कितनी पुरानी है रावण दहन की परंपरा, कहां जला पहली बार पुतला, कब और कैसे शुरू हुआ दशहरे का यह उत्सव?

Dussehra 2026: दशहरा देशभर में आस्था, उत्साह और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर भगवान श्रीराम की विजय का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रावण दहन की शुरुआत कैसे हुई? अगर नहीं तो आइए जानें।

Dussehra 2026: देशभर में इन दिनों दशहरे के पर्व की धूम देखने को मिल रही है। हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और परंपराओं में भी विशेष स्थान रखता है। विजयदशमी के नाम से प्रसिद्ध यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। इस साल 20 अक्टूबर 2026 को देशभर में दशहरा मनाया जाएगा। इस मौके पर विभिन्न शहरों और जिलों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाएगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण दहन की परंपरा की शुरुआत कब हुई और इसका इतिहास क्या है? आइए, जानते हैं इस परंपरा से जुड़ी दिलचस्प बातें।

कितनी पुरानी है रावण दहन की परंपरा, कहां जला पहली बार पुतला, कब और कैसे शुरू हुआ दशहरे का यह उत्सव?

रावण दहन का इतिहास

भगवान राम के विजय से जुड़ी परंपरा

रावण दहन की परंपरा भगवान राम के विजय से जुड़ी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान राम ने लंकापति रावण का वध किया था। इसी विजय की याद में दशहरा मनाने की परंपरा प्रचलित हुई, जो बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का संदेश देती है। प्रचीन समय में रावण के प्रतीक के रूप में मिट्टी या लकड़ी से छोटी आकृतियां बनाकर उनका दहन किया जाता था। बाद में 16वीं और 17वीं शताब्दी में रामचरितमानस की लोकप्रियता के साथ उत्तर भारत में रामलीला का प्रसार बढ़ा। इसके बाद 19वीं शताब्दी में रामलीला के समापन पर रावण वध के प्रसंग को भव्य रूप देने के लिए घास-फूस, कागज और अन्य सामग्रियों से बड़े-बड़े पुतले तैयार कर उन्हें जलाने की परंपरा अधिक प्रचलित होने लगी।

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