बंगाल में 2016 से 2026 तक नाटकीय बदलावों का दशक, कितनी बदली सियासी तस्वीर?

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य 2016 के विधानसभा चुनावों से लेकर 2021 और 2026 के चुनावों तक काफी बदल गया है। एक दशक में सियासत में क्या-क्या उतरा चढ़ाव आए, ममता बनर्जी कैसे मजबूत होती चली गईं और बीजेपी ने कैसे अपने पैर जमाए, ये सभी कुछ जानने की कोशिश करते हैं।

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में विधानसभ चुनाव तारीखों का ऐलान कर दिया है। इसी के साथ राज्य में सियासी सरगर्मी भी जोर पकड़ने लगी है। सबकी निगाहें इस ओर लगी हैं कि इस बार बादी किसके हाथ लगती है। पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य 2016 के विधानसभा चुनावों से लेकर 2021 और 2026 के चुनावों तक काफी बदल गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रभुत्व वाली राज्य की 294 सीटों वाली विधानसभा में क्षेत्रीय समीकरणों, जनसांख्यिकी और मतदाता सूची में हुए बदलावों के कारण लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन की कमजोरी, भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता और टीएमसी की मजबूत स्थिति के बीच उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। साल 2016 से 202 के बीच क्या-क्या उतरा चढ़ाव आए, ममता बनर्जी कैसे मजबूत होती चली गईं और बीजेपी ने कैसे अपने पैर जमाए, ये सभी कुछ जानने की कोशिश करते हैं।

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एक दशक में कितनी बदली बंगाल की सियासी तस्वीर

2016: लेफ्ट-कांग्रेस की चुनौती के बीच टीएमसी की मजबूत पकड़

2016 में टीएमसी ने 2011 की वाम-विरोधी लहर को आगे बढ़ाते हुए 211 सीटों के साथ भारी बहुमत हासिल किया। वाम मोर्चा-कांग्रेस गठबंधन को केवल 32 सीटें मिलीं (गठबंधन के हिसाब से सीपीएम को 26 और कांग्रेस को 0)। इनमें कोलकाता, मुर्शिदाबाद और घाटाल जैसे औद्योगिक क्षेत्रों की कुछ सीटें शामिल थीं। भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ 3 सीटें मिलीं, जो मुख्य रूप से दार्जिलिंग और शहरी बाहरी इलाकों में थीं, जो इसकी शुरुआती मौजूदगी का संकेत देती हैं। टीएमसी ने दक्षिण बंगाल (दक्षिण 24 परगना में 31/31 सीटें) और शहरी कोलकाता (11 सीटों में से अधिकांश) में शानदार जीत हासिल की, जबकि मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों और ग्रामीण हुगली में वामपंथी दलों की पकड़ मजबूत बनी रही। मुख्य बदलाव यह रहा कि 2011 के परिसीमन के बाद 23 जिलों में 294 निर्वाचन क्षेत्रों की स्थिति स्थिर हो गई, जिससे टीएमसी के ग्रामीण आधार को मजबूती मिली।

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