Jagdishpur Assembly Election 2025: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी बाबू कुंवर सिंह की वीरभूमि जगदीशपुर का राजनीतिक और सामाजिक समीकरण हमेशा से ही खास माना जाता रहा है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में राजद (RJD) ने यहां लगातार जीत दर्ज कर हैट्रिक बनाई है। अब पार्टी इस सफलता को जारी रखते हुए चौथी जीत हासिल करने की पूरी तैयारी में जुट गई है। वहीं, एनडीए की ओर से जदयू (JDU) राजद के इस विजयी सिलसिले को रोकने के लिए हर रणनीति साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल कर रही है। चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दो बार जगदीशपुर का दौरा कर चुके हैं। उन्होंने यहां की जनता के लिए कई विकास परियोजनाओं की घोषणा करते हुए सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से कई करोड़ रुपये की सौगातें दी हैं। यहां पर 6 नवंबर को वोटिंग होगी साथ ही मतगणना 14 नवंबर को होगी।
जगदीशपुर विधानसभा चुनाव 2025
जन सुराज पार्टी की मौजूदगी
इस बार भी महागठबंधन के तहत जगदीशपुर विधानसभा सीट राजद (RJD) के खाते में गई है, जबकि एनडीए की ओर से यह सीट फिलहाल जदयू (JDU) के पास है। इस चुनाव में जन सुराज भी क्षेत्र में अपनी मजबूत और सक्रिय मौजूदगी दर्ज करा रहा है। गौरतलब है कि भोजपुर जिले का जगदीशपुर विधानसभा क्षेत्र जिले के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से के कई गांवों तथा नगर निकाय क्षेत्रों को समेटे हुए है। नए परिसीमन के तहत यह विधानसभा क्षेत्र जगदीशपुर प्रखंड, नगर क्षेत्र, और पीरो प्रखंड की 16 पंचायतों को मिलाकर गठित किया गया है।
कुशवंशी और यदुवंशी समुदायों का मुकाबला
जगदीशपुर की राजनीति में हमेशा से ही कुशवंशी और यदुवंशी समुदायों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलता रहा है, जबकि रघुवंशी समाज अक्सर यहां की चुनावी दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है। इसके साथ ही, कई बार सवर्ण मतदाता भी जीत-हार का संतुलन बदलने में अहम साबित हुए हैं। कुछ अवसरों पर वे विजयी उम्मीदवार तय करने में भी सफल रहे हैं। इतिहास पर नजर डालें तो कांग्रेस शासनकाल और जनता पार्टी की लहर के दौर में इस क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत दर्ज की थी। वर्ष 1985 में लोकदल के टिकट पर पूर्व मंत्री हरिनारायण सिंह ने यहां से विजय हासिल की थी।
1990 से 2000 तक का चुनावी हाल
वर्ष 1990 में आईपीएफ (अब भाकपा माले) ने पहली बार जगदीशपुर विधानसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारा, जहां भगवान कुशवाहा ने शानदार जीत दर्ज करते हुए राजनीतिक मंच पर अपनी पहचान बनाई। इसके बाद क्षेत्र की राजनीति में जातीय समीकरण और अधिक प्रभावी होते गए। 1995 के चुनाव में जनता दल की लहर के दौरान हरिनारायण सिंह ने जीत हासिल की। इस बीच भगवान कुशवाहा ने माले से नाता तोड़कर नीतीश कुमार का साथ अपना लिया, और वर्ष 2000 के चुनाव में समता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में एक बार फिर विजयी बने।
आरजेडी की मजबूत जड़ें
बीजेपी और जेडीयू के गठबंधन बनने के बाद श्रीभगवान सिंह कुशवाहा ने अपनी जीत का क्रम जारी रखा और वर्ष 2005 में हुए दोनों विधानसभा चुनावों में विजय हासिल की। एनडीए सरकार ने लव-कुश समीकरण को संतुलित रखते हुए उन्हें मंत्री पद से भी नवाजा। हालांकि, वर्ष 2008 में नए परिसीमन के लागू होने के बाद से आरजेडी ने इस क्षेत्र में अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। 2010 के चुनावों के बाद से पार्टी ने जातीय समीकरण का प्रभावी उपयोग करते हुए लगातार तीन बार जीत दर्ज की है। इस दौरान रामविशुन सिंह लोहिया को आरजेडी ने दो बार उम्मीदवार बनाया, और उन्होंने दोनों ही अवसरों पर सफलता प्राप्त की।
रोचक और बहुस्तरीय मुकाबले की आशंका
वर्ष 2015 के चुनाव में जब जेडीयू ने महागठबंधन का हिस्सा बनकर राजद (RJD) का साथ दिया, तो पार्टी की स्थिति और मजबूत हुई। इसके बाद 2020 में भाकपा माले के साथ गठबंधन ने आरजेडी को अतिरिक्त बढ़त दिलाई। हालांकि, माले का इस क्षेत्र में पहले से ही एक ठोस जनाधार रहा है। इस बार आरजेडी ने रामविशुन सिंह लोहिया के पुत्र कुणाल किशोर को उम्मीदवार बनाया है, जो अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर, एनडीए की ओर से जेडीयू प्रत्याशी भगवान सिंह कुशवाहा मैदान में हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कुणाल किशोर अपने पिता की जीत की परंपरा को कायम रख पाते हैं, या फिर भगवान सिंह कुशवाहा उन्हें कड़ी टक्कर देकर बढ़त हासिल करते हैं। इस बार जगदीशपुर विधानसभा में एक बेहद रोचक और बहुस्तरीय मुकाबला देखने को मिलने वाला है।
