Dussehra 2026: आप भी आज तक कई दशहरा मेलों में गए होंगे। दशहरा मेले में सबसे बड़ा आकर्षण रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले होते हैं। मेले की अपनी रौनक होती है, लेकिन पुतलों को जलने में 10 मिनट से भी कम का समय लगता है। एक बार आग लगते ही शानदार आतिशबाजी के साथ तीनों पुतले कुछ ही पलों में स्वाहा हो जाते हैं। झूलों और खाने के स्टॉल के अलावा दशहरे के मेले से मेरा भी आज तक बस यही नाता था कि पुतले जलते ही घर की तरफ यात्रा शुरू हो जाती थी। लेकिन इस बार मुझे उन कारीगरों से मिलने का अवसर मिला, जो रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के बड़े-बड़े पुतले बनाते हैं। जो पुतले जलने में 10 मिनट से भी कम का समय लेते हैं, उन्हें बनाने में इन कारीगरों को महीने भर का समय लग जाता है। यह कारीगर महीनेभर मेहनत करते हैं, तब जाकर आपको दशहरे के मेले में पुतलों के दहन के साथ शानदार आतिशबाजी देखने का मौका मिलता है। तो बस मैं पहुंच गया दिल्ली के लाल किला मैदान में होने वाली रामलीला में।
Kahan Banta Hai Ravan Ka Putla
कौन हैं रावण के पुतले बनाने वाले लोग?
यहां मेले की चकाचौंध से दूर मुझे एक टेंट दिखा। यह वही जगह थी जहां कारीगर रावण का पुतला बना रहे थे। जैसे ही मैं उनके टेंट की ओर पहुंचा, वहां हर कोई अपने काम में व्यस्त नजर आया। बातचीत करने पर मेरी मुलाकात आजम खान ग्रुप के लोगों से हुई। ये वही लोग हैं, जो सालों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी रावण के पुतले बनाने का काम कर रहे हैं। यूपी के गाजियाबाद जिले में फर्रुखनगर के रहने वाले दिलशाद बताते हैं कि वह पिछले 14 साल से रावण के पुतले बनाने का काम कर रहे हैं। उनके साथ काम करने वाले कुछ कारीगर उनके ही इलाके से आते हैं, जबकि कुछ बिहार और झारखंड से दिहाड़ी पर काम करने के लिए यहां पहुंचते हैं।
Ravan Ka Putla Banane Wale Log
कितने में फाइनल होता है ठेका?
दिलशाद ने बताया कि उन्हें पुतले बनाने का ठेका कमेटी की ओर से मिलता है। जब मैंने उनसे पूछा कि यह ठेका कितने रुपये में तय होता है तो उन्होंने बताया कि इसकी रकम 4.5 लाख रुपये है। इसमें से आधे से ज्यादा पैसे पुतलों के निर्माण और रखरखाव पर खर्च हो जाते हैं। इसके बाद जो रकम बचती है, उसे वे आपस में बांट लेते हैं। यह काम करीब एक महीने तक चलता है। दशहरे से एक महीने पहले ही उनकी टीम यहां पहुंच जाती है और पुतले बनाने का काम शुरू कर देती है।
Ravan Ka Putla
कभी जीभ तो कभी आंखों से निकलती है आग
दिलशाद और उनके साथ मौजूद अन्य कारीगरों ने बताया कि पुतलों को हर साल नया लुक दिया जाता है। कभी उनकी जीभ से आग निकलती है तो कभी आंखों से। जब मैंने उनसे पूछा कि इस बार क्या खास होने वाला है तो उन्होंने बताया कि इस बार रावण के पुतले की आंखों से आग निकलेगी और उसकी छाती पर चक्र घूमेगा। कभी-कभार पुतलों का मुंह भी खुलता और बंद होता है। मुझे सबसे दिलचस्प बात यह लगी कि पुतलों की सजावट और उनके निर्माण में ग्लू के बजाय मैदे से बने पेस्ट का इस्तेमाल किया जाता है।
Kumbhkaran and Meghnad Putla
कैसे दिया जाता है पुतलों को आकार?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रावण का पुतला बांस, पतले तार, कागज, कपड़े और गोंद (मैदे का पेस्ट) की मदद से तैयार किया जाता है। निर्माण के दौरान ही पुतलों में आतिशबाजी के लिए बारूद और अन्य ज्वलनशील सामान लगाया जाता है। इस दौरान जब मैंने आसपास नजरें दौड़ाई तो रावण के साथ-साथ कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले भी बनते हुए दिखाई दिए। कारीगर इन पुतलों के साथ उनके मुकुट, तलवार और गदा को भी सजाने में जुटे थे।ॉ
How Ravana Putla is Made
पुतलों की ऊंचाई और उन्हें मैदान तक पहुंचाने की मशक्कत
35 वर्षीय दिलशाद बताते हैं कि सबसे ज्यादा मेहनत 80 फीट ऊंचे पुतलों को रामलीला मैदान तक पहुंचाने में लगती है। जी हां, इन पुतलों की ऊंचाई 80 फीट तक होती है। पुतलों के एक-एक हिस्से को बेहद सावधानी से मैदान तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद सभी हिस्सों को जोड़कर क्रेन की मदद से खड़ा किया जाता है। इसके अलावा पुतलों पर डीजल का छिड़काव भी किया जाता है ताकी इसमें और भी आसानी से आग लगे। शारदीय नवरात्र के पहले दिन और पंचमी के दिन हुई बारिश से कारीगरों को काफी दिक्कत हुई।
Delhi Lal Qila Ground Dussehra Mela
राम और रामलीला को लेकर क्या कहते हैं कारीगर?
जब मैंने पूरे ग्रुप से राम और रामलीला के बारे में पूछा तो उन्होंने एक सुर में कहा, "हमारे लिए हमारा काम ही सब कुछ है। इसी से हमारा महीने भर का खर्च निकल आता है और हमारा परिवार भी खुश रहता है।" जहां तक ऑफ सीजन की बात है तो दिलशाद जैसे कारीगर छोटे-मोटे काम करके अपनी जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ाते हैं। इससे पहले शायद ही आपको इन कारीगरों के बारे में इतने करीब से जानने का मौका मिला हो। ये वही लोग हैं, जो मेले की रौनक के बीच गुमनाम रह जाते हैं, बात तो रावण के पुतलों की होती है, लेकिन उन्हें अपने हाथों से आकार देने वाले इन कारीगरों की मेहनत और हुनर अक्सर वाहवाही से दूर रह जाते हैं।
