आसमान की आग...सूख गए चापाकल, रेत खोदकर प्यास बुझाने को मजबूर आदिम जनजाति; नल-जल' योजना फेल?

बालू का चूआ बनाकर हम लोग मुंह लगाकर पानी पीते हैं। हमारे पास कोई और रास्ता नहीं है। ऐसा लगता है सरकार हमें मारना चाहती है, क्योंकि हम आदिम परिवारों पर किसी का कोई ध्यान नहीं है। ऐसे में क्या जल जीवन मिशन (हर घर नल जल योजना) को लेकर सरकार का दावा उचित है?

केंद्र सरकार ने शहरों से दूर गांवों तक प्यास बुझाने के लिए जल जीवन मिशन (हर घर नल जल योजना) को उतारा। इसका उद्देश्य लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना है। लेकिन, इसकी सफलता को लेकर सरकार के दावे और हकीकत में जमीन आसमान का फर्क नजर आ रहा है। इसका एक उदाहरण, झारखंड के सूदूर क्षेत्रों में स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहा है, जहां लोग सूरज की तपिश में गला तर करने की जद्दोजहद करते नजर आ रहे हैं। यहां प्यास बुझाने के लिए अपनाए गए तरीकों को देखकर गला सूख जाए।

Har Ghar Nal Jal Yojna Fail in Chatra

चतरा रेत खोदकर प्यास बुझाने को मजबूर आदिम जनजाति

चतरा में इन दिनों सूरज आसमान से आग बरसा रहा है और धरती बूंद-बूंद पानी के लिए त्राहिमाम कर रही है। एक तरफ सरकार दावा करती है कि 'हर घर नल से जल' योजना का लाभ पहुंच रहा है, लेकिन चतरा के सुदूरवर्ती प्रतापपुर, कुंदा, कान्हाचट्टी व लावालौंग से जो तस्वीरें सामने आई हैं, वो सरकारी दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी हैं। यहां आदिम जनजाति के लोग प्यास बुझाने के लिए नदी की गंदी जलधारा और रेत में चूआ खोदकर पानी पीने को मजबूर हैं।

End of Feed