उत्तराखंड के पहाड़ों में लोगों को देश की आजादी के बाद से ही रेल का इंतजार है। अंग्रेजों के समय पर तराई के इलाकों में जहां तक रेलवे लाइन बिछाई गई थी, वहां से आगे ट्रेन कभी बढ़ी ही नहीं। आजादी के इतने वर्षों बाद भी उत्तराखंड के कई लोगों ने ट्रेन देखी तक नहीं है, क्योंकि नीति निर्माताओं ने पहाड़ों में ट्रेन चलाने के बारे में सोचा ही नहीं। आखिर ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन से उम्मीदें जागी हैं। इस रेल परियोजना को उत्तराखंड के लिए काफी अहम माना जा रहा है और इस पर काम भी तेजी से चल रहा है। चलिए जानते हैं इस रेल प्रोजेक्ट की अहम प्रोग्रेस के बारे में।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन पर तेजी से चल रहा है काम (फोटो - AI)
भारतीय रेलवे के लिए उत्तराखंड में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन काफी चुनौतीपूर्ण परियोजना होने के साथ ही प्रतिष्ठित भी है। यह परियोजना पूरी तरह से उत्तराखंड में है और हिमालय की कठिन भौगोलिक स्थितियों से गुजरती है। इस परियोजना के पूरा होने के बाद उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की कनेक्टिविटी में क्रांतिकारी बदलाव ने की उम्मीद है।
कुल 125 किलोमीटर लंबी यह रेल लाइन पांच जिलों देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग व चमोली से होकर गुजरेगी। इस रेलवे लाइन के बनकर तैयार होने पर दिल्ली और ऋषिकेश को देवप्रयाग व कर्णप्रयाग जैसे धार्मिक स्थलों से जोड़ेगी। इससे तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों के साथ ही स्थानीय लोगों को भी लाभ मिलेगा।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना का ज्यादातर हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा। इस रेलवे लाइन में कुल 16 मेनलाइन सुरंगों का निर्माण किया जा रहा है। इन सुरंगों की कुल लंबाई 105 किलोमीटर है और 98 किमी लंबी 12 एस्केप सुरंगें भी बनाई जा रही हैं। कल यानी बुधवार 30 जुलाई 2025 को रेलवे मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक लिखित उत्तर में बताया कि अब तक 13 मुख्य सुरंगें और 9 एस्केप सुरंगें पूरी की जा चुकी हैं।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन के निर्माण कार्य को गति देने के लिए 8 अतिरिक्त एडिट्स (Adits) की पहचान की गई है, जिनका निर्माण पूरा हो चुका है। Adits हॉरिजॉन्टल या हॉरिजॉन्टल पैसेज होता है, जो टनल तक जाने के लिए इस्तेमाल होता है। इन एडिट्स के जरिए सुरंगों की खुदाई के लिए अतिरिक्त कार्य क्षेत्र बनाए गए हैं, जिससे लंबी सुरंगों का निर्माण जल्दी पूरा किया जा सका।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन पर कुल 213 किलोमीटर लंबी सुरंगें बनाई जानी हैं, उनमें से 199 किमी सुरंगों की खुदाई का कार्य पूरा कर लिया गया है। इस परियोजना के तहत पहली बार भारतीय रेलवे ने हिमालय क्षेत्र में टनल बोरिंग मशीन (TBM) का इस्तेमाल किया है। रेलवे ने इस तकनीक का प्रयोग खासतौर पर सबसे लंबी सुरंग (T-8) के निर्माण में किया गया, जिसकी लंबाई 14.8 किमी है।
टनल बोरिंग मशीन के माध्यम से सुरंग का ब्रेकथ्रू सफलतापूर्वक हासिल कर लिया गया है। सुरंग निर्माण में पर्यावरण और पारिस्थितिकी को कम से कम नुकसान हो, इसके लिए अत्याधुनिक तकनीकों और सुरक्षा उपायों का पालन किया जा रहा है।
