दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) ने मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि बकरीद (28 मई) को होने वाली लॉ फैकल्टी की परीक्षा उन मुस्लिम छात्रों या किसी भी अन्य छात्र (चाहे उनका धार्मिक विश्वास कुछ भी हो) के लिए रुकावट नहीं बनेगी जो यह त्योहार मनाना चाहते हैं; ऐसे छात्रों के लिए किसी दूसरे दिन एक विशेष परीक्षा आयोजित की जाएगी। ऐसे छात्र ईमेल के जरिए लॉ फैकल्टी के डीन को सूचित कर सकते हैं, और 28 मई के बजाय 4 जुलाई के बाद किसी तारीख को उनके लिए परीक्षा आयोजित की जाएगी।
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DU के वकील ने जस्टिस जसमीत सिंह के सामने यह बयान दिया। जस्टिस जसमीत सिंह एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें कहा गया था कि भले ही केंद्र सरकार, DU, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने बकरीद के कारण 28 मई को छुट्टी घोषित की है, फिर भी लॉ फैकल्टी ने उस दिन परीक्षा रखी है।
कोर्ट ने DU के वकील के बयान को रिकॉर्ड किया और कहा कि जिन छात्रों ने छूट मांगी है, उन्हें पुनर्निर्धारित परीक्षाओं के बारे में कम से कम एक हफ्ता पहले सूचित किया जाएगा। इसके बाद कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
किस याचिका पर हो रही थी सुनवाई ?
हाई कोर्ट लॉ फैकल्टी के छठे सेमेस्टर के छात्र सैफ रशीद सईद द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उसने कहा कि लॉ फैकल्टी ने 25 मई को एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि वह 28 मई को होने वाली परीक्षा को जारी रखेगी, भले ही केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर ईद-उल-ज़ुहा (बकरीद) की छुट्टी 27 मई से बदलकर 28 मई कर दी हो। सईद ने 28 मई को होने वाली छठे सेमेस्टर की 'पब्लिक पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन' परीक्षा को स्थगित करने की मांग की थी।
अपनी याचिका में उसने तर्क दिया कि यूनिवर्सिटी का ऑफिस मेमोरेंडम "मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक" था। उसने दलील दी कि बकरीद के दिन परीक्षा आयोजित करने से मुस्लिम छात्रों को परीक्षा में शामिल होने और अपने परिवारों के साथ महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
याचिका में कही गई ये बात
याचिका में कहा गया था कि भारत के सुप्रीम कोर्ट सहित कई संवैधानिक संस्थानों ने केंद्र की अधिसूचना के अनुरूप बकरीद की छुट्टी पहले ही 27 मई से बदलकर 28 मई कर दी है। यह तर्क दिया गया कि दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षाओं को पुनर्निर्धारित करने से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 25 और 29 का उल्लंघन करता है, जो समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं।
यह याचिका अधिवक्ता इरम पीरजादा के माध्यम से दायर की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता इरम पीरजादा, अशोक कुमार सिंह, शिशिर पिनाकी और राशिद सईद पेश हुए।
