Delhi Protest Against CEC: देशभर की निगाहें आज राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पर टिकी हैं। दिल्ली का दिल कहे जाने वाला कनॉट प्लेस छावनी में तब्दील हो चुका है। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली आने वाली 250 ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं और 45 मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया है। शुक्रवार देर रात से ही रेल और सड़क मार्ग से दिल्ली में प्रवेश को नियंत्रित कर दिया गया है। प्रदर्शनकारियों की संभावित संख्या के मुकाबले कहीं अधिक सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है।
CEC के खिलाफ प्रदर्शन पर रोक लगा सकती है सरकार? जानें क्या कहता है संविधान। PTI
कनॉट प्लेस और आसपास के इलाकों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रदर्शनों को देखते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्व में CrPC की धारा 144) लागू है।
वहीं, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए अडिग है। इसी बीच भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों का मुद्दा फिर चर्चा में है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि प्रशासन किसी प्रदर्शन पर रोक लगा सकता है या नहीं, बल्कि यह भी है कि किन परिस्थितियों में रोक लगाई जा सकती है, सरकार की शक्तियों की सीमा क्या है और नागरिकों के विरोध करने के अधिकार की रक्षा कैसे होती है?
कॉकरोच जनता पार्टी शनिवार को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने जा रहे हैं।
भारतीय लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार की नीतियों का विरोध करने, अपनी मांगें उठाने और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है।
सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और हिंसा की आशंका जैसी परिस्थितियों में प्रशासन कुछ प्रतिबंध लगा सकता है। हालांकि, किसी प्रदर्शन को रोकने के लिए केवल प्रशासनिक आदेश जारी कर देना ही पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे कानूनी आधार, परिस्थितियों के अनुरूप आवश्यकता और प्रतिबंधों की उचित सीमा भी महत्वपूर्ण हैं।
इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बंदी और प्रतिबंधों से जुड़े मामले में अहम टिप्पणियां की थीं। इससे पहले और बाद में देश के अलग-अलग हिस्सों में नागरिकता कानून, किसान आंदोलन, अनुच्छेद 370 और दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों समेत कई मुद्दों पर प्रशासनिक पाबंदियां लगाई गईं। इन घटनाओं से समझा जा सकता है कि विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच कानून किस तरह संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है या नहीं?
भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का अधिकार देता है। इसके लिए दो अनुच्छेद सबसे महत्वपूर्ण हैं।
अनुच्छेद 19(1)(a): यह नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। इसके तहत सरकार की आलोचना करना, नीतियों पर सवाल उठाना और अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से रखना संरक्षित अभिव्यक्ति के दायरे में आ सकता है।
अनुच्छेद 19(1)(b): यह नागरिकों को बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार देता है। यही अधिकार शांतिपूर्ण धरने, रैली और सार्वजनिक सभा का संवैधानिक आधार है।
हालांकि, इन अधिकारों पर संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इनमें सार्वजनिक व्यवस्था और भारत की संप्रभुता एवं अखंडता जैसे हित शामिल हैं। इसलिए किसी प्रदर्शन का शांतिपूर्ण होना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके आयोजन की जगह, यातायात, सुरक्षा और अन्य लोगों के अधिकार भी मायने रखते हैं।
धारा 163 क्या है और सरकार इसके तहत प्रदर्शन कैसे रोकती है?
पहले इस तरह के प्रतिबंधों के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 का इस्तेमाल किया जाता था। 1 जुलाई 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू होने के बाद इसके समकक्ष प्रावधान के रूप में धारा 163 लागू हुई।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत जिला मजिस्ट्रेट, उपमंडल मजिस्ट्रेट या अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट तत्काल उपद्रव या संभावित खतरे की स्थिति में लिखित आदेश जारी कर सकते हैं। इसका उद्देश्य किसी संभावित खतरे को रोकना या उससे निपटने के लिए तत्काल कदम उठाना है।
इसके तहत परिस्थितियों के अनुसार लोगों की सभा, आवाजाही या कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर प्रशासन को ठोस आधार पर आशंका है कि किसी इलाके में भीड़ जुटने से हिंसा, दंगा या सार्वजनिक शांति भंग होने का खतरा है, तो वह उस इलाके में जमावड़े पर रोक लगाने का आदेश दे सकता है।
हालांकि, धारा 163 लागू होने का अर्थ यह नहीं है कि अपने आप पूरे शहर में हर तरह का विरोध-प्रदर्शन गैरकानूनी हो जाता है। प्रतिबंध का वास्तविक दायरा संबंधित आदेश में लिखी शर्तों, इलाके, अवधि और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
इसी तरह, धारा 163 और प्रदर्शन के लिए पुलिस की अनुमति दो अलग-अलग कानूनी पहलू हैं। किसी प्रदर्शन के लिए अनुमति न मिलना और किसी इलाके में निषेधाज्ञा लागू होना एक ही बात नहीं है। दोनों का कानूनी आधार और प्रभाव अलग हो सकता है।
जंतर-मंतर पर मौजूद प्रदर्शनकारियों की फोटो।
क्या प्रशासन केवल आशंका के आधार पर प्रदर्शन रोक सकता है?
इसका जवाब है—हां, कानून के तहत प्रशासन को संभावित खतरे को रोकने के लिए पहले से कदम उठाने की शक्ति है। उसे हर बार हिंसा होने का इंतजार करना जरूरी नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि किसी अस्पष्ट आशंका या महज असहमति के आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
यही अंतर सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट किया था। अदालत ने तत्कालीन CrPC की धारा 144 के संदर्भ में कहा कि इस शक्ति का इस्तेमाल वैध अभिव्यक्ति, शिकायत या लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य होने चाहिए, जिनके आधार पर उसकी आवश्यकता और वैधता की न्यायिक समीक्षा की जा सके। प्रतिबंध लागू करते समय प्रशासन को यह देखना चाहिए कि कार्रवाई वास्तविक खतरे के अनुपात में है या नहीं और क्या कम कठोर उपाय अपनाकर भी उद्देश्य हासिल किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार ऐसे आदेश जारी करने को भी शक्ति का दुरुपयोग बताया, जब उनका इस्तेमाल कानून की निर्धारित सीमाओं को दरकिनार करने के लिए किया जाए।
अनुराधा भसीन केस: कश्मीर में इंटरनेट बंदी पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
यह मामला विरोध-प्रदर्शन पर सरकारी प्रतिबंधों की चर्चा में इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की आजादी, इंटरनेट बंदी और धारा 144 के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से विचार किया था। अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किए जाने से पहले और उसके बाद संचार सेवाओं तथा आवाजाही पर कई प्रतिबंध लगाए गए। इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गई थीं। कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने पत्रकारों के कामकाज और प्रेस की स्वतंत्रता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
10 जनवरी 2020 को दिए गए फैसले में अदालत ने इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार-पेशा करने की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण के दायरे में माना। उसने इंटरनेट बंदी के आदेशों को सार्वजनिक करने, उनकी न्यायिक समीक्षा की अनुमति देने और प्रतिबंधों को आवश्यक अवधि तक सीमित रखने पर जोर दिया।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में यह नहीं कहा कि सरकार कभी इंटरनेट बंद नहीं कर सकती या धारा 144 का इस्तेमाल नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि ऐसी शक्तियों का प्रयोग कानून के अनुसार, उचित आधार पर और आवश्यक सीमा तक ही होना चाहिए।
सरकार और प्रशासन के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने, संभावित हिंसा रोकने और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की शक्ति है। इसके तहत कुछ परिस्थितियों में प्रदर्शन की अनुमति खारिज की जा सकती है, सभाओं पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है और आवाजाही नियंत्रित की जा सकती है, लेकिन लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध भी संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता कि वैध असहमति या लोकतांत्रिक शिकायतों को ही दबा दिया जाए।
