17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र दामोदरदास मोदी आज जीवन के 76वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। एक साधारण परिवार में चाय बेचने से लेकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने तक, नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सफर किसी चमत्कारिक पटकथा से कम नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक से लेकर भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार तक पहुंचाने वाले इस सफर में कई ऐसे ऐतिहासिक और रणनीतिक मोड़ आए, जिन्होंने न सिर्फ मोदी के व्यक्तित्व को गढ़ा, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा भी बदल दी। जानिए नरेंद्र मोदी के सियासी सफर के वे 10 सबसे बड़े टर्निंग पॉइंट्स जिसने उन्हें देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उठाने का हौसला दिया।
पीएम मोदी का 25 साल का सियासी सफर
1. वडनगर से RSS का सफर: अनुशासन और विचार की नींव
गुजरात के मेहसाणा जिले के वडनगर में साधारण पृष्ठभूमि में पले-बढ़े नरेंद्र मोदी कम उम्र में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संपर्क में आए। 1971 के भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान संघ की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के बाद वह RSS के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। संघ के भीतर जमीनी स्तर पर संगठन निर्माण, अनुशासन और राष्ट्रवादी विचारधारा की जो ट्रेनिंग उन्हें मिली, उसने उनके भविष्य के राजनीतिक जीवन की आधारशिला रखी।
2. आपातकाल (1975-77): 'अंडरग्राउंड' संगठनात्मक रणनीति
1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (Emergency) लागू किया, तब नरेंद्र मोदी को संगठन क्षमता साबित करने का पहला बड़ा मौका मिला। सरकार की गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने साधु और सिख के भेष बदलकर अंडरग्राउंड रहकर काम किया। उन्होंने सरकार विरोधी पैम्फलेट्स की छपाई, दिल्ली तक संदेश पहुंचाने और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए 'सेफ हाउस' नेटवर्क बनाने की कमान संभाली। इस दौर ने उन्हें संकट प्रबंधन और खुफिया नेटवर्क की बारीकियां सिखाईं।
3. RSS से BJP में एंट्री और 'अडवाणी की रथ यात्रा' (1987-1990)
1987 में संघ के निर्देश पर नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी में भेज गया, जहां उन्हें गुजरात भाजपा का संगठन सचिव बनाया गया। 1990 में जब लालकृष्ण अडवाणी ने राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक ऐतिहासिक 'राम रथ यात्रा' की शुरुआत की, तो गुजरात में इसके आयोजन और समन्वय की पूरी जिम्मेदारी नरेंद्र मोदी के कंधों पर थी। इस यात्रा की जबरदस्त सफलता ने मोदी को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की नजरों में एक मास्टर रणनीतिकार के रूप में स्थापित कर दिया।
4. दिल्ली बुलावा: राष्ट्रीय संगठन महामंत्री की भूमिका (1995-1998)
1995 में गुजरात में भाजपा को पहली बार पूर्ण बहुमत दिलाने में मोदी की अहम भूमिका रही। हालांकि, राज्य के अंदरूनी राजनीतिक मतभेदों के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें दिल्ली बुला लिया। 1998 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बनाया गया। इस दौरान उन्होंने पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे उत्तरी राज्यों में पार्टी के संगठन को मजबूत करने का काम किया। इस राष्ट्रीय अनुभव ने उन्हें पूरे देश के राजनीतिक ताने-बाने को करीब से समझने का मौका दिया।
5. 2001: गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहली कमान
अक्टूबर 2001 में, जब गुजरात भुज भूकंप की त्रासदी और प्रशासनिक चुनौतियों से जूझ रहा था, तब भाजपा नेतृत्व ने केशुभाई पटेल की जगह 51 वर्षीय नरेंद्र मोदी को पहली बार राज्य की कमान सौंपी। हैरान करने वाली बात यह थी कि मुख्यमंत्री बनने से पहले तक उन्होंने एक भी प्रत्यक्ष चुनाव (विधानसभा या लोकसभा) नहीं लड़ा था। उन्होंने राजकोट-II सीट से उपचुनाव जीतकर विधानसभा में कदम रखा और एक सख्त व नतीजे देने वाले प्रशासक की अपनी छवि बनानी शुरू की।
6. 2002 का संकट और 'गुजरात मॉडल' का उदय
फरवरी 2002 में गोधरा कांड और उसके बाद भड़के सांप्रदायिक दंगों ने मोदी के राजनीतिक करियर को सबसे बड़े संकट में डाल दिया। भारी राजनीतिक दबाव और विपक्ष के हमलों के बावजूद, मोदी ने दिसंबर 2002 के गुजरात विधानसभा चुनावों में पार्टी को प्रचंड बहुमत दिलाया। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक छवि को 'विकास पुरुष' के रूप में नया आकार दिया। 'वाइब्रेंट गुजरात' सम्मेलन, उद्योगों को न्योता, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास और बिजली-पानी की व्यवस्था में सुधार ने 'गुजरात मॉडल' को जन्म दिया, जिसने पूरे देश में उनका ध्यान खींचा।
7. 2012 की हैट्रिक और '2014 के पीएम उम्मीदवार' की राह
दिसंबर 2012 में नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की। इस जीत ने यह साफ कर दिया कि वह अब केवल एक प्रांतीय नेता नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में उतरने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। जून 2013 में गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उन्हें भाजपा की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया और सितंबर 2013 में उन्हें औपचारिक रूप से एनडीए (NDA) का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया।
8. 2014 चुनाव: 'अबकी बार मोदी सरकार' और ऐतिहासिक बहुमत
2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति का वाटरशेड मोमेंट साबित हुआ। नरेंद्र मोदी के आक्रामक प्रचार, 'अच्छे दिन आने वाले हैं' के नारे और कॉर्पोरेट-शैली की हाइटेक चुनावी तकनीक जैसे 3D रैलियों ने देश के मूड को बदल दिया। 30 साल बाद किसी एक पार्टी को 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत मिला। 26 मई 2014 को पहली बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेकर मोदी ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों पर दशकों से काबिज लुटियंस पावर-सर्कल को तोड़ दिया।
9. 2019 का चुनाव: सर्जिकल स्ट्राइक, राष्ट्रवाद और 303 का आंकड़ा
अपने पहले कार्यकाल में नोटबंदी और GST जैसे बड़े आर्थिक फैसलों के बाद, 2019 के चुनावों से ठीक पहले पुलवामा हमले और उसके जवाब में हुई बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक ने राष्ट्रवाद को केंद्र में ला दिया। 'मैं भी चौकीदार' अभियान और मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा के वादे पर मोदी ने 2019 में भाजपा को 303 सीटें दिलाकर और भी विशाल बहुमत हासिल किया। इस कार्यकाल में धारा 370 का निष्प्रभावी होना, राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ होना और तीन तलाक कानून जैसी वैचारिक उपलब्धियां शामिल रहीं।
10. 2024: लगातार तीसरे कार्यकाल का ऐतिहासिक रिकॉर्ड
2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा अपने बल पर स्पष्ट बहुमत के आंकड़े से चूक गई, लेकिन गठबंधन सहयोगियों (NDA) के साथ मिलकर नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार 3 बार प्रधानमंत्री बनने वाले वह भारत के दूसरे नेता बने। एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व करते हुए भी उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की धाक और घरेलू स्तर पर विकास प्राथमिकताओं को बनाए रखा है।
76 साल की उम्र में भी एनर्जी बरकरार
वडनगर के रेलवे स्टेशन से शुरू हुआ यह सफर आज 76 साल की उम्र में भी उसी गति से जारी है। संगठन कार्यकर्ता से लेकर दुनिया के सबसे लोकप्रिय वैश्विक नेताओं में शुमार होने तक, नरेंद्र मोदी की यह 10 निर्णायक कड़ियाँ भारतीय राजनीति के आधुनिक इतिहास का सबसे अहम अध्याय हैं। आज भी पीएम मोदी का ये सफर जारी है और वह पूरी शक्ति के साथ देश का नेतृत्व कर रहे हैं।
