Delhi Court Maintenance Ruling: दिल्ली की एक अदालत ने पारिवारिक विवादों में गुजारा भत्ता (मैंटेनेंस) तय करने को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी वास्तविक वित्तीय क्षमता से अधिक गुजारा भत्ता देने का आदेश नहीं दिया जा सकता, भले ही अलग रह रही उसकी पत्नी को मिलने वाली राशि उसकी दैनिक और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त ही क्यों न लग रही हो।
दिल्ली कोर्ट का बड़ा और ऐतिहासिक फैसला
यह फैसला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह की अदालत ने एक महिला की उस याचिका को खारिज करते हुए सुनाया, जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा तय किए गए 1,840 रुपये प्रति माह के अंतरिम गुजारा भत्ते को बहुत कम बताते हुए चुनौती दी थी। महिला का तर्क था कि दिल्ली जैसे शहर में इतनी कम रकम में जीवन बिताना असंभव है। उसने दावा किया था कि उसका पति एक मेडिकल स्टोर चलाता है और खेती तथा वाणिज्यिक संपत्तियों से भी अच्छी कमाई करता है, इसलिए उसे कम से कम 15,000 से 20,000 रुपये प्रतिमाह मिलने चाहिए।
टाइम्स नाउ नवभारत पर यह भी पढ़ें: '43 साल देश संभाला, अब रामलला की सेवा...', राम मंदिर ट्रस्ट के पहले CEO एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र का भावुक बयान
पति की महज 8 हजार रुपये सैलरी
अदालत ने सुनवाई के दौरान माना कि महिला की यह बात सही है कि यह राशि बेहद कम है, लेकिन पति की कोई अतिरिक्त आय साबित करने के लिए अदालत के समक्ष कोई ठोस दस्तावेज या सबूत पेश नहीं किए गए थे। दूसरी ओर, पति ने अदालत को बताया कि वह एक मेडिकल दुकान पर महज 8,000 रुपये में काम करता है और उस पर तीन बच्चों के पालन-पोषण की भी जिम्मेदारी है। सत्र अदालत ने स्पष्ट किया कि जब पति की वास्तविक आय का कोई पुख्ता प्रमाण न हो, तो न्यूनतम मजदूरी को आधार मानना ही कानूनी रूप से सही तरीका है।
पति समाज के कमजोर आर्थिक वर्ग से-कोर्ट
मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की न्यूनतम मजदूरी (लगभग 11,021 रुपये) और दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध 'अन्नुरिता वोहरा' मामले के सिद्धांतों का पालन करते हुए ही यह राशि तय की थी। अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि पति समाज के कमजोर आर्थिक वर्ग से आता है। ऐसी स्थिति में कानून की सीमा यह तय करती है कि व्यक्ति की जितनी क्षमता है, उसे उतना ही भुगतान करने का आदेश दिया जा सकता है। अदालत ने गुजारा भत्ते की राशि में किसी भी बदलाव से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
