Delhi Police Barricading Powers: लोकतंत्र में सवाल पूछना, शांतिपूर्वक विरोध-प्रदर्शन करना जनता का अधिकार है... मगर जब प्रशासन कानून-व्यवस्था का हवाला देकर रास्ते रोक दे और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले ले, तो सवाल उठता है कि आखिर विरोध की आवाज कहां तक जा सकती है और उसे रोकने का अधिकार किसके पास है?
बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने ऐलान किया था कि शनिवार को जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन किया जाएगा। हालांकि, शनिवार सुबह अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास को दिल्ली के IGI एयरपोर्ट पर विमान के भीतर ही हिरासत में ले लिया गया।
जंतर-मंतर और सीपी से सटे इलाकों में बीएनएस की धारा 163 लागू है।
वहीं, कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिल्ली में 20,000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों और अतिरिक्त बलों को तैनात किया गया है। इसके अलावा, नई दिल्ली इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू की गई है, जिसके तहत भीड़ इकट्ठा होने और प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सुरक्षा कारणों से दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशनों पर आवाजाही और प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है। नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर आने-जाने वाली करीब 75 ट्रेनें रद्द की गई हैं।
पुलिस अपनी मर्जी से बंद कर सकती है सड़कें?
सवाल है कि क्या पुलिस अपनी मर्जी से किसी भी सड़क को बंद कर सकती है? क्या बैरिकेड लगाकर लोगों की आवाजाही रोकने का उसे अधिकार है? और अगर प्रदर्शन शांतिपूर्ण हो, तब भी क्या प्रशासन लोगों को रोक सकता है? इन सवालों का जवाब दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों में मिलता है। आइए समझते हैं कि कानून पुलिस को कितनी शक्तियां देता है और उसकी सीमाएं क्या हैं।
विरोध प्रदर्शन को देखते हुए जंतर-मंतर पर सुरक्षा बलों की भारी तैनाती है।
दिल्ली पुलिस अधिनियम 1 जुलाई, 1978 को लागू हुआ था। इसके तहत दिल्ली में एक अलग पुलिस बल बनाया गया। इस पुलिस बल की कमान पुलिस आयुक्त के पास होती है, जिनकी नियुक्ति उपराज्यपाल करते हैं। उपराज्यपाल वह अधिकारी हैं, जिनके जरिए राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 239 के तहत केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासन चलाते हैं।
दिल्ली पुलिस से जुड़े ज्यादातर अधिकार पुलिस आयुक्त के पास होते हैं। हालांकि, आयुक्त के आदेश पर पुलिस उपायुक्त (DCP), अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त और सहायक पुलिस आयुक्त भी इन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस कानून में सड़क का मतलब सिर्फ मुख्य सड़क नहीं है। इसमें हाईवे, पुल, गलियां, फुटपाथ, चौक और आम लोगों के आने-जाने के लिए खुले दूसरे रास्ते भी शामिल हैं।
सीजेपी प्रदर्शन के मद्देनजर जंतर-मंतर मार्ग पर पुलिस बल की तैनाती।
पुलिस सड़क कब बंद कर सकती है?
दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 36(1) के तहत पुलिस आयुक्त किसी सड़क या सार्वजनिक जगह को कुछ समय के लिए बंद कर सकते हैं या वहां लोगों के आने-जाने पर रोक लगा सकते हैं। इसके लिए सार्वजनिक सूचना जारी करना जरूरी है। हालांकि, यह अधिकार कुछ शर्तों के साथ मिलता है। सड़क या सार्वजनिक जगह को स्थायी रूप से बंद नहीं किया जा सकता। यह कदम अस्थायी होना चाहिए, इसका मकसद जनहित में होना चाहिए और इसकी जानकारी सार्वजनिक सूचना के जरिए लोगों को देनी चाहिए।
वहीं, धारा 28 के तहत ट्रैफिक को नियंत्रित करने और कुछ परिस्थितियों में सड़कों को अस्थायी रूप से बंद करने से जुड़े नियम बनाए जा सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस बिना किसी कानूनी आधार के कहीं भी और किसी भी अवधि के लिए सड़क बंद कर सकती है। उसे संबंधित प्रावधानों और उन पर लागू शर्तों का पालन करना होता है। सनद रहे कि सड़क बंद करने का फैसला केवल पुलिस की इच्छा पर नहीं, बल्कि कानून में तय शर्तों के आधार पर होना चाहिए।
सीजेपी के विरोध प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा बढ़ाई गई।
बैरिकेड लगाकर वाहनों को रोकने का अधिकार कितना है?
अधिनियम की धारा 36(2) पुलिस आयुक्त को जरूरत पड़ने पर सड़क पर बैरियर लगाने के लिए पुलिस अधिकारियों को अधिकृत करने की शक्ति देती है। इसका उद्देश्य वाहनों को अस्थायी रूप से रोककर यह जांच करना है कि वाहन, उसका चालक या उसे नियंत्रित करने वाला व्यक्ति किसी कानून का उल्लंघन तो नहीं कर रहा है। इसलिए बैरिकेडिंग का इस्तेमाल केवल रास्ता रोकने के लिए ही नहीं, बल्कि कानून के तहत निर्धारित जांच और नियंत्रण के उद्देश्य से भी किया जा सकता है।
लेकिन इस प्रावधान को पुलिस को हर व्यक्ति की आवाजाही अनिश्चितकाल तक रोकने का असीमित अधिकार नहीं समझना चाहिए। बैरियर लगाने और उसके इस्तेमाल के लिए कानून में निर्धारित अधिकार और उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं।
ट्रैफिक डायवर्ट करने और सड़क बंद करने के नियम क्या हैं?
दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 28 पुलिस आयुक्त को राजपत्र में अधिसूचना जारी करके ट्रैफिक से जुड़े नियम बनाने की शक्ति देती है। इन नियमों का उद्देश्य सड़कों पर खतरे, रुकावट या आम लोगों को होने वाली असुविधा को रोकना हो सकता है। इनके तहत पैदल चलने, साइकिल चलाने, गाड़ियां चलाने और सड़क पर गाड़ियों की पार्किंग से संबंधित व्यवस्था की जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में सड़कों या सार्वजनिक स्थानों को अस्थायी रूप से बंद करने के नियम भी बनाए जा सकते हैं।
