आगरा : अपनी पुश्तैनी कृषि भूमि को 24 साल से अधिग्रहण की प्रक्रिया में फंसा रखने के आरोप लगाते हुए किसान राजेंद्र सिंह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद की 'अरतौनी योजना' को चुनौती देते हुए कहा है कि सरकार और परिषद ने न तो जमीन का कब्जा लिया और न ही अब तक कोई मुआवजा दिया। याचिका के अनुसार, गांव जौपुरा, तहसील आगरा स्थित करीब 0.4070 हेक्टेयर कृषि भूमि राजेंद्र सिंह के परिवार की पुश्तैनी संपत्ति है और परिवार की आजीविका का मुख्य साधन भी। याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2002 में धारा 28 और वर्ष 2012 में धारा 32 की अधिसूचना जारी की गई थी, लेकिन इसके बाद भी अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई।
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किसान ने क्या कहा?
राजेंद्र सिंह ने कोर्ट में कहा कि 24 वर्षों से उनकी जमीन “अनिश्चितता और कानूनी अधर” में फंसी हुई है। न तो सरकार ने कोई अवॉर्ड पारित किया और न ही मुआवजा तय किया गया। इसके बावजूद किसान अपनी जमीन का स्वतंत्र उपयोग भी नहीं कर पा रहे हैं। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि संबंधित भूमि पहले से ही 1985 में घोषित आगरा विकास प्राधिकरण (ADA) के विकास क्षेत्र में आती थी। ऐसे में आवास विकास परिषद बिना राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के इस योजना को लागू नहीं कर सकती थी। किसान की ओर से कहा गया है कि यह पूरी कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर और कानून के विपरीत है।
राजेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि उन्हें कभी व्यक्तिगत नोटिस नहीं दिया गया और न ही आपत्तियां दर्ज कराने का मौका मिला। याचिका में कहा गया है कि वर्षों बाद योजना को दोबारा सक्रिय किया गया, लेकिन प्रभावित किसानों को सुनवाई का अवसर तक नहीं दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
किसान ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की संपत्ति को अनिश्चितकाल तक अधिग्रहण की प्रक्रिया में फंसाकर रखना संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 300-A का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि राज्य नागरिकों के संपत्ति अधिकारों को वर्षों तक बिना मुआवजे के नहीं रोक सकता।
याचिका में यह भी बताया गया कि इस वर्ष अप्रैल में राज्य सरकार और आवास विकास परिषद को प्रतिनिधित्व देकर जमीन को योजना से मुक्त करने की मांग की गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। राजेंद्र सिंह ने हाईकोर्ट से मांग की है कि अरतौनी योजना से संबंधित धारा 28 और 32 की अधिसूचनाएं रद्द की जाएं तथा प्रशासन को उनकी जमीन पर किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई से रोका जाए।
