राज्यों में शुरू हुई थी। इस जनगणना में, भारत के पूरे साम्राज्य यानी भारत सरकार और मध्यस्थ देशी राज्यों द्वारा प्रशासित क्षेत्रों को बर्मा और असम की सीमाओं पर कुछ विरल आबादी वाले और गैर-प्रशासित इलाकों को छोड़कर शामिल किया गया था। इस जनगणना में शामिल जनगणना अनुसूची में 16 प्रश्नों की संख्या समान थी, लेकिन उनका दायरा बढ़ा दिया गया था।
भारत में जाति जनगणना का इतिहास। (तस्वीर- 'Directorate of Census Operations, Tamil Nadu')
पांचवीं जनगणना). 1921 की जनगणना, अपनी निरंतर श्रृंखला में पांचवीं जनगणना 18 मार्च, 1921 को शुरू हुई थी। इस जनगणना में भारतीय साम्राज्य के रूप में जाना जाने वाला पूरा क्षेत्र शामिल था, जिसमें भारत सरकार द्वारा सीधे नियंत्रित क्षेत्र भी शामिल थे, जिन्हें आमतौर पर ब्रिटिश भारत और भारतीय राज्यों के रूप में जाना जाता था, जिसमें केंद्र सरकार या किसी अन्य प्रांतीय सरकार के साथ राजनीतिक संबंध में भारतीय प्रमुख द्वारा प्रशासित क्षेत्र शामिल थे।
छठी जनगणना). भारत की छठी आम जनगणना 26 फरवरी, 1931 को शुरू हुई थी। इस जनगणना में शामिल क्षेत्र 1921 की जनगणना द्वारा कवर किए गए क्षेत्र के लगभग बराबर था। 1931 की जनगणना भी सविनय अवज्ञा आंदोलन के साथ हुई थी। 1931 की जनगणना की जनगणना अनुसूची में 1921 की जनगणना के 16 प्रश्नों के बजाय 18 प्रश्न हैं। जोड़े गए दो नए प्रश्न थे- (ए) कमाने वाला या आश्रित और (बी) मातृभाषा (जो केवल 1881 में पूछा गया था)।
आखिरी बार देश भर में कब और किस आधार पर हुई थी जाति गणना?
छह दशक से अधिक समय बाद अब, विभिन्न धड़ों एवं अलग-अलग राजनीतिक दलों की मांगों के बाद सरकार ने अगली राष्ट्रव्यापी जनगणना में जाति गणना को शामिल करने का निर्णय लिया है। आखिरी बार देश भर में जाति गणना 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) के तहत की गई थी, जिसका उद्देश्य परिवारों और व्यक्तियों की जाति सहित उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी एकत्र करना था। आपको जाति जनगणना के इतिहास, राजनीति और हाल के घटनाक्रम पर एक नजर डालना चाहिए।
सवाल नंबर 1). जाति गणना क्या है?
जाति गणना में राष्ट्रीय जनगणना कवायद के दौरान व्यक्तियों की जातियों पर आंकड़ों का व्यवस्थित संग्रह शामिल है। भारत में, जहां जाति ने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिशीलता को आकार दिया है, ऐसे आंकड़े जनसांख्यिकीय वितरण, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और विभिन्न जाति समूहों के प्रतिनिधित्व के बारे में जानकारी प्रदान कर सकते हैं। इस जानकारी का इस्तेमाल विभिन्न कार्यक्रमों में आरक्षण और सामाजिक न्याय पर नीतियों को सूचित करने के लिए किया जा सकता है।
जाति जनगणना।
सवाल नंबर 2). इसका ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भारत में जाति गणना का एक लंबा इतिहास है। इसमें मुख्य रूप से तीन दौर हैं। पहला- ब्रिटिश भारत का वक्त, दूसरा- स्वतंत्रता के बाद का बदलाव और तीसरा- 1961 का निर्देश... आपको इन तीनों के बारे में तफसील से समझाते हैं।
ब्रिटिश भारत (1881-1931): ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने 1881 और 1931 के बीच हर दशक में आयोजित जनगणना में जाति गणना को शामिल किया। इन सर्वेक्षणों ने विस्तृत जनसांख्यिकीय आंकड़े प्रदान करते हुए जनसंख्या को जाति, धर्म और व्यवसाय के आधार पर वर्गीकृत किया। यह कदम आंशिक रूप से भारत की जटिल सामाजिक संरचना को समझने और उस पर शासन करने की औपनिवेशिक आवश्यकता से प्रेरित था।
स्वतंत्रता के बाद का बदलाव (1951): 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, 1951 में आजाद भारत की पहली जनगणना ने एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को छोड़कर जाति गणना को बंद करने का फैसला किया। यह निर्णय इस विश्वास पर आधारित था कि जाति पर ध्यान केंद्रित करने से विभाजन को बढ़ावा मिल सकता है और एक नए स्वतंत्र राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
जाति जनगणना।
1961 का निर्देश: एक दशक बाद, 1961 में, केंद्र सरकार ने राज्यों को अन्य पिछड़ा वर्ग की राज्य-विशिष्ट सूचियां तैयार करने के लिए अपने स्तर से सर्वेक्षण कराने की अनुमति दी। यह कदम एससी और एसटी से परे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समूहों के लिए कल्याणकारी कदमों की मांग के जवाब में था। हालांकि, कोई राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना नहीं की गई थी।
सवाल नंबर 3). जाति जनगणना कैसे एक राजनीतिक मुद्दा बन गई?
मंडल आयोग (1980): केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने की मंडल आयोग की सिफारिश ने जाति को फिर से राजनीतिक चर्चा में ला दिया। जाति संबंधी व्यापक आंकड़ों की कमी ने ओबीसी आबादी की सही पहचान और मात्रा निर्धारित करना चुनौतीपूर्ण बना दिया, जिससे जाति जनगणना की मांग बढ़ गई।
सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) 2011: वर्ष 2011 में, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना करवाई, जो 1931 के बाद से देश भर में जाति के आंकड़े एकत्र करने का पहला प्रयास था। हालांकि, एसईसीसी 2011 के आंकड़ों को कभी भी पूरी तरह से जारी या उपयोग नहीं किया गया, जिसके कारण विपक्षी दलों और जाति-आधारित संगठनों ने इसकी आलोचना की।
2011 की जाति गणना से जुड़ी अहम जानकारी: वर्ष 2011 की जातीय जनगणना के आंकड़ों को वैसे तो सार्वजनिक नहीं किये गए, लेकिन इससे जुड़े कई हैरान कर देने वाली जानकारियां सामने आईं। जिसमें से एक ये भी थी कि साल 1931 की जनगणना में देश में कुल 4 हजार 147 जातियां थी, लेकिन 2011 की जनगणना में जातियों की संख्या 46.80 लाख से अधिक पहुंच गई। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र से जुड़े कुछ आंकड़े भी पेश किए थे, जिसके अनुसार वर्ष 2011 में महाराष्ट्र की 10.3 करोड़ की जनसंख्या में 4.28 लाख जातियां दर्ज की गईं।
राज्य स्तरीय पहल: राष्ट्रीय जातिगत जनगणना के अभाव में, बिहार, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों ने हाल के वर्षों में अपने-अपने यहां जाति सर्वेक्षण कराए हैं। इन सर्वेक्षणों का उद्देश्य राज्य-विशिष्ट आरक्षण नीतियों और कल्याण कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिए आंकड़े एकत्र करना था। 2023 में बिहार के जाति सर्वेक्षण से पता चला कि ओबीसी और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) राज्य की आबादी का 63 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं।
सवाल नंबर 4). जाति जनगणना क्यों मायने रखती है?
जाति जनगणना एक जनसांख्यिकीय कवायद से कहीं अधिक है; यह गहरे सामाजिक निहितार्थों वाला राजनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कार्यकर्ताओं ने कहा है कि जनगणना में जाति को शामिल करने से आरक्षण नीतियों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय पहल पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। यह चुनावी रणनीतियों को भी नया रूप दे सकता है, क्योंकि पार्टियां विभिन्न जाति समूहों से समर्थन पाने की होड़ में लगी रहती हैं।
जाति जनगणना।
‘पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ की कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्तरेजा ने कहा, ‘‘भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पोषण और सामाजिक सुरक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं तक पहुंच जाति, क्षेत्र, धर्म और आर्थिक स्थिति की संरचनात्मक असमानताओं से प्रभावित होती है। इन असमानताओं को उजागर करने और ऐसी नीतियों और कार्यक्रमों को तैयार करने के लिए जाति जनगणना महत्वपूर्ण है जो वास्तव में समतामूलक और समावेशी हों।’’
सटीक जातिगत आंकड़े मौजूदा सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करने के लिए शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण जैसी विभिन्न नीतियों को तैयार करने में मदद कर सकता है। कई लोग हाशिए पर पड़े समुदायों की पहचान करने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए जाति जनगणना को जरूरी मानते हैं, लेकिन लोग यह भी चेतावनी देते हैं कि इससे जातिगत पहचान मजबूत हो सकती है और विभाजन गहरा सकता है।
सवाल नंबर 5). आगे क्या होने वाला है?
यह घोषणा व्यापक जातिगत गणना के 70 से अधिक वर्षों के प्रतिरोध के बाद एक प्रमुख नीतिगत मोड़ है, लेकिन आंकड़ों को कैसे एकत्रित, वर्गीकृत और इस्तेमाल किया जाएगा, यह देखना अभी बाकी है। आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़ों को शामिल करने से शासन, चुनावी राजनीति और असमानता से निपटने के प्रयास पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है। लेकिन अभी यह तय नहीं हुआ है कि यह प्रक्रिया कब शुरू की जाएगी।
