Delhi Largest Mosque: रमजान का पाक महीना अपने आखिरी चरण में पहुंच चुका है और सभी मुसलमान ईद की खुशियों में डूबने की तैयारियों में व्यस्त हैं। इस महीने की रोजा और इबादत के बाद, ईद-उल-फितर का त्यौहार एक नई ऊर्जा और उल्लास लेकर आता है। ईद के दिन मुसलमान मस्जिद में विशेष नमाज अदा करते हैं, जो इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके अलावा, लोग अपने घर और मोहल्लों को सजाते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और मिठाइयां और ईदी लेते-देते हैं। वहीं बात अगर राजधानी दिल्ली की करें तो यहां भी ईद-उल-फितर पर बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। खास तौर से उस जगह पर जहां दिल्ली की सबसे बड़ी मस्जिद मौजूद है। ऐसे में आज हम आपको दिल्ली की सबसे बड़ी मस्जिद के इतिहास से रूबरू करवाएंगे। तो आइए जानें इसके बारे में।
दिल्ली की सबसे बड़ी मस्जिद
दिल्ली की सबसे बड़ी मस्जिद- जामा मस्जिद
दिल्ली की सबसे बड़ी मस्जिद
दिल्ली के पुरानी दिल्ली क्षेत्र में स्थित मस्जिद-ए-जहां-नुमा, जिसे आमतौर पर जामा मस्जिद के रूप में जाना जाता है, भारत की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। इसके निर्माता मुगल सम्राट शाहजहां थे, जिन्होंने 1644 और 1656 के बीच इसका निर्माण करवाया था और इसका उद्घाटन इसके पहले इमाम सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी ने किया था। मुगल राजधानी शाहजहांनाबाद (आज पुरानी दिल्ली) में स्थित, इसने 1857 में साम्राज्य के पतन तक मुगल सम्राटों की शाही मस्जिद के रूप में कार्य किया। जामा मस्जिद को पूरे भारत में मुगल शक्ति के प्रतीकात्मक संकेत के रूप में माना जाता था। यह ब्रिटिश शासन के कई प्रमुख अवधियों के दौरान राजनीतिक महत्व का स्थल भी था।
मस्जिद की वास्तुकला है बेहद भव्य
इस मस्जिद की वास्तुकला अत्यंत भव्य और सजावटी है, जिसमें तीन बड़े प्रवेश द्वार, चार मीनारें और दो 40 मीटर ऊंची मीनारें शामिल हैं, जो लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर की पट्टियों से बनी हैं। इसमें एक साथ 25,000 से अधिक लोग नमाज पढ़ सकते हैं। यहां लोगों के लिए उत्तरी द्वार पर पारंपरिक वस्त्र किराए पर उपलब्ध होते हैं। ईद जैसे मौके पर यहां आना एक अनोखा अवसर होता है जब आप स्थानीय अंदाज में सज-संवर कर यहां के माहौल का अनुभव कर सकते हैं। मस्जिद की मीनार की चोटी से पुरानी दिल्ली के मध्यकालीन शहर की हलचल को देखना एक अद्भुत अनुभव होता है।
इस वास्तुकार की देखरेख में हुआ निर्माण
जामा मस्जिद के पवित्र हॉलों में कई अनमोल वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं, जिनमें एक कुरान शामिल है जो हिरण की खाल पर लिखी गई है। इस भव्य मस्जिद का निर्माण वास्तुकार उस्ताद खलील की देखरेख में हुआ माना जाता है। उन्होंने इसके दीवारों में अपनी कला और कई रोचक कथाएं समेट दीं। पूर्वी द्वार से जुड़ी एक रहस्यमयी कहानी भी चर्चित है। पुराने समय में यह द्वार शाही परिवार के लिए कभी नहीं खुलता था, जिसने इस जगह की ऐतिहासिक और अनोखी छवि को और बढ़ा दिया। जो लोग ईद-उल-फितर और जैसे त्योहारों के दौरान यहां पहुंचने का सौभाग्य पाते हैं, उनके लिए मस्जिद एक चमकती दुल्हन की तरह दिखाई देती है। हर ओर श्रद्धालुओं का जमावड़ा, जो देश-विदेश से आते हैं, इसे और भी भव्य और जीवंत बना देता है। इस समय मस्जिद अपनी पूरी शान और गरिमा के साथ लोगों को आकर्षित करती है।
