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कनॉट प्लेस का नाम बदलकर राजीव चौक कब किया गया?

कनॉट प्लेस दिल्ली का दिल कहलाता है। हालांकि, कनॉट प्लेस का नाम कई दशक पहले बदला जा चुका है। चलिए जानते हैं कनॉट प्लेस कब राजीव चौक बना और उस समय इस बदलाव को लेकर क्या कुछ हुआ था।

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कनॉट प्लेस का नाम राजीव चौक कब किया गया

दिल्ली के राजीव चौक पर आज कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का 'लहरा दो तिरंगा' कार्यक्रम होने जा रहा है। हालांकि, इसके मद्देनजर पूरे इलाके में कर्फ्यू यानी BNS की धारा 163 लागू कर दी गई है। पुलिस और प्रशासन ने लोगों से कनॉट प्लेस इलाके में न आने की अपील की है। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने दोपहर तीन बजे से सेंट्रल दिल्ली की कई सड़कों पर ट्रैफिक प्रभावित होने की आशंका जताई है। ट्रैफिक की आशंका को देखते हुए जरूरत पड़ने पर यहां मार्गों में बदलाव किया जा सकता है। CJP का यह कार्यक्रम हो पाएगा या नहीं, यह देखना होगा... इस बीच जान लेते हैं कि कनॉट प्लेस का नाम बदलकर राजीव चौक कब किया गया और क्यों?

आज जहां CJP का कार्यक्रम है, उसे आम लोग 'दिल्ली का दिल' कनॉट प्लेस के नाम से जानते हैं। हालांकि, उसी कनॉट प्लेस के बीचों-बीच मौजूद मेट्रो स्टेशन को सभी लोग राजीव चौक मेट्रो स्टेशन कहकर पुकारते हैं। जबकि पूरे क्षेत्र का नाम ही राजीव चौक है। आपको जानकर हैरानी होगी कि आधिकारिक तौर पर दिल्ली में कनॉट प्लेस नाम की कोई जगह है ही नहीं। कनॉट प्लेस को अंग्रेजों ने बसाया था और उन्होंने ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्य ड्यूक ऑफ कनॉट और स्ट्रैथर्न के नाम पर इस जगह का नाम रखा था। आजादी के बाद भी लंबे समय तक इस जगह का नाम कनॉट प्लेस ही रहा।

कनॉट प्लेस कब बना राजीव चौक?

अगर आपको इस बारे में जानकारी नहीं है तो आप हैरान हो जाएंगे कि जिस जगह को दिल्ली के ज्यादातर लोग आज भी कनॉट प्लेस कहते हैं, उसका नाम 1995 में ही बदला जा चुका है। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अगस्त में इसकी घोषणा की और 20 अगस्त 1995 को राजीव गांधी के जन्मदिवस के अवसर पर कनॉट प्लेस को राजीव चौक नाम दिया गया। यानी कनॉट प्लेस का नाम बदलकर राजीव चौक हुए लगभग 31 साल हो चुके हैं। सितंबर 1995 में इंडिया टुडे मैगजीन में छपी खबर के मुताबिक उस समय दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस का नाम बदलकर राजीव चौक किया गया। इसी दौरान इसके बाहरी हिस्से को, जिसे उस समय तक कनॉट सर्कल कहा जाता था, उसका नाम बदलकर इंदिरा चौक रखा गया।

फैसले का जमकर विरोध भी हुआ

सरकार ने भले ही कागजों में नाम बदल दिए हों, लेकिन दिल्ली के अधिसंख्य लोग आज भी इसे कनॉट प्लेस के नाम से ही जानते और पुकारते हैं। यही नहीं कनॉट सर्कल भी कभी इंदिरा चौक नहीं बन पाया। जिस तरह से आज कई जगहों, सड़कों और शहरों के नाम बदलने पर खूब हंगामा होता है, वैसा ही कुछ हंगामा 1995 में तब भी हुआ था, जब कनॉट प्लेस का नाम राजीव चौक किया गया। संसद से लेकर बाजार तक इस पर राजनीतिक बहस हुई। संसद में विपक्षी सांसदों ने लगातार दो दिन तक विरोध किया और सदन से वॉकआउट भी किया। तब हर तरफ प्रश्न यही था कि राजधानी के पुराने और प्रतिष्ठित स्थलों के नाम बदलने की जरूरत क्या है?

कनॉट सर्कल का नाम भी 1995 में ही बदला गया था

कनॉट सर्कल का नाम भी 1995 में ही बदला गया था

विरोध में दुकानें बंद

इंडिया टुडे के सितंबर 1995 के लेख के अनुसार नाम बदलने के विरोध में 24 अगस्त को कनॉट प्लेस के दुकानदारों ने बंद रखकर केंद्र सरकार के इस फैसले पर अपना विरोध जताया था। कुछ विपक्षी नेताओं का आरोप था कि कांग्रेस की आंतरिक राजनीति और सोनियां गांधी को खुश करने के लिए यह फैसला लिया गया है। सरकार की तरफ से कांग्रेस सांसद मणिशंकर अय्यर ने विपक्ष के तमाम आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें बेतुकी बातें करार दिया। विवाद के दौरान संसद में जब संसद में किसी ने पूचा कि क्या ये देश इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की जागीर है? तो इस पर मणिशंकर अय्यर ने हां, कहकर जवाब दिया था।

नाम बदलने पर कांग्रेस का तर्क!

कनॉट प्लेस का नाम बदलकर राजीव चौक करने के फैसले का कांग्रेस सांसद मणिशंकर अय्यर का बयान इंडिया टुडे ने उस समय छापा था। अय्यर ने तर्क दिया था कि दिल्ली के सेंटर में मौजूद एक जगह का नाम विदेशी शख्सियत के बजाय भारतीय के नाम पर होना चाहिए। उन्होंने कहा, कनॉट सर्कस, पूरे कनॉट प्लेस को घेरता है। ऐसे में कनॉट सर्कल का नाम इंदिरा गांधी और कनॉट प्लेस का नाम राजीव गांधी के नाम पर रखने से प्रतीकात्मक रूप ऐसा लगेगा, जैसे मां ने बेटे को गले लगा रखा है।

खुशवंत सिंह ने बताया बचकानी नौटंकी

कनॉट प्लेस का नाम बदलकर राजीव चौक किए जाने को दिवंगत मशहूर लेखकर और पत्रकार खुशवंत सिंह ने उस समय बचकानी नौटंकी करार दिया था। जबकि तत्कालीन भाजपा सांसद वीके मल्होत्रा ने इसे गैरकानूनी बताया और चाटुकारिता की हद करार दिया था। उस समय विपक्ष का तर्क था कि देश में गांधी परिवार के नाम पर पहले से ही बड़ी संख्या में सड़कें, पार्क, हवाई अड्डे और विश्वविद्यालय हैं। ऐसे में ऐतिहासिक पहचान वाले स्थलों के नाम बदलने की क्या जरूरत है। यहां एक पेंच ये भी है कि उस समय दिल्ली सरकार ने विलिंगटन क्रिसेंट का नाम बदलकर पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के नाम पर रखने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे मंजूरी नहीं दी।

पुरानी पहचान आज भी कायम

कनॉट प्लेस का नाम बदले का फैसला साल 1995 में ही लागू हो चुका है। हालांकि, यहां मौजूद मेट्रो स्टेशन तो राजीव चौक के नाम से जाना जाता है। लेकिन कनॉट प्लेस या CP आज भी इसी नाम से जाना-पहचाना जाता है। इतने वर्षों बाद भी कनॉट प्लेस की पुरानी पहचान और लोकप्रियता कायम है।

Digpal Singh
दिगपाल सिंहauthor

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। 2006 से पत्रकारिता में सक्रिय दिगपाल सिंह को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है। दोनों प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए उन्होंने ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग से लेकर सेंट्रल डेस्क पर बड़ी खबरों की हैंडलिंग तक हर स्तर पर अनुभव हासिल किया है। अब तक 30,000 से अधिक खबरें लिख चुके दिगपाल हाइपर-लोकल न्यूज की बारीकियों, शहरों की समस्याओं और लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को समझने की विशेष क्षमता रखते हैं।

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