खड़ी और बैठकी होली: अनोखी है परपंरा, यहां आंगन-आंगन जाकर गाते हैं होली के गीत

उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की होली की बात ही कुछ खास है। यहां होली पर संगीतमय परंपरा का अद्भुत संगम है, जो पंचमी से शुरू होकर दो माह तक चलती है। बैठकी होली शास्त्रीय रागों में बैठकर गाई जाती है, जबकि खड़ी होली झोड़ा-चांचरी के साथ सामूहिक नृत्य के रूप में घर के आंगन और चौराहों पर गाई जाती है।

उत्तराखंड की होली खासतौर पर कुमाऊं क्षेत्र की होली संगीतमय होती है। फिर चाहे वह बैठकी होली हो या खड़ी होली। उत्तराखंड के पहाड़ों में होली का पर्व पंचमी से ही शुरू हो जाती है। इसी लिए कहा जाता है कि उत्तराखंड के पहाड़ों में होली 2 महीने की होती है। देश के हर हिस्से की होली के अपने रंग होते हैं और पहाड़ों की होली के रंगों में थोड़ा संगीत की धुन रची-बसी होती है। अनोखी होली कहें या होली के रस की बात करें तो ब्रज क्षेत्र के बाद उत्तराखंड की होली में सबसे ज्यादा रस और रंग होते हैं। बैठकी होली का मतलब बैठकर होली गायन से है। खड़ी होली का मतलब खड़े होकर सामूहिक नृत्य (झोड़ा-चांचरी) के साथ घर के आंगन (खौ) के साथ ही चौराहों पर होली के गीत गाए जाते हैं। चलिए जानते हैं इस अनोखी परंपरा के बारे में, जहां संगीतमय होली की धुन और पहाड़ी वाद्य यंत्रों के साथ पहाड़ों की वादियां भी गुनगुनाने लगती हैं।

Uttarakhand Holi

उत्तराखंड में होली की अनोखी परंपरा (फोटो - AI)

उत्तराखंड में कुमाऊं अंचल की होली सिर्फ रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना, शास्त्रीय संगीत और लोकजीवन का अद्भुत संगम है। यहां होली के दोनों प्रारूपों की बात करें तो, एक तरफ खड़ी होली ग्रामीण अंचल की सामूहिक अभिव्यक्ति है, तो दूसरी तरफ बैठकी होली को नागर होली भी कहा जाता है। बैठकी होली में शास्त्रीय रागों की गरिमा और लोकभाव की आत्मीयता साथ-साथ चलती है।

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