Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक जरूरी जानकारी देते हुए बताया कि कहा है कि मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) प्राप्त करने के लिए दो गर्भधारण के बीच कोई अंतराल होना आवश्यक नहीं है। अदालत का मानना था कि मातृत्व लाभ, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधानों से संचालित है जो दो गर्भधारण के बीच समय सीमा को लेकर कोई रोक नहीं लगाता है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा नौ जनवरी, 2026 को जारी आदेश दरकिनार कर दिया जिसके तहत याचिकाकर्ता नर्स शिखा यादव का मातृत्व लाभ का दावा इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि मातृत्व लाभ तभी दिया जा सकता है जब दो गर्भधारण के बीच दो वर्ष का अंतर हो।
मैटरनिटी लीव पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
नए सिरे से आवेदन करने को कहा गया
अदालत ने याचिकाकर्ता को इस संहिता के तहत उपलब्ध मातृत्व अवकाश के लिए नए सिरे से आवेदन करने को कहा और निर्देश दिया कि आवेदन प्राप्त होने के बाद स्वास्थ्य विभाग के संबंधित अधिकारी इस अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखकर उचित कदम उठाएंगे। मौजूदा मामले में, याचिकाकर्ता शिखा यादव उत्तर प्रदेश सरकार के चिकित्सा शिक्षा विभाग के तहत नियमित रूप से नियुक्त स्टाफ नर्स/ नर्सिंग अधिकारी के तौर पर सेवारत है। उसे इससे पूर्व 29 जनवरी, 2024 से 27 जुलाई, 2024 तक 180 दिनों का मातृत्व अवकाश दिया गया था। इसके बाद वह पुनः गर्भवती हो गई और दूसरे बच्चे की डिलीवरी के लिए मातृत्व अवकाश मांगा।
दो गर्भधारण के बीच कोई समय सीमा लागू नहीं
इस तरह से, याचिकाकर्ता ने 180 दिनों के मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया जिसे चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा खारिज कर दिया गया। अदालत ने 15 जुलाई को दिए अपने निर्णय में कहा, इस प्रकार से यह व्यवस्था दी जाती है कि 2020 की संहिता के प्रावधान किसी कार्यकारी निर्देशों से ऊपर होंगे और मातृत्व अवकाश के लाभ इस संहिता के प्रावधानों से संचालित होंगे जिसमें दो गर्भधारण के बीच किसी तरह की कोई समय सीमा लागू नहीं होती।
