Caste Census in Bihar : बिहार में नीतीश सरकार को बड़ा झटका लगा है। पटना हाई कोर्ट ने गुरुवार को तत्काल प्रभाव से राज्य में जातीय जनगणना कराने पर रोक लगा दी। बता दें कि जातीय जनगणना को लेकर हाई कोर्ट में अर्जी दायर की गई थी। इस अर्जी पर सुनवाई पूरी करने के बाद कोर्ट ने बुधवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने कहा कि वह चार मई को इस पर अपना फैसला सुनाएगा। जातीय जनगणना का विरोध में दायर अर्जी में दलील दी गई थी कि जनगणना का अधिकार क्षेत्र केंद्र सरकार के दायरे में आता है। राज्य सरकार इस तरह की जनगणना नहीं करा सकती।
बिहार में जातीय गणना पर हाई कोर्ट की रोक।
'आकस्मिक फंड का इस्तेमाल सेंसस में करना ठीक नहीं'
याचिकाकर्ता के वकील ने मीडिया से बातचीत में कहा कि कोर्ट ने माना कि जातीय जनगणना कराने में सरकार जो पैसा खर्च करेगी। वह आपात फंड का गलत इस्तेमाल होगा। वकील ने कहा कि कोर्ट उनकी इस दलील से सहमति दिखी कि जातीय जनगणना कराने का नीतीश सरकार ने जो नीतिगत निर्णय लिया है, वह संविधान एवं सेंसस एक्ट 1948 के विपरीत है। वकील ने बताया कि हाई कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई तीन जुलाई को करेगा।
सुरक्षित रखना होगा एकत्र डाटा-HC
कोर्ट ने नीतीश सरकार को जारी जातीय जनगणना तत्काल रोकने का निर्देश दिया है। साथ ही सर्वे के दौरान अब तक एकत्र किए गए जातिगत डाटा को भी सुरक्षित रखने के लिए कहा है।
महाधिवक्ता पीके शाही ने रखा सरकार का पक्ष
इससे पहले बुधवार को सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता पीके शाही ने हाई कोर्ट को बताया कि दोनों सदन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर जातीय जनगणना कराने का निर्णय लिया गया है। यह राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय है। इसके लिए बजटीय प्रावधान भी किया गया है। इसके लिए आकस्मिक निधि से पैसे की निकासी नहीं की गई है। जाति आधारित गणना पर सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि इस जातीय सर्वेक्षण के लिए राज्य सरकार 500 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।
सभी दलों की सहमति से हो रहा सेंसस-नीतीश
वहीं, जाति आधारित जनगणना पर सीएम नीतीश कुमार का कहना है कि सभी दलों की सर्वसम्मति से जाति आधारित गणना कराने का काम किया जा रहा है लेकिन कुछ लोग हैं जो परेशान हैं। अब सभी जाति की गणना हो जाएगी तो फायदा ही होगा। इसको लेकर 2019 में ही विधानसभा से इसको मंजूरी दिलाई गई थी।
