Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ का गरियाबंद इलाका, जहां कभी नक्सलियों की बंदूकें खामोशी तोड़ती थीं, अब सिलाई मशीन और औजारों की आवाज से गूंज रहा है। यहां के लाइवलीहुड कॉलेज में सरकार की पुनर्वास योजना के तहत पूर्व नक्सली नई जिंदगी की राह तलाश रहे हैं।
सिलाई मशीन पर हाथ साधती पूर्व नक्सली महिलाएं
इनामी नक्सली, अब मेहनतकश नागरिक
जानसी, जिस पर 8 लाख का इनाम था और जिसने 20 साल तक नक्सल मोर्चे पर जीवन बिताया, आज कढ़ाई और बुनाई सीख रहा है। उसके साथ झुमकी, मंजुला और रनीता, जिनपर कभी 5-5 लाख का इनाम था, आज सिलाई-कढ़ाई का हुनर सीख रही हैं। वहीं रमेश और संतराम जिनपर भी 5-5 लाख का इनाम था, अब ड्राइविंग और प्लंबिंग में हाथ आजमा रहे हैं।
“अब गोली नहीं, सपने बुनने हैं”
पूर्व महिला नक्सली झुमकी कहती हैं, “पहले जंगल में हर वक्त जान हथेली पर रहती थी, अब जिंदगी कढ़ाई के धागों में सजीव लगती है।” झुमकी और मंजुला अब 10वीं की प्राइवेट परीक्षा की तैयारी में जुटी हैं। उनके चेहरों पर सपनों की नई चमक साफ दिखाई देती है।
मेहनत से नई पहचान
पूर्व नक्सली संतराम का कहना है “अब हम अपने बच्चों के लिए ईमानदारी से रोटी-कपड़ा जुटाना चाहते हैं, डर की नहीं, मेहनत की कमाई करनी है।” लाइवलीहुड परियोजना अधिकारी सृष्टि मिश्रा बताती हैं कि इन सभी में सीखने की गहरी ललक है। समय पर आते हैं, ईमानदारी से प्रशिक्षण लेते हैं। महिलाओं को सेल्स की ट्रेनिंग भी दी जा रही है और सुपर बाजार से ऑफर मिलना शुरू हो चुका है।
सरकार का गंभीर प्रयास
गरियाबंद एसपी निखिल राखेचा ने कहा कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास को लेकर सरकार पूरी तरह गंभीर है। उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, ताकि भविष्य में उन्हें किसी कठिनाई का सामना न करना पड़े।
जिन उंगलियों ने कभी ट्रिगर दबाया था, वही अब सिलाई मशीन की टक-टक में नई धुन बुन रही हैं। जिन पैरों ने जंगल की पगडंडियां नापी थीं, वे अब आत्मनिर्भरता की राह पर कदम बढ़ा रहे हैं।
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