अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करना एक समय भारतीय छात्रों का सपना होता था। विदेश में पढ़ने का सपना देखने वाले छात्रों के लिए हमेशा से ही अमेरिका पहली पसंद रहा लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका से शिक्षा करने के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में एक मार्च तक 10 प्रतिशत की कमी आई है, जो अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। 2025-26 में अंतरराष्ट्रीय छात्र पंजीकरण का अनुमान 11.69 लाख था, जो घटकर 10.57 लाख रह गया है। अमेरिकी सरकार द्वारा उठाए गए कड़े कदमों को इस गिरावट का मुख्य कारण माना जा रहा है।
अमेरिका से क्यों हो रहा भारतीय छात्रों का मोहभंग
अमेरिका के नए और कड़े आव्रजन (इमिग्रेशन) नियमों के कारण शैक्षणिक वर्ष 2025-26 में अमेरिकी कालेजों में दाखिला लेने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में 15 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। 'नेशनल एसोसिएशन आफ फारेन स्टूडेंट एडवाइजर्स' और शोध फर्म 'जेबी इंटरनेशनल' की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के पंजीकरण में 1.1 लाख तक की कमी आने की आशंका है।
क्या कहती है रिपोर्ट
'कामन एप' द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 1,100 से अधिक अमेरिकी संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस मंच पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में एक मार्च तक 10 प्रतिशत की कमी आई है, जो अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है।
क्या है वजह
जुलाई महीने में अमेरिकी प्रशासन ने पारंपरिक 'ड्यूरेशन आफ स्टेटस' नियम को समाप्त कर दिया था। इसके तहत अब छात्रों के रहने की अवधि को अधिकतम चार साल तक सीमित कर दिया गया है। वहीं, ग्रेजुएशन के बाद अमेरिका में काम करने की अनुमति देने वाले 'आप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग' (ओपीटी) के तहत विदेशी छात्रों पर एक लाख डालर तक का भारी शुल्क लगाने पर भी विचार किया जा रहा है। यदि वीजा नीतियां और ओपीटी से जुड़े नियम ऐसे ही अनिश्चित और कड़े रहे, तो अमेरिका तकनीक और उच्च शिक्षा के वैश्विक केंद्र के रूप में अपनी साख खो सकता है।
अर्थव्यवस्था पर असर
इस पूरे मामले का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। 2025-26 में अंतरराष्ट्रीय छात्रों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था में 41.77 अरब डालर का योगदान दिया था, जो 2026-27 में घटकर 38.37 अरब डालर रहने का अनुमान है।
